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सिर पर सवार है मैला उतरने का नाम नहीं लेता

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सभ्यता के विकास में मल निस्तारण समस्या रही हो या न रही हो, लेकिन भारत में कुछ लोगों के सिर पर आज भी मैला सवार है. तमाम कोशिशों के बावजूद भारत सरकार उनके सिर से मैला नहीं उतार पायी है जो लंबे समय से इस काम से निजात पाना चाहते हैं. हालांकि सरकार द्वारा सिर से मैला हटा देने की तय आखिरी तारीख कल बीत गयी लेकिन कल ही 31 मार्च को दिल्ली में जो 200 लोग इकट्ठा हुए थे वे आज वापस अपने घरों को लौट गये हैं. तय है, आज से उन्हें फिर वही सब काम करना पड़ेगा जिसे हटाने की मंशा लिये वे दिल्ली आये थे. उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट-

भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2009 तक सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने की घोषणा की वास्तविकता को उजागर करने के लिए आज छह राज्यों के 200 लोग नई दिल्ली में एकत्रित हुए। मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र से आए दलित समुदाय के लोगों ने बताया कि आज भी देश में लाखों शुष्क शोचालय मौजूद है, जिसके कारण लाखों लोग मैला ढोने को विवश हैं। यह काम करने से इंकार करने के बावजूद गांव के सामंती ढांचे मै मोजूद दबंग तबकों द्वारा उनसे जबरदस्ती करवाया जाता हैं। गरिमा अभियान मध्यप्रदेश, नवसृजन ट्रस्ट गुंजरात, टैम्स तमिलनाडू तथा मानुस्कि महाराष्ट्र द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस राष्ट्रीय परामर्श में कई ऐसे लोगों ने भी शामिल हुए जिन्होंने अपने साहस और संघर्ष के जरिये इस प्रथा से मुक्त होने में सफलता हासिल की।

उल्लेखनीय है कि मैला ढोने का ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है। राष्ट्रीय परामश में शामिल महिलाओं ने अपनी बात प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे यह काम अपनी मर्जी से नहीं बल्कि सामाजिक दबाव के कारण करने को विवश है। इससे उनके जीवन जीने के अधिकार का हनन हो रहा है। उनके साथ छुआछूत की जाती है, स्कूल में उनके बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है और अत्यन्त कठिन व असम्मानजनक परिस्थितियों में जीना पड़ता है। मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले की लालीबाई ने कहा कि जब उन्होेने मैला ढोने इंकार कर दिया तो गांव के दंबग लोगों ने उनका घर जला दिया। गुजरात की शारदा बहन का कहना था कि ``बीस सालों तक मैने समाज के दबाव में यह काम किया, इससे मुझे कई तरह की बीमारियां हो जाती थी।´´ उत्तरप्रदेश से आई श्रीमती एकली का कहना था कि मैं गांव में मैला ढोने का काम करने को विवश हूं। यदि यह काम नहीं करें तो गांव के लोग दबाव डालते हैं। मैं यह काम छोड़ना चाहती हूं,।´´

इस की प्रथा समाप्ति के लिए सन् 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन एवं शुष्क शौचालय सिन्नर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम - 1993 लागू किया गया। जिसमें इस प्रथा की पूरी तरह समाप्ति की बात कही गई। भारत सरकार द्वारा इस प्रथा की समाप्ति के लिए कई समय सीमाएं निर्धारित की गई। पिछली समय सीमा 31 दिसंबर 2007 थी, जिसे बढाकर 31 मार्च 2009 कर दिया गया है. भारत सरकार द्वारा अप्रैल 2007 से लागू ``मैला ढोने वालों के पुर्नवास के लिए स्वरोजगार योजना (एस.आर.एम.एस.)´´ के अन्तर्गत 735.60 करोड़ का प्रावधान किया गया था और कहा गया था कि 31 मार्च 2009 तक इस प्रथा को समाप्त कर सभी का पुर्नवास कर दिया जावेगा। किन्तु जमीनी स्तर पर इस तरह को कोई सफल प्रयास देखने को नहीं मिला।

राष्ट्रीय परामर्श में विभिन्न प्रांतों की महिलाओं ने अपनी बात रखी। चर्चा की शुरूआति करते हुए गरिमा अभियान के संयोजन श्री आसिफ ने कहा कि ``यह कोई नया मुद्दा नहीं है। मैला ढोने की प्रथा आजादी के पहले से कायम है और सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के लक्ष्य कई बार घोषित किए गए है। पहले सरकार ने कहा था कि सन् 2007 तक देश को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त कर दिया जाएगा और उसके बाद 31 मार्च 2009 तक इस खत्म करने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन आज ाी यह पूरे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कायम है। राष्ट्रीय परामर्श में शामिल छह राज्यों के लोेगों को संबोधित करते हुए योजना आयोग की सदस्य डॉ. सईदा हमीद ने कहा है कि सरकार ने इस प्रथा को खत्म करने के लिए कई योजनाए लागू कि लेकिन राज्यों में उस पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई। अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की राष्ट्रीय संयोजक प्रो. विमल थोराट ने कहा कि सरकारी योजना लागू भी हो जाए तब भी यह समस्या कायम रहेगी। जब तक दलित समुदाय के हाथों में ऐसा काम नहीं आएगा जिससे उनकी गरिमा बढ़े, तब तक इससे मुक्त होना मुश्किल है।

दक्षिण एशिया मानव अधिकार दस्तावेजीकरण केन्द्र के निदेशक श्री रवि नैयर ने कहा कि देश को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त करने का काम जनआंदोलन के जरिये ही संभव है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए टाटा इंन्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसेज के प्रो. शैलेष ने कहा कि सरकारी तंत्र में संवेदनशीलता का अभाव है तथा वे पारंपरिक मानसिकता से ग्रस्त है, जिसके चले यह काम देश में जारी है। उन्होने बताया कि महाराष्ट्र और गुजरात में तो सरकारी महकमों में भी यह काम जारी हैं। एनकॉस पूना के निदेशक श्री अमिताभ बेहार का कहना था कि इस मुद्दे पर व्यापक बहस की जरूरत है। इस अवसर पर जनमुद्दों के फिल्मकार श्री गोपाल मेनन भी उपस्थिति थे। श्री मेनन ने इस मुद्दे पर एक फिल्म ``वी वांन्ट फ्रीडम´´ बनाई है, कार्यक्रम के दौरान इस फिल्म का प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री देवसिंह शेखवत ने किया।

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सुमित कटारिया on 02 April, 2009 10:29;27
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बड़ी जल्दबाज़ी में टाइप किया हुआ लेख है।
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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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