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मथुरा के ग्वाल-बाल, हार्वर्ड के लाल

image गजराज विद्या निकेतन में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के छात्र

मथुरा से 22 किलोमीटर की दूरी पर राया, सादाबाद रोड़ पर एक गांव है रुजगेला। हो सकता है मथुरा में रहने वाले बहुत सारे लोगों को इस गांव का नाम पता ना हो, लेकिन इस गांव की शिक्षा को लेकर सात समुन्दर पार हावर्ड बिजनेस स्कूल के कुछ छात्र बेहद गंभीर हैं। हार्वर्ड स्कूल के इन विद्यार्थियों ने मिलकर `इंडिया स्कूल फंड´ के नाम से एक संस्था बनाई है। इस संस्था के माध्यम से एचबीएस के छात्रों का उद्देश्य भारतीय गांवों में अच्छी शिक्षा पहुंचाना है। इस संस्था की सहायता से पहला स्कूल लगभग तीन साल पहले रुजगेला में `गजराज विद्या निकेतन´ के नाम से प्रारंभ किया गया।

इस गांव के लोगों ने कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन उनके गांव में हावर्ड के बच्चे आएंगे और वे उनके लिए एक स्कूल भी प्रारंभ करेंगे। स्कूल के लिए अपनी जमीन यहीं के रहने वाले कृष्णवीर दीक्षित ने दान स्वरूप दी है। स्कूल के शुरूआत की कहानी बेहद दिलचस्प है। साल 2005 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की तरफ से अपने मित्रों के साथ भारत भ्रमण पर नवीन तिवारी भी आए। नवीन तिवारी आईआईटी कानपुर की अपनी पढ़ाई पूरी करके बिजनेस स्कूल में दाखिला लिया था। जब उनके मित्रों ने भारत के गांव देखने की जीद की तो वे उन्हें अपना ननिहाल दिखाने रुजगेला ले आए। हावर्ड के छात्रों के लिए गांव देखना एक नया अनुभव था। इससे पहले उन्होंने भारतीय गांवों के लिए सुना था। देखा नहीं था। गांव वालों से मिलकर वे काफी प्रभावित हुए। लेकिन रुजगेला की गरीबी और अशिक्षा को देखकर वे व्यथित भी हुए। इसी यात्रा से इंडिया स्कूल फंड की नींव पड़ी। हार्वर्ड से आए छात्रों का मानना था कि यदि गांव के छात्रों को समुचित शिक्षा दी जाए और उन्हें अपने अधिकारों से परिचित करा दिया जाए तो भारत की बहुत सी समस्याओं का हल अपने आप निकल जाएगा। शिक्षा का उजियारा समाज में फैल गया तो समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास की गंदगी दूर होगी। जड़ समाज चेतन होगा। बेरोजगारी दूर होगी। लोग स्वरोजगार का महत्व समझेंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखेंगे। कोई फिर उनके अधिकार छीन नहीं पाएगा।

इस तरह उस यात्रा में आए सभी छात्रों की सहमति से यहां के छात्रों के लिए एक स्कूल शुरू करने का निर्णय लिया गया। स्कूल ने शिक्षा की जिस पद्धति को अपनाया है, उसे ऋषि वैले इन्स्टीट्यूट फॉर एजुकेशन रिसोर्स, चित्तूर (आन्ध्र प्रदेश) ने विकसित किया है। चित्तूर जिले में कृष्णमूर्ति फाउंडेशन द्वारा पिछले लगभग 20 वर्षों से ऋषि वैले एजुकेशन सेन्टर चलाया जा रहा है। इस पद्धति में बच्चे खेल-खेल में पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं। स्कूल में छात्रों को डांटने और पीटने पर सख्त पाबंदी है। इस तरह के स्कूलों में बच्चों की अनुपस्थिति बेहद कम होती है। आन्ध्र प्रदेश के कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इस पद्धति से शिक्षा दी जा रही है। इस स्कूल पढ़ाने के लिए शिक्षक भी ऋषि वैले से बुलाए गए हैं। मथुरा के इस स्कूल में भी दाखिला लेने वाले बच्चे उस समय बेहद कमजोर थे। स्थानीय स्कूलों में तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों का हाल यह था कि वे अपनी किताबें तक नहीं पढ़ पाते थे। इसके पीछे बच्चों में कोई नुक्स नहीं था। बल्कि वे जहां पढ़ रहे थे, वहां सही मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था। गांव के बच्चे बेहद समझदार ही नहीं बल्कि मेहनती भी हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इस बात का परिचय दिया है।

पिछले साल जुलाई में यहां प्रवेश परीक्षा ली गई थी। जिसके लिए 1000 बच्चों ने प्रवेश फॉर्म भरे। जिनमें से 210 बच्चों को दाखिला मिल पाया। स्कूल मे इस समय पहली से तीसरी कक्षा तक के बच्चों को दाखिला मिल रहा है। प्रत्येक साल स्कूल को एक कक्षा आगे बढ़ाने की योजना है। अन्य स्कूलों की तरह यहां पहली-दूसरी-तीसरी कक्षा के छात्र अलग-अलग नहीं बैठते। बल्कि यहां तीनों कक्षा के छात्रों को एक साथ ही बैठाया जाता है। जिससे उनमें आपसी सौहार्द बढ़े। इसी प्रकार स्कूल के बच्चों के लिए कोई खास स्कूल ड्रैस नहीं है। इसकी वजह यह है कि गरीब अभिभावकों पर ड्रैस के अतिरिक्त खर्च का बोझ ना पड़े। इस वक्त छात्रों को किताबें, चप्पल और दिन का खाना स्कूल की तरफ से मिल रहा है। स्कूल में लड़कियों की पढ़ाई निशुल्क है। लड़कों के लिए यह रकम 75 रुपए महीना है। यदि कोई छात्र इसे देने असक्षम है तो उनके लिए यहां निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है। इसके लिए गांव के ही 07 लोगों की एक कमिटी बनी है। जो बच्चों के फीस माफी संबंधी विषय पर निर्णय लेती है।

इंडिया स्कूल फंड का उद्देश्य बेहद साफ है। भारतीय गांवों की प्रतिभा और धन का सही इस्तेमाल गांव में ही हो। वहां के लोग आत्मनिर्भर बने। फंड का उद्देश्य सिर्फ एक गांव में सिमट कर रहना नहीं है। वह देश भर में इस तरह के स्कूल खोलना चाहता है। रुजगेला का केन्द्र इस सफर की एक शुरूआत है। इस स्कूल को एचजीएसई की सहायता ग्रामीण छात्रों को पढ़ाने के लिए सामग्री तैयार करने में और एचएसपीएच की मदद गांव के लिए स्वास्थ सुरक्षा कार्यक्रम बनाने में मिल रही है। इनकी योजना रुजगेला के आसपास सैटेलाइट स्कूल चलाने की भी हैै। उन गांवों में जहां के बच्चों की पहुंच से स्कूल दूर है। एक सर्वेक्षण के अनुसार रुजगेला एक ऐसा गांव है जहां की 90 फीसदी महिलाएं और 70 फीसदी पुरुष पढ़-लिख नहीं पाए। ऐसे गांव में शिक्षा का मशाल जलाने की जो पहल `इंडिया स्कूल फंड´ ने की है, वह काबिले तारीफ है।

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RAJ SINH on 16 June, 2009 02:33;54
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बहुत सही पहल . स्वागत हो !
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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