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आरटीआई का अपना-अपना इस्तेमाल

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सूचना अधिकार कानून के चार साल पूरे होने पर दोनों तरह की समीक्षा सामने आ रही है. कुछ लोग इसे नागरिक को सांसद का दर्जा देनेवाला कानून बता रहे हैं तो कुछ मानते हैं कि इस अधिकार को नाकाम करने के लिए नौकरशाही ने ढाल विकसित कर ली है. दोनों ही बातों में सच्चाई है. आरटीआई का उपयोग कुछ लोग निहित स्वार्थ पूर्ति के लिए जरूर कर रहे हैं लेकिन नागरिक समाज के एक बड़े हिस्से को इसका व्यापक लाभ भी मिल रहा है.

'सूचना अधिकार के अमल के आने से जो शक्तियां सिर्फ विधायक या सांसद के पास थी, आज वही शक्तियां आम जनता के पास हैं।' यह कहना है मध्यप्रदेश जिले के सीहोर निवासी अनूप चौधरी का। सूचना अधिकार के आरंभ से लेकर अब तक अनूप चौधरी अपने जिले सीहोर में सूचना अधिकार के प्रचार प्रसार के अगुआ रहे हैं और उन्होंने नगरपालिका से जुड़े मामले, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, विकास की राशि में हेर फेर, स्वास्थ्य सेवाएं एवं जन्म तथा मृत्यु पंजीकरण, शिक्षा और ग्रामीण विकास से जुड़ी तमाम योजनाओं के क्रियान्वन को लेकर सालों से लड़ाई लड़ते रहे हैं। कई मामलों को तो उन्होंने राज्य सूचना आयोग ही नहीं अपितु केन्द्रीय सूचना आयोग की दहलीज तक पहुंचाया है। अपने अनुभवों के आधार पर अनूप कहते हैं कि-`जिला स्तर पर सूचना अधिकार कानून के क्रियान्वन को सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तरीय विकेन्द्रीकरण जरूरी है, क्योंकि जिले में इस कानून का कोई माई बाप नहीं है। दूसरी बात राज्य सूचना आयोग के ढांचे से जुड़ी है, जो आवेदक की दृष्टि से संतुलित नहीं है, क्योंकि आम तौर पर अधिकतर वर्तमान सूचना अधिकारी पूर्व नौकरशाह ही होते हैं। सूचना अधिकार को जमीनी स्तर पर लागू कराने मं जुटे जानकारों का कहना है कि-`राज्य सूचना आयोग में सामाजिक क्षेत्र अथवा गैर सरकारी क्षेत्र के व्यक्ति का होना भी जरूरी है, क्योंकि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।´

गैर सरकारी संस्था समर्थन से जुड़े मनोज तिवारी सूचना अधिकार के कई रोचक किस्से सुनाते हैं। वे कहते हैं कि-`इस कानून का उपयोग मुख्य तौर पर दो तरह के लोग करते हैं। पहले तो वे जो बहुत व्यथित हैं और दूसरे वे लोग हैं जो राजनीतिक विद्वेष से ग्रस्त हैं। इस वजह से राजनीति से प्रेरित आवेदन ज्यादा होते हैं।´ आगे वे कहते हैं कि कई मामलों में तो गरीब एवं लाचार इतने हतोत्साहित हो जाते हैं कि वे बीच में ही लड़ाई छोड़कर अपनी रोजी रोटी के झमेले में ही उलझ कर रह जाते हैं। ऐसा ही एक मामला रफीकगंज के बहादुर सिंह विश्वकर्मा का है, जिन्होंने इंदिरा आवास के लिए आवेदन किया था और आवास आवंटित होने का उनका नंबर दूसरा था। इस तरह विश्वकर्मा को आवास मिलना लगभग तय था। लेकिन काफी समय टाल मटोल चलती रही तो कुछ स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं के कहने पर उसने पंचायत में आरटीआई दाखिल कर ग्रामसभा का लेखा-जोखा मांग लिया। इस पर पहले तो बहादुर सिंह को डांटा फटकारा गया और बाद में बीपीएल सूची से उसका नाम भी कटवा दिया गया। बहरहाल समर्थन संस्था के कार्यकर्ताओं ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और तहसील में यह जानने के लिए पुन: आवेदन लगाया गया कि बहादुर सिंह विश्वकर्मा के बीपीएल सूची में कितने अंक हैं? बाद में पता चला कि उसके 3 अंक थे, जिससे विश्वकर्मा का बीपीएल राशन कार्ड तो फिर से मिल गया, लेकिन इंदिरा आवास के लिए उसे अभी भी इंतजार करना पड़ रहा है।´ परिणाम यह हुआ कि अब वह सरपंच से कोई भी पंगा लेने के लिए तैयार नहीं है। इस तरह से देखा जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि समाज के दबंगों के प्रभावश इस कानून को तब तक अपेक्षित मुकाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता, जब तक कि वंचितों के पीछे कोई सपोर्ट या प्रोत्साहन नहीं हो।

सूचना अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता शैलेन्द्र सिंह बताते हैं कि-`सूचना अधिकार कानून का सर्वाधिक उपयोग पत्रकार, वकील और जनप्रतिनिधि सरकारी विभागों के खिलाफ दलाली के लिए करते हैं।´ वे बताते हैं कि-`ये लोग सरकारी अधिकारियों को विभागीय हेर-फेर का हवाला देकर उनसे मोटी रकम वसूलकर आरटीआई वापस ले लेते हैं।´ इस तरह देखा जाये तो सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार सूचना अधिकार कानून के आने से अन्य चालाक पेशेवरों के लिए आमदनी का बेहतर जरिया बन गया है, जिससे भ्रष्टाचार की विषबेल और अधिक बढ़ रही हैसीहोर के मूलचंद छाया ने भी अपनी बस्ती के लोगों के राशन कार्ड बनवाने के लिए सूचना अधिकार कानून का उपयोग किया है। वे कहते हैं कि-`इस कानून का फायदा तो सामूहिक होता है, लेकिन इससे आवेदक को व्यक्तिगत नुक्सान उठाना पड़ता है।´ कुछ इसी तरह की बात समर्थन के मनोज तिवारी भी कहते हैं। मनोज को तो कई बार जान से मारने की धमकी भी मिल चुकी है। समर्थन से ही जुड़े शैलेन्द्र सिंह सोलंकी ने धार एवं झाबुआ जिलों के अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि सूचना अधिकार से भ्रष्टाचार की भी एक चेन तैयार हो रही है।

बहरहाल ग्रामीण एवं दूरदराज के इलाकों में गैर सरकारी संगठनों की मार्फत ही सही, सूचना अधिकार कानून ने लोगों को अपने हकों की मांग करने के लिए न केवल प्रेरित किया है, बल्कि इसके सफल प्रयोगों से जनमानस में एक उत्साह भी जागृत हुआ है। ग्रामीण स्तर पर कई ऐसी सेवाएं जिन पर सभी का अधिकार है, लंबे समय से बंद पड़ी थी, जिसे इस कानून के आने के बाद पुन: जीवनदान मिला है। ऐसा ही एक मामला सीहोर जिले के राजूखेड़ी गांव का है, जहां डाकिया आता ही नहीं था। परिणामत: कई बारजरूरी सूचनाएं समय पर नहीं मिल पाने से लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। हालात तो ये थे कि गांव के लोग डाकिये को पहचानते तक नहीं थे। राजूखेड़ी के धर्मप्रकाश ने सूचना अधिकार का आवेदन डाक विभाग में देकर जानकारी मांगी कि गत छ: महीनों में राजूखेड़ी गांव में कुल कितने पत्र आये हैं? परिणाम यह हुआ है कि डाकिया 2 दिन तक धर्मप्रकाश के घर पर पूरे दिन बैठा रहा। लेकिन मुलाकात नहीं हो पा रही थी, तो एक दिन सुबह 6 बजे ही डाकिया धर्मप्रकाश के घर पहुंच गया और माफी मांगकर कहा कि आगे से वह समय पर सबकी डाक पहुंचा दिया करेगा। इस तरह से गांव की अन्य व्यवस्थाओं जैसे-स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास कार्यों का लेखा-जोखा जानने के लिए भी सूचना अधिकार कानून कारगर साबित हुआ है। इससे न केवल ग्रामसभाएं समय पर होने लगी, बल्कि सरपंच सचिवों की हेर-फेर पर भी लगाम लगने लगी है। इससे न केवल गांव के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए विभिन्न योजनाओं से मिलने वाले लाभ के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है, बल्कि उन योजनाओं से मिलने वाली लाभ की प्रक्रिया के बारे में भी जाना जा सकता है।

विकास परियोजनाओं के क्रियान्वन, कानूनी सशक्तिकरण, गरीबी उन्मूलन, स्थानीय स्वशासन की बहाली और सार्वजनिक सेवाओं की निचले स्तर पर पहुंच सुनिश्चित करने में सूचना अधिकार कानून रामबाण की तरह है। पन्ना जिले की दलित बहुल ग्राम पंचायत पड़रहा का उदाहरण देते हुए शैलेन्द्र सिंह बताते हैं कि इस कानून के उपयोग से कैसे लोगों ने ग्रामसेवक की नकेल कस दी और उसे उसकी जिम्मेदारियों का अहसास दिलाया। यही नहीं ग्रामीणों ने संगठित होकर अपने ग्राम की व्यवस्थाओं को सकारात्मक हस्तक्षेप से ठीक करने की ठानी ली और 20 सदस्यीय एक सामुदायिक निगरानी समिति का गठन किया गया। लोगों ने सबसे पहले इस समिति की मार्फत यह जानना चाहा कि हमारे ग्राम के विकास से जुड़े कौन से अधिकारियों पर जिम्मेदारी रहती है? और उनके निर्धारित काम क्या-क्या हैंर्षोर्षो इससे लोगों को गांव की व्यवस्था को सुधारने में बड़ी मदद मिल गई। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम जैसे बैंकों से मिलने वाली सेवाओं में अनियमितताओं को भी इससे दूर किया जा सकता है। राजूखेड़ी के मोहन सिंह सीहोर स्थित पंजाब नेशनल बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड एवं हाऊसिंग लोन की प्रक्रिया की जानकारी मांगी तो पहले, उन्हें अधिकारियों ने टरका दिया और कहा कि यह सूचना अधिकार कानून के दायरे में शामिल नहीं है। लेकिन जब मोहन सिंह ने अडिग होकर कहा कि यदि उन्हें जानकारी नहीं मिली तो वे आगे कार्यवाही करेंगे। इस पर बैंक से उन्हें प्रक्रिया की जानकारी मिल गई। जिसके आधार पर उन्होंने हाऊसिंग लोन के लिए आवेदन किया और उन्हें डेढ़ लाख का लोन भी स्वीकृत हो गया।

सूचना अधिकार कानून में कुछेक खामियां हो सकती हैं, लेकिन इसकी उपयोगिता को कतई नकारा नहीं जा सकता और निस्संदेह सूचना अधिकार ग्रामीणों एवं वंचितों को उनका मौलिक हक ही नहीं दिलाता बल्कि समाज में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो इस बात की क्षमता भी इस कानून है। अब जबकि सूचना अधिकार कानून के 4 साल पूरे हो रहे हैं तो ऐसे में हमें अभी तक के अनुभवों से सबक लेकर अपेक्षित सुधार हेतु प्रयास करने चाहिए। इससे न केवल जनाधिकार प्राप्ति का एक मुकम्मल अस्त्र समाज को मिलेगा, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रख पाने में भी मदद मिल पायेगी।

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डॉक्टर पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) 0141 -2222225 ज on 14 October, 2009 23:21;06
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सूचना के अधिकार की अफसरों कितनी दुर्दशन कर ये बात बहुत कम लोगों को पता है. हो सकता है की कुछ चालक किस्म के लोग सूचना के अधिकार का दुरूपयोग करते हों, लेकिन फिर भी इस कानून के बने रहने तथा इसके और अधिक मजबूत किये जाने की जरूरत है. लेखक को उन योगों ले शोषित होने की चिंता हा, जो साद से शोषण करते आये हैं. सबसे कदा मुद्दा तो ये है की जा सूचना अधिकारी लोगों से फीश लेकर भी हाथों हाथ सूचना नहीं देते हैं और डाक से सूचना के नाम पर रद्दी के कागज भेज रहे है. अभी भी इस कानून में बहुत कमी हैं. जिसके कर्ण इस पर अफसरों का पूरा कब्जा है.
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sushil raghav on 26 October, 2009 15:51;04
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it right, but the rti is under threat fo amendment. please write a story to save it.
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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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