अडनी महा ठगिनी हम जानी
"यह जंगल हमारे बुजुर्गों का लगाया हुआ है, इसे हम कटने नहीं देंगे! हमने 10 फुट रास्ता सरकार से मांगा था, जो हमें नहीं मिला, जबकि अडनी समूह को पूरा जंगल दिया जा रहा है।" यह कहना है महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले ताड़ोबा अंधेरी बाघ अभ्यारण्य के बफर क्षेत्र के गांव मामला के सरपंच भारत काटवले का। उल्लेखनीय है कि चंद्रपुर शहर से सटे घने जंगल ताडोबा अंधेरी टाइगर रिजर्व के लिए एक ढाल की तरह हैं और ये जंगल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक दक्षिणवर्ती कॉरीडोर का हिस्सा है जो बाघों के प्रजनन एवं उनके अस्तित्व के लिए काफी अहम् है।
क्या बिजली की किल्लत दूर करने के नाम पर सदियों पुराने जंगल, जैव विविधता, पर्यावरण और वनवासियों के जीवन को दांव पर लगाया जा सकता है? क्या इसके लिए हरे-भरे जंगल को खदान में तब्दील करना सही होगा? कुछ इसी तरह के सवाल आज महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की जनता सरकार से पूछ रही है।
नेचुरल क्लब नामक संस्था से सम्बद्ध पर्यावरणकर्मी प्रकाश कामडे का कहना है कि-`यह कॉरीडोर यदि नष्ट हुआ तो बाघों का प्रजनन प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायेगा, जिसका सीधा असर बाघों की संख्या पर पड़ेगा। साथ ही जानवरों का इंसान से सीधा टकराव भी बढ़ जायेगा। पर्यावरणवादी बंडू धोतरे बताते हैं कि-`पिछले 4 सालों में 55 लोग बाघों के हमले से मारे गए हैं, 1,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं और हजारों जानवर भी मारे गए हैं।´ ताडोबा में 45 बाघों के होने की बात कही जा रही है, जिसमें से 6 लोहारा स्थित प्रस्तावित अडनी माइन्स के क्षेत्र में ही हैं। दूसरी ओर यह क्षेत्र 18 पशु प्रजातियों समेत करीब 225 प्लांट्स की स्पीसीज का बसेरा है। यहां रहने वाले बाघ और तेंदुए समेत 9 प्रजातियां लुप्तप्राय हैं। अगर जंगल काटकर यहां खनन शुरु होता है तो खुदाई में हर दिन 55 टन विस्फोटक इस्तेमाल होगा, जो बाघों समेत अन्य वन्य प्राणियों, पर्यावरण एवं वनवासियों के लिए खतरनाक साबित होगा। ताडोबा टाइगर रिजर्व बाघों की जनसंख्या के घनत्व की तुलना में देश का सबसे बेहतर टाइगर रिजर्व है। लेकिन अडनी की प्रस्तावित इन कोयला खदानों के चलते इसके अस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह लग गया है?
उम्र महज 22 साल, लेकिन चंद्रपुर जिले के लोहारा गांव निवासी किशोर तलांडी समूचे गांव, समुदाय एवं जंगल से जुड़ी समस्या बयां करते हैं। वे कहते हैं कि-`बाहर के जो लोग लकड़ियां बेच रहे हैं वो भी नहीं बेच पायेंगे, क्योंकि जंगल नहीं बचेगा। उधर काम नहीं मिलेगा, जो रुपये मिलेंगे वो लोग उड़ा देंगे और फिर कटोरा लेकर भीख मांगना पड़ेगा। आज मैं यहां दो सौ से तीन सौ रुपये तक कमा लेता हूं। लेकिन आगे क्या होगा? अडनी को आने नहीं देना, अडनी आया तो हम सब को जाना पड़ेगा।´ उल्लेखनीय है कि चंद्रपुर जिले का ताडोबा अंधेरी टाइगर रिजर्व बाघों के लिए स्वर्ग माना जाता है। लेकिन वहां के बफर जोन में एक या दो नहीं बल्कि छ: कोयला खदानें प्रस्तावित हैं। प्रस्तावित खनन क्षेत्र जुनोना संरक्षित वन क्षेत्र के अलावा लोहारा गांव की सीमा में स्थित है और कोल परियोजना के कोर क्षेत्र में स्थित लोहारा गांव को विस्थापित किया जाना है। महाराष्ट्र के गोदिंया जिले के तिरोडा में प्रस्तावित अडनी ग्रुप्स लिमिटेड के पावर प्लांट के लिए आवश्यक कोयले की आपूर्ति हेतु कोयला मंत्रालय की ओर से अडनी ग्रुप को चंद्रपुर शहर से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर और ताडोबा अंधेरी टाइगर रिजर्व से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर लोहारा ईस्ट और लोहारा वेस्ट दो कोल ब्लॉक आवंटित किए जा चुके हैं। इस बात को लेकर पूरे चंद्रपुर के लोगों में आक्रोश है और जनता सड़कों पर उतर चुकी है। लोहारा के 42 वर्षीय प्रकाश वेलादी से जब पूछा गया कि तुम्हारा घर जब अडनी माईन्स की भेंट चढ़ जायेगा तो क्या करोगे? जवाब में उसने कहा कि-`घर कैसे जायेगा, हम जायेंगे नहीं तो कैसे जायेगा? हम सब मिलकर रोकेंगे, हम सदियों से यहां रह रहे हैं, जंगल हमारा है और हम जंगल के हैं।´ लेकिन लोहारा के सरपंच दयानंद बंकुवाले कंपनी का पक्ष लेते हैं, वे कहते हैं कि-`पर्यावरण से हमें क्या मिलेगा?´ दूसरी ओर 36 वर्षीय इंडस्ट्रियल वर्कर प्रकाश वाडई कहते हैं कि कंपनी के पक्ष में लोहारा के किसी ग्रामीण ने हस्ताक्षर नहीं किया था, हमने तो इस परियोजना के विरोध में सरपंच को हस्ताक्षर दिये थे, जिसके कवरिंग लेटर को अडनी के पक्ष में बदल कर कलेक्टर को दे दिया गया। हमको उठाने की कोशिश हुई तो सड़कों पर आयेंगे और जरूरत पड़ी तो जान भी देगे।´ सामाजिक कार्यकर्ता भी लोहारा के सरपंच को कंपनी द्वारा बरगलाये जाने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि लोहारा से कुछ ही दूरी पर चंद्रपुर नगरपालिका है, उनका भी कुछ मत है, जिसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता।
पर्यावरणवादी सुरेश चोपने के मुताबिक-`चंद्रपुर जिले में पहले से ही 36 खदानें संचालित की जा रही हैं। लेकिन यह सबसे बड़ी खदान होगी होगी, जिससे करीब 1,750 हेक्टेयर में फैला हरा-भरा जंगल ही नष्ट नहीं होगा, बल्कि पहले से पानी की समस्या का सामना कर रहे चंद्रपुर में पानी का अकाल पड़ जायेगा। समस्या बेहद विकराल होने जा रही है क्योंकि जिले में कुल 22 खदानें प्रस्तावित हैं, जिसमें से 6 खदानें जंगल काटकर बनने वाली हैं।´ ताडोबा टाइगर रिजर्व के बफ़र जोन और आसपास अडनी के अलावा, मुरली एग्रो, औरंगाबाद पावर, स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन और सनप्लेक्स कंपनियों की नज़र गड़ी है। एक ओर जहां अडनी ग्रुप को खनन के लिए दो हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि लीज पर दिये जाने से पर्यावरणवादियों समेत चंद्रपुर की जनता को भविष्य में भूजल स्तर में भीषण गिरावट का डर सता रहा है, वहीं पहले से ही प्रदूषण की चादर से ढंके चंद्रपुर जिला और अधिक प्रदूषित हो जायेगा। स्थानीय विधायक सुधीर एस.मुन्गंटीवार कहते हैं कि-`इंडस्ट्री लगाने की एवज में दोगुना जंगल लगाने की बात महज कागजों तक रही है। जंगल के बदले जंगल लगाने की जो बात कही जाती है, सरकार दिखाए कि कहां जंगल लगाए गए हैं? यहां पर पहले ही बहुत सी माईन्स हैं। जितना रोजगार मिला, उससे ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ा। जिसके पास खेती थी उसे तो जमीन का मुआवजा मिल गया, लेकिन जो खेत मजदूर था वह बेरोजगार हो गया।´
अडनी की माईन्स के कारण लोहारा गांव विस्थापित होगा, जबकि मामला, घंटाचौकी, चकबोड़ा, पदमापुर, दुर्गापुर, निंबाड़ा, वयगांव जैसे कई गांव प्रभावित होंगे। लोहारा में जमीन के मुआवजे के तौर पर 8 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से दिये जाने की बात कही जा रही है। बाकी गांवों को कोई मुआवजा नहीं मिलने वाला है। स्थानीय ग्रामीणों में से महज 25 फीसदी लोगों के पास खेती है, करीब 60 फीसदी लोग एफडीसीएम में मजदूरी करके पेट पालते हैं, जबकि शेष लोग अन्य स्थानों पर मजदूरी करते हैं। मुन्गंटीवार के मुताबिक-`वैसे भी खुली खदानों में लोगों को रोजगार नहीं मिलता। प्रस्तावित परियोजना के मुताबिक महज 250 से 300 लोगों को ही रोजगार मिलेगा। लेकिन इसके कारण 4 लाख आबादी पर प्रदूषण का असर होने वाला है।´ दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन बरकरार रखने वाले करीब 13 लाख वृक्षों को इस कथित विकास की बेदी पर बलि होना पड़ेगा। इस जंगल में दुनिया भर के करीब 280 क्लोन्स लाकर संरक्षित किए गए हैं, जो एक अमूल्य धरोहर है। खनन शुरु हुआ तो यह धरोहर नष्ट हो जायेगी। प्रदूषण के चलते चंद्रपुर जिले में अम्लीय वर्षा होती है। खदानों की संख्या बढ़ेगी तो प्रदूषण भी बढ़ेगा, ऐसे में अम्लीय वर्षा की मात्रा भी बढ़ जाएगी.ये दण्डकारण्य का जंगल है और इसकी बायोडाइवर्सिटी सैकड़ो वर्ष पुरानी है। राष्ट्रीय वन नीति 1988 के मुताबिक सभी प्रदेशों में कम से कम 33 प्रतिशत जंगल होने चाहिए। पिछले विधानसभा सत्र में महाराष्ट्र वन मंत्री ने प्रदेश में 20 प्रतिशत जंगल होने की बात कही थी, जबकि उपग्रह चित्रों के मुताबिक महज 14 फीसदी जंगल इस राज्य में बचे हैं। बंडू धोतरे इन खदानों के विरोध और जंगल बचाने की मांग करते हुए दो बार आमरण अनशन कर चुके हैं। जब पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री जयराम रमेश की ओर से इन कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द किए जाने की बात कही गई तो उन्होंने अनशन खत्म किया। हालांकि बंडू धोतरे जयराम रमेश की बात से अभी भी आश्वस्त नहीं हैं। इससे पहले वे अडनी ग्रुप को लोहारा में खनन की अनुमति दिये जाने के खिलाफ सत्याग्रह भी कर चुके हैं, लेकिन प्रदेश के वन मंत्री बबनराव पचपुटे के आश्वासन के बाद उन्होंने इसे छोड़ दिया था। लेकिन अब धोतरे वन मंत्री पचपुटे पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि-`वन मंत्री इस परियोजना को रद्द करने की बजाय इसे हरी झण्डी दिखाने के लिए प्रतिबद्ध जान पड़ते हैं और वे इस सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही करने के लिए वन अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं।´ फिलहाल करीब 25 स्वयंसेवी संस्थाओं ने एकजुट होकर लोहारा में खनन की अनुमति देने के सरकारी फैसले के खिलाफ अंतिम क्षण तक लड़ने का मन बना लिया है।
इस मुद्दे को लेकर जमकर राजनीति हो रही है और राजनीतिक पार्टियां इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीतिक रोटियां सेंकने से नहीं चूक रही हैं। यह देखना अभी बाकी है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए तमाम आयोजन करने वाली एवं इसके लिए कानून बनाने वाली हमारी लोकतांत्रिक सरकार इसके लिए किस हद तक संजीदा है? बहरहाल प्रदेश के वनमंत्री बबनराव पचपुटे ने समस्या से जुड़े तथ्य जुटाने के नाम पर एक स्टडी ग्रुप बनाया था। कुछ समय पूर्व पर्यावरणवादियों के वकील नीरज खण्डेवाले ने पचपुटे द्वारा गठित इस स्टडी ग्रुप को अविश्वसनीय बताया था, उनका कहना था कि इस ग्रुप को गठित करने का उद्देश्य पर्यावरणीय क्षति को कम करके आंकना था।´ बंडू धोतरे ने 7 जुलाई 2009 को इस स्टडी ग्रुप की पहली मीटिंग में ही अपना इस्तीफा सौंप दिया और 20 जुलाई को पुन: अनशन शुरु कर दिया। इस बीच चंद्रपुर की समस्त जनता इस आंदोलन से जागरूक हो गई और लोग रास्ते पर उतर आये, 28 जुलाई को पूरा चंद्रपुर बंद रहा। गौर करने वाली बात यह भी है कि सन् 1999 में लोहारा ईस्ट और लोहारा वेस्ट के इन्हीं कोल ब्लॉकों को एससी और निप्पॉन डेनरो पॉवर प्रोजेक्ट को वन्य जीव संरक्षण की दृष्टि से पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आवंटित करने से इंकार कर दिया गया था। फिर अडनी को आज इस इलाके में खनन के लिए मंजूरी कैसे दी जा रही है? यही सवाल मुम्बई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में दायर याचिका में भी पूछा गया था। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर आज पूरी सरकारी मशीनरी अडनी ग्रुप को कोल ब्लॉक आवंटित कराने में क्यों जुट गई है? सरकार पर अडनी के पक्ष में गुटबाजी करने का आरोप भी लगाया जा रहा है, जो उसे को कटघरे में खड़ा करता है।
बहरहाल तडोबा टाइगर रिजर्व के नजदीक अडानी पावर कंपनी को कोयला खदान के आवंटन से महाराष्ट्र की राजनीति में उबाल आ गया है। कांग्रेस, बीजेपी और शिवसेना ने इसे टाइगर रिजर्व के लिए खतरा बताया है, वहीं एनसीपी चुप रहकर इसे अपना समर्थन दे रही है। अब कंपनी के खिलाफ विदर्भ के सांसद भी मैदान में कूद पड़े हैं। अलग-अलग पार्टियों के कई सासदों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर टाइगर रिजर्व में बचे 45 बाघों को बचाने की अपील की है। एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के जिले गोंदिया के तिरोडा में एक थर्मल पावर प्लांट लगा रही है। इसी थर्मल प्लांट के लिए करीब 200 किलोमीटर दूर चंद्रपुर से कोयला ले जाने का विरोध किया जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों के तमाम विरोधों के बावजूद राज्य के वनमंत्री और एनसीपी नेता बबनराव के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल का कहना है कि मामले को सुलझा लिया जाएगा लेकिन कांग्रेसी नेता प्रफुल्ल पटेल के बयान से सहमत नहीं है। कंपनी के अधिकारी इस मसले को सरकार और स्थानीय लोगों के बीच की बात कहकर बोलने को तैयार नहीं हैं। महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं ने मामला यूपीए अध्यक्ष सोनिया गॉंधी और प्रधानमंत्री दोनों के पास भी पहुंचा दिया है। इस बीच प्रदेश भाजपा को सरकार के खिलाफ पर्यावरण की आड़ में एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
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