हमारा शहर, उनकी परिवहन व्यवस्था
वी शांताराम और बी राजाराम दोनों नाम सुनने में एक दूसरे के सगे संबंधी जैसे लगते हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. वी शांताराम जो सपने देखते थे उसे फिल्म की एक पट्टी पर उतार देते थे और फिर उस सपने का पूरा जहां दीदार करता था. बी राजाराम के साथ ऐसा नहीं है. उन्होंने भी एक सपना देखा था लेकिन उससे हम शायद ही कभी दो चार हो पायें.
बी राजाराम कोंकण रेल कारपोरेशन के अध्यक्ष थे और आजकल रिटायर होकर हैदराबाद में रहते हैं. भारतीय रेल के इतिहास में एन्टी कोअलिशन डिवाइस का आविष्कार करके नाम कमानेवाले बी राजाराम ने एक बड़ा ही महत्वाकांक्षी सपना देखा था. वह सपना था- स्काई बस मेट्रो का. 2007 तक राजाराम ने बहुत जी तोड़ कोशिश की कि भारतीय शहरों के लिए स्काई बस मेट्रो को स्वीकार कर लिया जाए और शहरों के भविष्य की परिवहन व्यवस्था तैयार करने की दिशा में कदम उठाया जाए. उन्होंने जब यह सपना देखा था तब वे कोंकण रेल कारपोरेशन के अध्यक्ष थे. उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. अटल सरकार ने उनके सपने को पूरा सम्मान देते हुए गोवा में प्रायोगिक ट्रैक बनाने की अनुमति दे दी. चार साल के अंदर एक मील का ट्रैक बनकर तैयार भी हुआ. लेकिन सितंबर 2005 में अपने पहले ही परीक्षण में एक दुर्घटना हो गयी जिसमें एक कर्मचारी की मौत हो गयी और दो घायल हो गये. बस इसी दुर्घटना के साथ ही भारत में स्काई बस मेट्रो भी सदा सर्वदा के लिए एक दुर्घटनाग्रस्त परियोजना होकर रह गयी. अगले एक दो सालों तक राजाराम ने कोशिश की, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को चिट्ठियां लिखीं लेकिन कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई. आखिरकार वे चुप होकर बैठ गये.
लेकिन शहर तो फैल रहे हैं. शहरों में लोग बढ़ रहे हैं और सड़क परिवहन उन सभी लोगों सड़क मार्ग से परिवहन मुहैया नहीं करवा सकती. देश की राजधानी दिल्ली में प्रति गाड़ी सवा पांच किलोमटर सड़क ही उपलब्ध है. और गाड़ियों की संख्या में जिस प्रकार से दिन दूनी रात चौगुनी की बढ़ोत्तरी हो रही है उससे सवा पांच किलोमीटर का यह आंकड़ा सिकुड़ता ही चला जाएगा. फिर क्या करेंगे? शहर में ही एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा कैसे करेंगे? इसके लिए पिछले एक दशक में सड़क परिवहन के अलावा अन्य तरीकों पर विचार गंभीर हो चला है. राज्य सरकारें जो अभी तक शहरी गरीबी और गांव के पिछड़नेपन को ही अपना नारा बनाती रही हैं अचानक उन्हें अहसास होने लगा है कि हमारे शहर सुरसा की तरह फैल रहे हैं. और किसी भी शहरी व्यवस्था के लिए अच्छी परिवहन प्रणाली उसकी सबसे मूलभूत जरूरतों में से एक है. अपनी इसी एक खूबी के चलते शहर शहर होता है. लेकिन इसी मामले में हमारे शहर पूरी तरह से चक्रव्यूह में फंस चुके हैं. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सलाह दे रही हैं कि छोटी कारों से चलने की आदत डालिये तो जयपुर जैसे अपेक्षाकृत बहुत छोटे शहर भी मेट्रो रेल की बांग लगा रहे हैं.
इस आपाधापी में विकल्प रूप में हमारे नौकरशाहों और राजनेताओं को जो विकल्प दिख रहा है वह या तो मेट्रो रेल है या फिर मोनोरेल. पूरी दुनिया में शहरी परिवहन प्रणाली में सड़क परिवहन के अलावा मेट्रो रेल ही सबसे पुराना सफल विकल्प बना हुआ है. भारत के चार बड़े महानगर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में भी मेट्रो ट्रेनें (ईएमयू या लोकल ट्रेन) दूसरी सबसे कारगर प्रणाली है. लेकिन दिल्ली मे मेट्रो रेल के प्रवेश ने इस व्यवस्था को और अधिक व्यवस्थित तरीके से सामने रखा और रेल विभाग के थकाऊ और पकाऊ रवैये से उलट एक स्मार्ट रेल परिवहन प्रणाली को साकार किया. दिल्ली में इस साल के आखिर तक लगभग 180 किलोमीटर मेट्रो ट्रैक पर ट्रेनों का सफर शुरू हो जाएगा. मेट्रो के निदेशक इस साल के आखिर सितंबर में दूसरे चरण की परियोजना की समाप्ति के साथ ही बतौर प्रबंध निदेशक विदाई ले लेंगे लेकिन दिल्ली मेट्रो का काम जारी रहेगा. अभी दिल्ली में दो चरणों में मेट्रो ट्रैक का निर्माण और होना है जो आनेवाले दस वर्षों में पूरा होगा. योजना है कि 2020 तक दिल्ली और उसके उपनगरों में 400 किलोमीटर का मेट्रो ट्रैक बिछा दिया जाए. श्रीधरन कहते हैं कि बिना इसके दिल्ली की परिवहन जरूरत को पूरा नहीं किया जा सकता. दिल्ली सरकार इसे भी समूचा विकल्प नहीं मानती इसलिए वह दिल्ली में दो और तरह के परिवहन प्रणाली को लागू करना चाहती है. इसमें एक है, बीआरटी कारीडोर का निर्माण और दूसरा है मोनोरेल. बीआरटी कारीडोर का पहला चरण पूरा हो गया है और अभी तक सिर्फ परिवहन व्यवस्था को जटिल बनाने के अलावा इसने और कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है. अगली कवायद मोनोरेल की है.
मेट्रो रेल और मोनोरेल दोनों ही भारतीय शहरों की बसाहट के अनुकूल नहीं है. तटीय भारतीय शहरों को अलग कर दें तो भारतीय शहर लंबवत नहीं बल्कि वर्तुल बसे हैं. हर शहर का एक केन्द्रीय स्थान है जिसके आस पास शहर का बेतरतीब विस्तार होता गया है. ऐसे में राजाराम की स्काईबस भारत के वर्तुल शहरों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है. इसकी तकनीकि और निर्माण पूरी तरह से भारतीय है और खर्चा बहुत कम. अगर इस दिशा में हम थोड़ा और शोध करें तो शायद स्काई बस मेट्रो की एक ही ट्रैक का हम दोहरा इस्तेमाल कर सकते हैं जो स्काई बस और सड़क परिवहन दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
दिल्ली सरकार मुंबई की तर्ज पर दिल्ली में भी मोनोरेल का संचालन करना चाहती है. मुंबई में पिछले एक साल से 20 किलोमीटर लंबे मोनोरेल ट्रैक का निर्माण चल रहा है जो सेन्ट्रल मुंबई को ईस्टर्न हिस्से से जोड़ेगा. परियोजना का पहला हिस्सा इस साल सितंबर तक और दूसरा हिस्सा अगले साल अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद है. मुंबई की ही तर्ज पर दिल्ली सरकार तीन अलग-अलग रूट पर मोनोरेल का निर्माण करना चाहती है. इसमें सबसे लंबा रूट 22 किलोमीटर का रोहिणी से लालकिला के बीच है जो कि पुरानी दिल्ली से अति व्यस्त इलाके से होकर गुजरेगा. मुंबई में लार्सन एण्ड टुब्रो के साथ मिलकर मोनोरेल चलाने की योजना पर काम कर रही कंपनी मलेशिया की कोमी इंजिनियरिंग ने दिल्ली सरकार के सामने भी एक प्रेजेन्टेशन दिया है और इन तीन वैकल्पिक रास्तों पर मोनोरेल बनाने की सहमति मांगी है. मोनोरेल मेट्रो रेल की अपेक्षाकृत सस्ती और भीड़भाड़ वाले इलाकों से होकर गुजरने में सक्षम है इसलिए दिल्ली सरकार ने भी इस बारे में सकारात्मक संकेत दिये हैं. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या भारत में राज्य सरकारों को वैकल्पिक परिवहन के नाम पर मेट्रो और मोनोरेल के अलावा कोई और विकल्प नहीं है?
तकनीकि रूप से देखें तो मोनोरेल भी अभी तक सिर्फ सजावटी सामान ही है. दुनिया में सबसे लंबी मोनोरेल ट्रैक जापान के ओसाका शहर में है जिसकी लंबाई 28 किलोमीटर है. इसकी शुरूआत 1990 में हुई थी. नहीं तो दुनिया में जहां कहीं भी मोनोरेल संचालित हो रही हैं वे तीन से 10 किलोमीटर के बीच से अधिक की यात्रा नहीं करती हैं. कुछ कुछ कलक्ता के ट्राम जैसा. फिर भी भारत में ऐसी परिवहन प्रणाली पर विचार करना गैरकानूनी तो कतई नहीं है. लेकिन दिक्कत यह है कि न तो मेट्रो रेल की प्रणाली और तकनीकि यहां की अपनी है और न ही मोनोरेल की. अगर एक बार मास ट्रान्सपोर्ट सिस्टम किसी बाहरी कंपनी के भरोसे तैयार करते हैं तो फिर भविष्य में अपने दम पर कोई व्यवस्था खड़ा करना बिल्कुल ही असंभव हो जाता है. फिर तो कंपनी जो तकनीकि देगी उसी के हिसाब से आपको अपनी परिवहन प्रणाली विकसित करनी होगी. और यह कोई टाटा से बस खरीदारी जैसा भी नहीं है कि उसे धमकी देकर किसी और कंपनी के पास चले जाएं (हालांकि इतना करना भी किसी सरकार के बूते में नहीं है.) फिर रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दिशा में हम अपनी किसी तकनीकि के बारे में गंभीरता से क्यों विचार नहीं करते?
इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. इसे समझने के लिए एक बार फिर बी राजाराम को याद करना होगा. राजाराम ने जिस स्काई बस मेट्रो की अवधारणा प्रस्तुत की थी वह भारत के महानगरों के लिए न सही नगरों के लिए वरदान था. लेकिन एक छोटी सी दुर्घटना को बहाना बनाकर उस सपने का ही अंत कर दिया गया. और जानते हैं स्काईबस की सबसे अधिक आलोचना किसने की? किसी और ने नहीं बल्कि खुद श्रीधरन ने, जो कि दिल्ली मेट्रो के कर्ता धर्ता हैं. उन्होंने ऐसा क्यों किया इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. श्रीधरन के ऊपर दुनिया की कुछ बड़ी तकनीकि कंपनियों ने दांव लगा रखा है इसलिए वे भला कब चाहेंगे कि भारत की अपनी कोई परिवहन प्रणाली विकसित हो. इसलिए श्रीधरन ने अपने ही शिष्य रहे राजाराम की स्काई बस योजना का हर संभव विरोध किया. एक बार तो दिल्ली सरकार परीक्षण के तौर पर एक रूट बनाने में सिद्धांतत: सहमत भी हो गयी थी लेकिन श्रीधरन के विरोध के कारण उसे पीछे हटना पड़ा. आखिरकार राजाराम भारत की राज्य सरकारों को यह समझाने में पूरी तरह से नाकाम रहे कि यह जो परिवहन व्यवस्था है यह सबसे सस्ती परिवहन व्यवस्था है. स्काई बस पचास पैसे किलोमीटर पर यात्रा करवाने में पूरी तरह से सक्षम है और इसकी परियोजना लागत भी मेट्रो के मुकाबले आधे से भी कम आती है. अगर स्काई बस परियोजना सिरे चढ़ती तो भारत की कुछ वैगन बनाने वाली कंपनियां, ट्रैक की तकनीकि और भारतीय शहरों की बसाहट के अनुसार एक परिवहन व्यवस्था विकसित होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राजाराम कहते रह गये कि यह भारत की अपनी परिवहन प्रणाली है और अपने ही देश में विकसित हो रही है, लेकिन हमारे हुक्मरानों ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया. उल्टे अब खबर आयी है कि मेट्रो के बाद सरकार दूसरे नंबर पर मोनोरेल को तजरीह देगी और उन इलाकों में परिवहन प्रणाली को मजबूत करेगी जहां मेट्रो रेल पहुंचना संभव नहीं है. लेकिन मलेशिया की मोनोरेल को अपना पैर जमाने में सफलता मिलती है और राजाराम असफल हो जाते है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे बिल्कुल यहीं के हैं और भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को खुश करने के उपाय शायद उनके पास नहीं हैं.
ऐसा राजाराम के साथ ही नहीं हुआ है. अपने देश में किसी भी क्रांतिधर्मी विचारक, खोजी को कोई जगह तब तक नहीं मिलती जब तक कि उसके ऊपर यूरोप या अमेरिका का ठप्पा न लग जाए. राजाराम के साथ भी ऐसा ही हुआ है. चीन गूगल के साथ जो व्यवहार कर रहा है वह अनैतिक भले ही हो लेकिन यह भविष्य के गणराज्य पर काबिज होने का चीन का अपना स्टाईल है. चीन के पास भविष्य का एक रोडमैप है और उसे पूरा करने के लिए वह नैतिक अनैतिक की बाधा का कतई परवाह नहीं करता है. दुर्भाग्य से भारत का अपना कोई सपना नहीं है. अपनी कोई योजना नहीं है. अपने किसी स्वत:स्फूर्त विचार के लिए कोई जगह नहीं है. ऐसा लगता है कि भारत विकास के यूरोपीय मॉडल की एक भद्दी फोटोकापी होकर ही खुश है.
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
Post your comment