जगन्नाथ के रथ से परे
जगन्नाथ मंदिर में कभी पुजारी दलित होते थे. लेकिन वह वक्त भी आया जब दलितों के लिए भगवान जगन्नाथ के कपाट बंद हो गये. इसी समय ऐसे धर्म की शुरूआत होती है
जहां मंदिर तो था लेकिन मूर्ति गायब थी. महिमा धर्म के बारे में सबसे पहले 1882 में एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल ने अपने जर्नल में जिक्र किया था. एशियाटिक सोसायटी ने बताया था कि उड़ीसा के संभलपुर संभाग में एक नव-हिन्दुवादी आंदोलन मुखर हो रहा है जिसकी जड़ें किसी पश्चिमी सुधार आंदोलन नहीं बल्कि भारतीय समाज के अपने अंदर छिपी हुई हैं. इसके बाद 1909 में बंगाल गजेटियर में महिमा धर्म का जिक्र मिलता है और 1911 में बी सी मजुमदार द्वारा सोनपुर के राजा को दी गयी अपनी रिपोर्ट में भी संभलपुर के इस धर्म सुधार आंदोलन का जिक्र आता है. 1880 से 1911 के बीच उत्कल में महिमा धर्म का तेजी से विस्तार हुआ.
जगन्नाथ मंदिर के 1811 के पत्रचार और रिकार्ड में इस बात का जिक्र मिलता है कि कैसे मंदिर में जातीय विद्वेष की जड़ पड़ी उसके कुछ सालों बाद ही महिमा धर्म का उदय होता है. महिमा धर्म की स्थापना करनेवाले आलेख गोस्वामी 1826 में उत्कल आये थे. ऐसा समझा जाता है कि वे हिमालय की ओर से आये थे और यहां कपिला पर्वतमाला के मध्य धेनकनाल में अपना निवास बनाया था. महिमाधर्म में शामिल लोगों का विश्वास है कि आलेख गोस्वामी अर्थात महिमा स्वामी कोई सामान्य पुरूष नहीं थे. वे एक महान चेतना थे जो एक नयी क्रांति का सूत्रपात करने धरती पर आये थे. भक्तों में ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान जगन्नाथ ने महिमा गोस्वामी को दीक्षित किया था इसके लिए महिमा गोस्वामी ने 12 साल जल पर, और 12 साल केवल फलों पर रहकर कठोर तप किया था. महिमा स्वामी के बारे में जनस्रुतियों से ज्यादा कुछ लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है सिवाय जगन्नाथ मंदिर के कुछ पत्राचार में उनका जिक्र मिलता है जिसमें पता चलता है कि उनकी असली नाम मुकुन्द दास था और वे वैष्णव थे. 
उड़ीसा पहुंचने के 36 साल बाद 1862 में उनके पहले सार्वजनिक उपस्थिति का प्रमाण मिलता है. सार्वजनिक रूप से उपस्थित होने के बाद थोड़े समय तक ही उन्होंने नये धर्म के बारे में लोगों को बताया और उन इलाकों का भी दौरा किया जहां इसाई मिशनरियां दलितों का धर्मांतरण कर रही थीं. महिमा धर्म के माननेवाले भक्तों द्वारा ऐसा कहा जाता है कि रानी विक्टोरिया महिमा स्वामी की हत्या करवाना चाहती थीं लेकिन जब तब उनके दूत महिमा स्वामी तक पहुंचते उन्होंने समाधि के द्वारा प्राणोत्सर्ग कर दिया था. 1976 में महिमा स्वामी के कायोत्सर्ग के बाद इस धर्म ने तेजी से अपना विस्तार किया. जोरांद में महिमा धर्म का मुख्य मंदिर स्थापित हुआ जहां किसी प्रकार की कोई मूर्ति नहीं बल्कि अग्नि की ज्वाला धधकती रहती है. महिमा धर्म के सन्यासियों के लिए महिमा स्वामी ने जो कड़े नियम-कानून बनाये थे आज भी उनका पूरी तरह से पालन होता है.
महिमा संन्यासी कठोर जीवन जीते हैं. उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा है कि वे किसी एक स्थान पर दो बार सूरज को अस्त होते हुए नहीं देखेंगे. अर्थात महिमा सन्यासी को लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करते रहना है. इसी तरह महिमा सन्यासियों के लिए घर के भीतर भोजन करने की मनाही है. किसी प्रकार के पूजा-पाठ की पूरी तरह से मनाही है और सिर्फ उगते-डूबते सूर्य को शारीरिक अर्घ्य देने की छूट है. इसे आप सूर्यप्रणाम भी कह सकते हैं लेकिन वे किसी प्रकार मंत्र आदि की बजाय सिर्फ महिमाधर्म के संस्थापक आलेख गोस्वामी के नाम आलेख का उच्चारण करते हैं.महिमा धर्म को वर्तमान विस्तार देने में विश्वनाथ बाबा का बहुत योगदान है. 13 साल की उम्र में वे महिमा धर्म के अनुयायी बने थे और महिमा धर्म के अधिकांश वर्तमान नियमावलियां विश्वनाथ बाबा की ही देन हैं. भीमा भोई ने महिमा धर्म के बारे में जो काम किया था उससे आगे जाकर विश्वनाथ बाबा ने इसे एक तार्किक आधार दिया और पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की तर्क की कसौटियों पर उसे खरा साबित किया.
महिमा धर्म के दो संप्रदाय है- बलकानधारी और कुपिनधारी. बलकानधारी संप्रदाय में तिहाई अनुयायी दलित वर्ग और गैर-ब्राह्मण किसान हैं. जबकि कुपिनधारी संप्रदाय में अधिकांश अनुयायी आदिवासी समाज के लोग हैं. महिमा धर्म के आश्रमों को तुंगी कहा जाता है जिनकी देशभर में संख्या 1583 है. बलकानधारी और कुपिनधारी दोनों ही संप्रदायों का मुख्य जोर उड़ीसा में ही है लेकिन उड़ीसा के बाहर आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल और आसाम में भी महिमा धर्म के अनुयायी निवास करते हैं. महिमा धर्म बहुत ही क्रांतिकारी और अपनी जड़ों से जुड़ा सामाजिक-धार्मिक आंदोलन है. ऐसा समझा जाता है कि ब्राह्मण समाज द्वारा जब जगन्नाथ मंदिर पर केवल अपना हक दिखाया जाने लगा तो महिमाधर्म ने इस विचार के साथ काम शुरू किया कि जहां इंसानों में भेद किया जाता हो वहां भगवान जगन्नाथ रह ही नहीं सकते. महिमा धर्म के संन्यासियों का मानना है कि उन्हें भगवान जगन्नाथ का आशिर्वाद प्राप्त है.
कठोर तप और दीन-दुखियों के बीच धर्म को सेवाभाव के साथ संचालित करनेवाले महिमा धर्म के संन्यासी निज सुचिता और पवित्रता पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं. ऐसे तपस्वियों के साथ भगवान जगन्नाथ भला क्यों नहीं होंगे? अगर जगन्नाथ हैं तो वे शायद ही किसी रथ पर सवार हों, वे तो ऐसे महिमा संन्यासियों के वेश में हमारे आस-पास ही होते हैं.
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मन्दिर में मूर्ति के स्थान पर अग्नि ज्वाला अब तक केवल परसियों के मन्दिर में ही होने की सूचना थी । पारसियों के मन्दिरों को 'अज्ञारी' कहा जाता है जहां कोई गैर पारसी प्रवेश नहीं कर सकता ।
इसी प्रकार महिमा संन्यासी को एक स्थान पर दो सूर्यास्त न देखने का प्रावधान, जैन संन्यासियों के लिए किए गए प्रावधानों से मेल खाता है । कोई जैन संन्यासी , एक ही स्थान पर तीन दिन से अधिक नहीं रुक सकता । यदि कोई सन्यासी इस नियम का उल्लंघन करता है तो श्रावक समुदाय उससे पूछताछ करने का अधिकार रखता है ।
आपका यह आलेख, आपकी अनुमति के बिना कुछ स्थानीय अखबारों को भेज रहा हूं ताकि लोग धर्म का मर्म जान सकें । विश्वास है, आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे और भविष्य में भी ऐसा करते रहने की अनुमति देंगे ।
महिमा धर्म के बारे में समय-समय पर हम और जानकारी देने की कोशिश करेंगे. इस तरह की जानकारियां को समेटने के लिए विस्फोटन भारत की कहानी नाम से कालम शुरू किया है. अगर पाठकों के पास ऐसी कोई जानकारी है तो हम आशा करते हैं कि वे इसे और लोगों के साथ बांटेंगे.
खुद के दोष सुधार ले,ऐसा मिला समाज.
ऐसा मिला समाज,जो निन्दक नियरे रखता.
आलोचक की सब बातें सम्मान से सुनता.
यह साधक कवि,चर्चा करता सदा धर्म की.
अमरता का यह राज़ जान ले हिन्दु धर्म की.
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