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दर्द से भरा दर्दपुरा

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आतंकवाद की मार झेल चुके कुपवाड़ा जिले के दर्दपुरा को विधवाओं का गांव कहा जाता है, क्योंकि इस गांव में 200 से भी अधिक विधवा महिलाएं और करीब 400 यतीम बच्चे हैं। कश्मीर में जेहादी आतंकवाद की लड़ाई में दर्दपुरा के अधिकतर पुरुष आतंकवादियों की गोली के शिकार बन गए या फिर वे फौज की गोलियों से मारे गए।

नियन्त्रण रेखा के करीब बर्फ की चादर से ढकी पहाड़ियों के बीच ऊबड़-खाबड़ एवं कीचड़ से सनी ऊंची-नीची पगडण्डियों के मकड़जाल में उलझा दर्दपुरा श्रीनगर से करीब 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दरअसल दर्दपुरा की दास्तान एक विडंबनात्मक घटनाक्रम का हिस्सा कही जा सकती है, जिसका असर आज भी पीछा नहीं छोड़ रहा है।

कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत से लेकर अब तक 20 वर्षों के दौरान एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है। पिता के साये से महरूम बचपन से लेकर जवानी तक का सफर तय करने वाली इस यतीम पीढ़ी ने अब्बा की याद में अपनी लाचार मां समेत अन्य परिजनों को हर दिन रोते-बिलखते और तिल-तिल कर मरते हुए देखा है। इस पीढ़ी ने देखा है कि हमेशा बुर्के में रहने वाली उनकी अम्मी जो शायद ही कभी कदम घर से बाहर रखती थी, आज उन्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों का पेट पालने के लिए भीख मांगने या फिर मजदूरी करने के लिए बीच बाजार तक जाना पड़ता है। सुहागनों के पति, मां और पिता के बेटे, बहनों के भाई तो सैकड़ों बच्चों के पिता इस आतंकवाद की आग में बलि चढ़ गए। 

हसीना बेगम भी उन सैकड़ों बदनसीब विधवाओं में से एक हैं। वे कहती हैं कि-`इन 20 सालों में अब जान का डर तो नहीं रहा लेकिन गुरबत पीछा नहीं छोड़ती। जमीन का टुकड़ा-टुकड़ा बेचकर मुझे घर चलाना पड़ता है।´ चार बच्चों की मां हसीना बेगम ने अपने मासूम बच्चों को किसी तरह पाल-पोषकर बड़ा तो कर दिया, लेकिन अब नई तरह की चुनौतियां उनके आगे आ खड़ी हुई हैं। बड़े बेटे को तो उन्होंने जैसे-तैसे बी.एड. करा दिया, लेकिन उनका दूसरे बेटे अशरफ पर हालातों की ऐसी मार पड़ी कि वह मानसिक बीमारी से ग्रस्त हो चुका है। जबकि बेटी नाज़िया के दोनों गुर्दे खराब हो चुके हैं। गरीबी की मार झेल रही हसीना बेगम के लिए बच्चों का ईलाज कराना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। वे बेधड़क बताती हैं कि उनका पति शेर वली खटाना एक मिलिटेन्ट था, जो 1993 में फौज की गोली से मारा गया। हालांकि हसीना यह भी कहती हैं कि `कोई भी अपनी खुशी से आतंक की इस लड़ाई में शामिल नहीं हुआ था, बल्कि उन्हें जबरदस्ती ले जाया गया। एक रात सोते समय कुछ लोग घर में आये और बन्दूक की नोकपर जे़हाद की लड़ाई लड़ने या फिर जान से मारने की धमकी देकर मेरे शौहर को ले गए। फिर तो उनकी लाश ही लौटकर घर आई थी।´ हसीना आगे कहती हैं कि `यह एक बीमारी बनकर पूरे दर्दपुरा पर छा गई। शायद हमने कुछगुनाह किये थे, जिसकी हमें ऐसी सजा मिली। अब तो जीने की हसरत ही नहीं बची।´ आतंकवाद के इस दौर में कई ऐसे मामले भी आये जिनमें मिलिटेन्ट समूहों में शामिल होने के बात कुछ लोगों ने अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी लोगों का क़त्ल कर दिया। बेगम जान के शौहर का मामला भी कुछ इसी तरह का है। उनकी बेटी सफीना बताती है कि उसके दो भाई और दो बहनें हैं। बकौल सफीना-`मेरे पिता मिलिटेन्ट नहीं थे, बल्कि कुछ लोग उन्हें उठाकर ले गए और मार दिया।´ 11वीं की छात्रा सफीना का एक भाई 10वीं कक्षा में पढ़ता है तो दूसरा भाई मजदूरी करके घर चलाता है। 

सीमावर्ती जिले कुपवाड़ा का दर्दपुरा गांव वैसे तो कश्मीर की मनमोहक वादियों में बसे अन्य गांवों की तरह नज़र आता है, लेकिन 1989 में शुरु हुए जेहादी आतंकवाद से मिले ज़ख्मों की टीस 20 साल बाद भी दर्दपुरा की जमीन और लोगों के दिलो-दिमाग़ से मिट नहीं पाई है।
दर्दपुरा के लोगों के जीवन यापन का मुख्य आधार खेती-बाड़ी और मजदूरी है। जब गांव में हमने प्रवेश किया था तो अधिकतर घरों पर सिर्फ बच्चे थे या फिर वे खाली पड़े थे। पूछने पर पता चला कि इस समय सभी मेहनत-मजदूरी करने के लिए बाहर निकल जाते हैं। ऊंचे टीले पर पगडण्डी से गुजरते हुए उचित दर राशन की दुकान पर भीड़ देखकर थोड़ी देर रुककर लोेगों से बातचीत करने पर खाद्य सुरक्षा, महंगाई और बेरोजगारी जैसे सवालों का पिटारा लोगों ने खोल दिया। मोईदीन खटाना कान में धीरे से कहने लगे कि-`स्टोरकीपर गुलाम मोहम्मद मीर से पूछिये कि लोगों को राशन पूरा क्यों नहीं मिल रहा।´ पूछने पर गुलाम मोहम्मद ने बताया कि हम क्या करें आगे से इतनी ही सप्लाई हो रही है, इसलिए सभी को थोड़ा-थोड़ा करके बांटना पड़ रहा है। इतने में मोईदीन खटाना, रशीद मीर, सिराजदीन पुसवाल, मोहम्मद युसुफ ख़्वाजा और फारुख़ अहमद मीर समेत दर्जनों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। बेरोजगारी की दुहाई देते हुए इन लोगों ने कहा कि सरकार की रोजगार गारंटी योजना के तहत जॉब कार्ड तो बने हैं, लेकिन मजदूरी किसी को नहीं मिलती। गुलाम कासिम लोन तो प्रशासनिक अमले पर आरोप लगाते हुए यहां तक कहते हैं कि जॉब कार्ड होने के बावजूद सिर्फ उन्हीं को काम मिलता है, जो पैसा देते हैं।´ सिराजदीन पुसवाल के मुताबिक जब से नई सरकार का गठन हुआ है महंगाई आसमान छू रही है, उस पर बेरोजगारी की मार से दोहरी मार लोगों पर पड़ रही है। कश्मीर में सर्दियों का यह मौसम चिकल्लस कहा जाता है, जिसमें 40 दिनों तक जमीन बर्फ से ढक जाती है। यह वह समय होता है, जब न तो खेती-बाड़ी हो सकती है और न ही किसी तरह की मजदूरी मिल पाती है। पुसवाल जैसे तमाम लोग राशन की दुकान पर राशन नहीं आने से इस चिन्ता में डूबे हैं कि जब सारे रास्ते बर्फ से ढक जायेंगे तो हम खाने का सामान भी बाजार से नहीं ला पायेंगे। रशीद मीर कहते हैं कि बाजार भी दर्दपुरा से करीब 20 किलोमीटर दूर है। 

फारुख़ अहमद ने बताया कि हम लोग बिल्कुल बेकार बैठे हैं, यहां छ: महीने तो ऐसे होते हैं जब कोई काम नहीं मिलता। दर्दपुरा की पगडण्डियो पर बिजली के खंभों को देख अनायास ही मुंह से निकल पड़ा कि-`बिजली तो रहती ही होगी।´ इतने पर तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और वे कहने लगे कि चार साल से गांव में बिजली नहीं जली है, जबकि कई लोगों के घर पर बिल की कापियां पहुंच चुकी हैं। कुछ लोग आतंकवाद का कारण गरीबी को बताते हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि हजारों जिन्दगियां आतंक की भेंट चढ़ जाने के बावजूद 20 साल बाद भी दर्दपुरा के लोग गरीबी से उबर नहीं पाये हैं। उस पर भी भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने लोगों का घर-बार तबाह कर दिया। मजबूर लोगों ने अपनी जमीन गिरवी रख बैंक से कर्ज लेकर घर तो फिर से बना लिया, लेकिन उस घर को कैसे चलाया जाये यह किसी की समझ में नहीं आ रहा। हसीना बेगम का घर भी भूकंप की भेंट चढ़ गया था, उन्हें जमीन गिरवी रखकर जम्मू एण्ड कश्मीर बैंक से करीब डेढ़ लाख रुपये कर्ज लेकर फिर से घर बनाना पड़ा। जबकि उनकी करीब 7 केनाल जमीन पहले ही बिक चुकी थी।

सैदा बताती हैं कि 1998 में उनके भाई गुलाम रसूल पीर को किसी जमात के लोग उठाकर लेकर गए और हमें उसकी लाश भी फिर नहीं मिली। ज़रीफा के मुताबिक लड़ाई का ऐसा दौर चला कि बेगुनाह लोग भी उसकी भेंट चढ़ गए। 5 बच्चों की मां ज़रीफा बताती हैं कि `सन् 2000 की बात है, शाम को उनके शौहर मोहम्मद अकबर बट्ट नमाज पढ़ने के लिए गए थे और शाम के धुंधलके में फौज ने उन्हें मिलिटेन्ट समझ कर फायरिंग कर दी जिसमें उनकी मौत हो गई। बेटे की मौत का सदमा ज़रीफा के ससुर बर्दाश्त नहीं कर सके और हार्टअटैक से उनकी भी मौत हो गई। फिर तो 5 बच्चों समेत पति की चार बहनों के गुजर-बसर का भार भी ज़रीफा के कंधों पर आन पड़ा। बाद में सरकार की ओर से बच्चों की पढ़ाई के खर्च समेत एक लाख रुपये मुआवजा तो ज़रीफा के परिवार को मिल गया, लेकिन अपनों का सहारा उनके सिर से हमेशा के लिए उठ चुका था।

ज़रीफा को तो सरकार की ओर से मुआवजा मिल गया, क्योंकि उनके पति पर किसी आतंकवादी समूह में शामिल होने का आरोप नहीं था। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि दर्दपुरा की जिन विधवा महिलाओं के पति और यतीम बच्चों के पिता पर आतंकवादी समूहों में शामिल होने का आरोप लगा था उनके परिवार को किसी तरह का मुआवजा नहीं दिया गया। सरकार और समाज से उन्हें मिला है तो सिर्फ और सिर्फ तिरस्कार। 

ज़रीफा के पति के तरह खज़र मोहम्मद पीर की मौत भी वर्ष 2000 में फौज की गोली से हुई थी, जब वे रात के नौ बजे नमाज पढ़कर लौट रहे थे। आतंक के उस दौर के कहर का दबाव सिर्फ आम लोगों पर ही नहीं था, सेना पर भी आतंकवादियों को पकड़ने या फिर उन्हें देखते ही गोली मार देने का सख़्त आदेश था। जिसके चलते हजारों बेगुनाह लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया। यही नहीं आतंकवादी समूह में शामिल होने शक पर पकड़े गए कई लोगों की मौत तो रिमाण्ड के दौरान ही हो गई। साज़ा बेगम के पति दिलावर मीर भी ऐसे ही लोगों में से एक थे। साज़ा बेगम को जब गांव में हमारे होने का पता चला तो वे अपनी बेटी हलीमा को लेकर दौड़ी चली आईं। पूछने पर पता चला कि हलीमा भी एक विधवा है। जिसके पास न तो अपना मकान है और न ही खेती की जमीन और मजदूरी करके पेट पालना पड़ता है। साज़ा बेगम की दो बेटियां और दो बेटे हैं। बेटों को मजदूरी से जो समय बचता है तो उसमें वे पढ़ाई भी करते हैं। बकौल साज़ा बेगम-`गुरबत की वजह से मैं बच्चों को ज्यादा पढ़ा नहीं पाई, सरकार की ओर से भी कोई सहारा नहीं मिला। अब तो मेरी एक ही उम्मीद है कि बच्चों को कोई काम मिल जाये।´  सारा बेगम के पति गुलजार शेख़ समेत रावतपुरा की फातिमा बानों के पति की मौत भी फौज की रिमाण्ड के दौरान हो गई थी। सुरक्षा बलों के आम लोगों के साथ रवैये को लेकर जब हमने दर्दपुरा के गुलाम हसन से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि-`फौज भी वैसा ही बर्ताव करती है, जैसा आम लोगों का उनके प्रति होता है। सच तो यह है कि गरीब हर तरफ से मर रहा है और उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं दिया जाता।

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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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