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मैंने देखी, मुकेश अंबानी की मुंबई

image मिल कम्पाउण्ड में बन रही इमारत और सड़क में जिन्दगी जीने के लिए मजबूर मजदूर

हमारे शहर समृद्धि की छलक से नहीं निकले हैं. हमारे शहर गरीबी से उपजे पलायन की पैदाइश हैं. इसलिए जब हम किसी शहर में जाते हैं तो हमें एक ही शहर में कई शहर दिखाई देते हैं. महानगरों में स्थिति और अधिक स्पष्ट है. मुंबई ऐसे ही कई शहरों से अटा एक अटपटा शहर है.

लेकिन अपनी मुंबई यात्रा के दौरान मैंने कौन सी मुंबई देखी? इसका जवाब पाने के िलए जरूरी है कि मैं अपने से अंदाज लगाऊं कि यह मुंबई है किसकी? सीधा और सरल जवाब तो यही हो सकता है कि कोई भी शहर उसी का होता है जो लोग वहां रहते हैं. मुंबई के बारे में यह जवाब इतना आसान नहीं है. मुंबई में परप्रांतीय लोगों के आकर बस जाने का मुद्दा शिद्दत से विराजमान है और अगले एक दो दशक तक इसके कमजोर होने की कोई गुंजाईश नहीं है. हो सकता है शिवसेना की अगली पीढ़ी इसे मुद्दा न बनाये लेकिन फिलहाल राज ठाकरे की राजनीतिक मजबूरी है कि वे उत्तरभारतीयों को यहां से बाहर निकालने की पसंदीदा मांग करते रहें. इसकी प्रतिक्रिया में ही सही न चाहते हुए शिवसेना को भी उत्तर भारतीयों का ऊपरी तौर पर समर्थन करने से बचना होगा. तो क्या मुंबई बाल ठाकरे और राज ठाकरे की है?

भावनात्मक रूप से नहीं बल्कि तार्किक रूप से बोलता हूं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. असल में अगर आप थोड़ा स्थिर होकर सोचेंगे तो पायेंगे कि बाल ठाकरे और राज ठाकरे जान अनजाने पूंजीपतियों के एजंट के बतौर इस्तेमाल होते हैं. मसलन, किसी दौर में उत्तर भारतीय मय तबेले के वर्तमान मुंबई के दिल भायखला और दादर में बसते थे. विरोध बढ़ा तो उत्तर भारतीय समाज का यह वर्ग वहां से थोड़ा आगे खिसका और गोरेगांव, अंधेरी, थाणे की ओर खिसक गया. अब क्योंकि इन इलाकों में भी जमीन कम कम पड़ने लगी है इसलिए उत्तर भारतीयों के तबेले वसई, विरार और दहाणू की ओर चल पड़े हैं. तात्कालिक तौर पर नाक के नीचे उत्तर भारतीय दिखने बंद हो गये तो विरोध भी धीरे धीरे मद्धिम पड़ता चला गया. नब्बे के दशक में शिवसेना को सत्ता मिल गयी, जिसके बाद मजबूरन उसे उदार हो जाना पड़ा और उत्तर भारतीयों का घोषित विरोध छोड़ना पड़ा. लेकिन उत्तर भारतीय पीछे जो जमीन छोड़ आये थे उसका क्या हुआ? वे जमीनें आज खरबों की संपत्ति का स्वरूप धारण कर चुकी हैं. तो इस विरोध का फायदा किसे मिला? बाल ठाकरे को? नहीं. मराठियों को? नहीं. शिवसेना की इस राजनीति का सीधा फायदा पूंजीपतियों और बिल्डरों को हुआ. हो सकता है शिवसेना ने जानबूझकर ऐसा न किया हो, लेकिन आखिरकार फायदे में पूंजीपति ही रहे.

अब राज ठाकरे कहते हैं कि सरकारी नौकरियों और फैक्ट्रियों में महाराष्ट्रवालों को ही नौकरी मिलनी चाहिए. सरकारी नौकरी में तो बात जमती है लेकिन जो लोग यहां उद्योग धंधा चला रहे हैं वे इस बात को क्यों नहीं मान रहे हैं? निश्चित रूप से यूपी और बिहार के बदहाल परिवारों से निकला पूत इन फैक्ट्रियों के लिए सस्ता मजदूर साबित होता है. लेकिन इधर कुछ सालों में मुंबई में एक ट्रेण्ड साफ दिख रहा है. मुंबई में कल-कारखाने तेजी से बंद हो रहे हैं. इसके दो कारण हैं. पहला, मुंबई औद्योगिक शहर होने की बजाय वित्तीय शहर में तब्दील होता जा रहा है. अचानक ही अब फैक्ट्री मालिकों को महाराष्ट्र की बजाय गुजरात और मध्य प्रदेश रास आने लगा है. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां उनको कई तरह की कर रियायतें हैं और मजदूर सस्ते में उपलब्ध हो रहे हैं. लेकिन इसका एक और महत्वपूर्ण कारण है. पीछे जो जमीन बचती है वहां फैक्ट्री मालिक रियल एस्टेट डेवलप कर रहे हैं. किसी जमाने में ठाणे शहर की पहचान रही रेमण्ड कंपनी अब पूरी तरह से बंद हो चुकी है और इसके एक हिस्से पर सुलोचना देवी सिंहानिया पब्लिक स्कूल संचालित होता है. अभी भी रेमण्ड के पास ठाणे के सबसे महत्वपूर्ण लोकेशन 130 एकड़ जमीन है. हो सकता है आनेवाले समय में इस जमीन पर जेके नगर बस जाए. जेके की इस कंपनी के बंद हो जाने से वैसे तो सात हजार के करीब लोग बेरोजगार हुए हैं लेकिन इसका असर सिर्फ सात हजार परिवारों तक ही नहीं रहेगा. लेकिन अकेला जेके ग्रुप ने ही ऐसा नहीं किया है. मुंबई में मिलें कब की बंद हो गयी थीं. ऐसी 65 मिलों की जमीनों को पूंजीपतियों ने दबाव डालकर हासिल कर लिया और अब इन सभी जमीनों पर ऊंचे भवन आकार ले रहे हैं. हो सकता है राज ठाकरे को यह लगता हो कि वे उत्तर भारतीयों का विरोध कर रहे हैं लेकिन वास्तविक रूप से वे किसे फायदा पहुंचा रहे हैं? निश्चित रूप से फायदे में रियल एस्टेट के कारोबारी हैं. उत्तरभारतीय तो घाटे में गये ही मराठी भी किसी फायदे में नहीं है.

अब सवाल है, मैंने कौन सी मुंबई देखी? मुंबई में चार पांच तरह की मुंबई है. एक मुंबई झोपड़ियों में रहनेवालों की है, जो आज भी बंबई है. एक मुंबई है, जो नौकरीपेशा लोगों की मुंबई है. एक मुंबई है जो मध्यम दर्जे के व्यापारियों और कारोबारियों की मुंबई है. एक मुंबई है जो फिल्मी सितारों और चमकीले तारों की मुंबई है. एक मुंबई है जो राजनीतिक रूप से गिद्धभोज पर उतारू लोगों की मुंबई है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मुंबई इनमें से किसी की नहीं है. ये सब मोहरे हैं. खेलनेवाले खिलाड़ी कुछ और ही लोग हैं जो पर्दे पर कभी नहीं उभरते. यह मुंबई मुकेश अंबानी जैसे लोगों की मुंबई है. इनकी संख्या बहुत कम है लेकिन ऐसा लगता है कि इन्हीं चंद लोगों के एजंट के बतौर सारे लोग सक्रिय हैं. वर्ली में जहां तिल रखने भर की जगह मिलना मुश्किल है वहां मुकेश अंबानी ने अंटीलिया इमारत खड़ा कर लिया. जल्द ही वे उस इमारत में रहने चले जाएंगे. अपनी इमारत के सबसे ऊपर बनी भव्य बालकनी में बैठकर जब वे समुद्र की ओर निहारेंगे तो हरहराती समुद्री लहरें उन्हें अहसास करायेंगी कि, हां मुंबई उन्हीं जैसे लोगों की है, और उन्हीं जैसे लोगों की होकर रहेगी. इसलिए मैं तो यही समझता हूं कि अब मैने जो मुंबई देखी है, वह मुकेश अंबानी की मुंबई है. मुंबई पूंजीपतियों की है और वर्तमान अर्थव्यवस्था में जो पूंजीपति होता है वह इस देश का बिल्कुल ही नहीं होता है. न खान-पान से, न रहन-सहन से, न स्वभाव से और न ही लगाव से. कृपया बाल ठाकरे और राज ठाकरे दोनों ही यह दावा करना छोड़ दें कि मुंबई मराठियों की है.

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संजय बेंगाणी on 20 February, 2010 17:19;30
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आपने सही मुम्बई देख ली.


इससे असहमत कि वर्तमान अर्थव्यवस्था में जो पूंजीपति होता है वह इस देश का बिल्कुल ही नहीं होता है.
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sanjay on 20 February, 2010 18:41;51
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aapke bahane hamne v मुम्बई देख ली.
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on 20 February, 2010 18:59;18
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Nishchint hi mumbai ka sahi chehra dekha par Sanjay Vengani ki tarah hum bhi
वर्तमान अर्थव्यवस्था में जो पूंजीपति होता है वह इस देश का बिल्कुल ही नहीं होता है.
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Deshbhakt on 20 February, 2010 19:42;47
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"वर्तमान अर्थव्यवस्था में जो पूंजीपति होता है वह इस देश का बिल्कुल ही नहीं होता है. न खान-पान से, न रहन-सहन से, न स्वभाव से और न ही लगाव से." ये वाक्य शायद शार्टकट में लिख दिया गया है. शायद इसी वजह से कुछ लोगों ने इससे असहमति जताई है.
कृपया इस लेख को भी देखें: http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_17.html
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RAJ SINH on 20 February, 2010 19:45;45
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संजय जी की रिपोर्टिंग से सहमत .यह मुंबई पहले भी और अब और ज्यादा दो भागों में बंटी है .भारत में और इंडिया में .अट्टालिकाओं में इंडिया बसा है और झोपड़ियों में भारत .और दोनों में हर धर्म ,भाषा ,प्रान्त के लोग हैं.भारत सेवा के लिए और इंडिया .......कुछ कहने की जरूरत है ?
और राज ,बाल ठाकरे और उनके गुर्गों सहित सभी राजनैतिक पार्टियाँ जो जब सत्ता गणित में रहीं उन्होंने जमीन और जमीनी घोटालों सहित मुम्बई को ऐसा लूटा और बना दिया की खेल के मैदानों सहित ,sarkaree jameenon और jahaan जो ban pada loot liya है. और luta भारत hee है.
ek mumbaikar के roop में is खेल को vakt vakt par dekha है bachpan से lekar aaj tak और dekh raha hoon.
प्रान्त,भाषा धर्म के खेल में luta भी भारत hee है ,alag alag tareeke से. और भारत hee to hamesha lutata raha है.
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संजय तिवारी on 20 February, 2010 20:13;02
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पूंजीपति कितना भारतीय है यह इस बात से निश्चित होगा कि उसके पास पूंजी किस रास्ते पहुंच रही है. दुर्भाग्य से इस युग में भारतीय तरीकों से पूंजी के रास्ते नहीं खुलते. और तो नहीं लेकिन पत्रकारिता को ही ले लें. अंग्रेजी की पत्रकारिता को पैसे की कमी नहीं है. अंग्रेजी में भी जो लाइफस्टाइल की पत्रकारिता करते हैं उनके पास तो धन धना धन है. ऐसा क्यों है? क्या हमने कभी सोचा है कि आम आदमी के लिए काम करने वाले कंगाल ही क्यों रहते हैं? कारण सिर्फ एक है. पैसा विदेशी सोच समझ वाले लोगों के पास केन्द्रित हो गया है. या फिर जिनके पास पैसा है वे भी पैसे की सार्थकता तभी मानते हैं जब वे विदेशी सोच समझ से जीने लगते हैं.

मुंबई के संदर्भ में तो मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि जो भी पूंजीपति है वह स्वभावत: अभारतीय है. हो सकता है वह तिरंगा फहराता हो और मौका आने पर राष्ट्रगान भी गा लेता हो लेकिन उसके कर्म तो पूरी तरह से भारतीयता को भ्रष्ट करनेवाले ही होते हैं. इससे भी स्पष्ट न हो तो इस विषय पर विस्तार से लिखा जा सकता है.
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संजय on 20 February, 2010 20:44;26
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भारतीय और अभारतीय होने का जो आप जो नया नजरिया बता रहे हैं, उससे मैं सहमत हूं। भारतीय और अभारतीय होने का यह सूक्ष्म नजारा केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। दिल्ली और कोलकता में भी भारतीय और अभारतीय होने का यह नजारा मिल जाएगा।
इसे पढ़ कर सत्यजीत रे की एक फिल्म की याद आ गई। कैसे एक गरीब किसान की जमीन अमीर हड़प कर महल बना लिया जाता है। उसे अपनी जमीन की एक मुठ्ठी मिट्टी तक लेने से रोक दिया जाता है।
एक दूसरा प्रसंग याद भी याद आया। कॉलेज में पढ़ी एक कविता पढ़ी थी।
कविता की एक लाईन में नायिका कलकत्ता को इसलिए कोसती है, क्योंकि वहां के भ्रमित माया में उसका गरीब नायक उसे भूल जाता है। कलकता पर ब्रज गिरने का शॉप देती है।
दरअसल इन शहरों की सबड़े बड़ी बिडंबना है कि यहां आने वाले ज्यादातर ईमानदार तथाकथित (अ)भारतीय होने के सपने में उलझ अपने श्रम से उन्हीं लोगों की जड़ का मजबूत कर रहे हैं।
पर निर्धन और उपेक्षित नायिकाओं का श्राप उन पर असर नहीं करता है। यदि कहर भी गिरता है तो उनके ही अपनों पर।
संजय स्वदेश
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Jitendra Dave on 21 February, 2010 02:37;36
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वैसे तो कई पूंजीपति अच्छे भारतीय हैं, वहीं कुछ पूंजीहीन अभारतीय भी हैं. ऐसे में सामान्यीकरण सही नहीं कहा जा सकता. लेकिन हाँ पूंजीपतियों का दायित्व है कि वह भारतीयता को पाले-पोसे और उसे पल्लवित करे. क्योंकि उनके पास साधन-संसाधन है. आपकी मुम्बई-दर्शन के लिए बधाई.
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Vicky G on 21 February, 2010 20:43;41
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देश के दो प्रमुख औद्योगिक घरानों बिरला और टाटा के बारे में क्या कहेंगे? इनकी भारतीयता पर संदेह तो हो ही नहीं सकता. अब भारतीयता की परिभाषा को थोडा विस्तार दिए जाने की आवश्यकता है. गांधीजी जो तय कर गए, उसे ही पत्थर की लकीर मानना ज़रूरी नहीं. समय के साथ बदलाव अनिवार्य हैं, वरना कुछ समय बाद तो भारत भारतीयों से शून्य हो जाएगा. अंबानी से जुडे लाखों लोगों को रोज़गार मिला है, उसके बारे में क्या कहेंगे?
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संजय तिवारी on 21 February, 2010 21:20;28
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आपके पास इस बात का आंकड़ा हो सकता है कि अंबानी ने कितने लोगों को रोजगार दिया है. लेकिन क्या आपके पास इस बात का आंकड़ा है कि उनके कारण कितने लोग बेरोजगार हुए हैं?

जैसे एक बरगद अपने विस्तार में अपने नीचे कुछ भी उगने पनपने की संभावना खत्म कर देता है वैसे ही एक बड़ा उद्योग असंख्य छोटे उद्योगों को सदा सर्वदा के लिए विदा कर देता है. मूलभूत व्यवस्था में बड़े उद्योगों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. चंद अमीर पूंजीपति खड़े कर देने से बात नहीं बनेगी. होना यह चाहिए कि इन पूंजीपतियों को सीमांकित कर दिया जाना चाहिए. इनके लिए उच्चतम की एक सीमा निर्धारित की जानी चाहिए ताकि ऐसे पूंजीपति अभारतीय और अमानवीय न हो सकें.

जहां तक अभारतीय का सवाल है तो भैया कोई पूंजीपति जब तक राल्स रायस न खरीद ले, पोर्श की सवारी न कर ले उसे कब लगता है कि वह सफल है? सम्मान के सारे सामान उसे पश्चिम से ही मिलते हैं.
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