अवध के ग्रामीण महिलाओं की अलख
अमेठी एवं रायबरेली की ग्रामीण महिलाएं अब स्थानीय लोकजीवन में व्याप्त पितृसत्तामक अवधारणा के समक्ष चुनौती बनकर उठ खड़ी हुई हैं और बड़े पैमाने पर उन्होंने श्वेत क्रांति का आगाज किया है। डेयरी व्यावसाय में जुटी इन महिलाओं ने 240 लीटर दूध उत्पादन से काम शुरु किया, जो बढ़कर अब 80,000 लीटर के स्तर तक जा पहुंचा है और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की मदद से यह दूध दिल्ली के बाजार तक पहंुच रहा है। उत्तर प्रदेश के परंपरागत अवधी ग्रामीण जनजीवन मे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने वाला यह अब तक का सबसे बड़ा अभियान माना जा रहा है।
भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं ने पहली बार सामाजिक बंदिशों एवं परंपरागत बंधनों की दहलीज से बाहर निकलकर कुछ करने की जब हिम्मत की तो सफलता उनके कदम चूमने लगी। बाद में समाज एवं परिवार का भी भरपूर सहयोग उन्हें मिलने लगा। रायबरेली एवं राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी की ग्रामीण महिलाओं ने बड़े पैमाने पर श्वेत क्रांति का आगाज किया है। 240 लीटर दूध उत्पादन से शुरु हुआ यह सिलसिला आज 80,000 लीटर के उत्पादन स्तर तक जा पहुंचा है और प्रतिदिन उत्पादित होने वाला दूध नेशनल डेयरी डेव्लपमेंट बोर्ड की मार्फत दिल्ली स्थित मदर डेयरी को भेजा जा रहा है।
रायबरेली के डीह ब्लॉक के गांव दिलावरपुर की फूलकली और उनके परिवार को गरीबी विरासत में मिली थी। फूलकली की मां तो बचपन में ही गुजर चुकी थी और अब बूढ़े हो चले पिता परिवार की जिम्मेदारियां उठाने में असमर्थ थे। एक दिन पिता के कहने पर वे स्वयं सहायता समूह से जुड़ गई और यहीं से तरक्की का रास्ता फूलकली और उनके परिवार को मिल गया। समूह से मिले 10 हजार रुपये के ऋण से उन्होंने भैंस खरीदी और दूध का काम शुरु कर दिया और इससे हुई आमदनी से जल्दी ही कर्ज की राशि वापस कर दी। इसके बाद 15 हजार रुपये का एक और ऋण लेकर उन्होंने दूसरी भैंस खरीद ली। बकौल फूलकली-‘इसी दौरान हमारा स्वयं सहायता समूह एमसीपी (माइक्रो क्रेडिट प्लान) के दायरे में आ गया, जिससे मुझे एक लाख रुपये का कर्ज बैंक से मिल गया। इस पैसे से मैंने एक भैंस एवं दो गायें और खरीद ली, साथ ही पशुओं के लिए शेड का भी निर्माण कराया है।’ शिव स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष फूलकली और उनके परिवार को आज दूध के कारोबार से महीने में 8 हजार रुपये तक आमदनी हो जाती है। फूलकली 3 बेटों एवं 2 बेटियों की मां पढ़ाई-लिखाई का महत्व बखूबी समझती हैं। वे अपने बच्चों को नियमित स्कूल भेजती हैं।
बहरहाल दिलावरपुर में फूलकली जैसे गरीबों के दिन सदा से ऐसे नहीं थे। दिलावरपुर को गांवों पसरी गरीबी एवं पिछड़ेपन का प्रतीक कहा जा सकता है, जहां जीवन यापन के लिए अधिकतर ग्रामीण मुख्यतः खेती-बाड़ी पर निर्भर थे, तो कुछ लोगों को जमींदारों के खेतों में मजदूरी करके गुजर-बसर करना पड़ता था। जबकि आज भी बहुसंख्य आबादी रोजगार की तलाश में बाहर के शहरों की ओर पलायन कर जाती है, जिसके कारण परंपरागत लोकजीवन एवं संस्कृति का ताना-बाना भी विखंडित हुआ है। इन परिवारों के सामने भोजन एवं कपड़ों के साथ-साथ अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाना भी एक बड़ी चुनौती रही है। यही नहीं बीमारी एवं अन्य आपात स्थिति में स्थानीय ग्रामीणों को उससे निपटने का कोई रास्ता नहीं सूझता था और मजबूरन 10 फीसदी की ब्याज दर पर साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता। जिसकी भरपाई न होने पर घर के पुरुषों को साहूकारों के खेत में बंधुआ मजदूर की तरह काम करना पड़ता था।
अब राजीव गांधी महिला विकास परियोजना से गांवों का परिदृश्य ही बदलने लगा है। 18 नवंबर 2005 को शिव स्वयं सहायता समूह का दिलावरपुर में गठन किया गया था। शुरुआती दिनों में तो 16 सदस्यीय इस समूह के प्रत्येक सदस्य को 20 रुपये बचत राशि के रूप में हर महीने जमा करनी होती थी। बाद में इस राशि को बढ़ाकर 40 रुपये प्रति माह कर दिया गया। छः महीने तक स्वयं सहायता समूह के बेहतर क्रियाकलापों, लेन-देन एवं इसकी पहली कैश क्रेडिट लिमिट (सीसीएल) के आधार पर 25 हजार रुपये का कर्ज स्थानीय ग्रामीण बैंक की शाखा से स्वीकृत हो गया। समूह के सदस्यों ने इस राशि में से अपने स्वयं सहायता समूह से छोटे-छोटे कर्ज जरूरत के आधार पर ले लिए। शिव स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन तब हुआ जब दिलावरपुर से सटे गांव ‘पुरे सधई मिश्र’ में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की मदद से मिल्क बल्क कूलर (बी.एम.सी.) स्थापित किया गया। शिव स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को इस दूध संग्रहण केन्द्र का लाभ मिल सके इसके लिए राजीव गांधी महिला विकास परियोजना के प्रतिनिधियों ने दुधारु पशु खरीदने के लिए प्रेरित करना शुरु कर दिया। जिससे कि एनडीडीबी की दूध संग्रहण केन्द्र पर दूध बेचकर वे जीवन यापन कर सकें। शिव स्वयं सहायता समूह के प्रत्येक सदस्य के पास आज कोई-कोई न कोई दुधारु पशु होने से वे सभी डेयरी व्यावसाय से जुड़ चुके हैं और दूध बेचकर उन्हें प्रतिदिन 150 रुपये से 200 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। शुरु में शिव स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को आर.जी.एम.वी.पी. के विशेषज्ञों द्वारा डेयरी क्रियाकलापों संबंधी तीन दिन का प्रशिक्षण दिया गया, जिससे दूध की गुणवत्ता एवं उसमें अपेक्षित वसा की मात्रा कायम रखी जा सके, क्योंकि इसके आधार पर ही दूध का मूल्य भी निर्धारित होता है।
सूरज की पहली किरण के साथ ही दूध दुहने से लेकर उसके संग्रहण और फिर गांवों से पास के बीएमसी तक दूध पहुंचाने का सिलिसिला शुरु हो जाता है। यही प्रक्रिया शाम को भी दोहराई जाती है। एक सहायक गांव से दूध इकट्ठा करके साईकिल से एनडीडीबी के बीएमसी तक पहंुचाता है। बीएमसी पर दूध का वजन एवं वसाकी जांच करके डाटा कम्पयूटर में दर्ज कर लिया जाता है। दूध की कीमत का निर्धारण उसमें उपस्थित वसा की मात्रा और वजन के आधार पर लिया जाता है। औसतन भैंस के दूध का दाम 16 रुपये प्रति लीटर और गाय के दूध का दाम 14 रुपये प्रति लीटर रहता है। डेयरी व्यावसाय से जुड़ी महिलाओं को समय-समय पर डेयरी प्रबंधन की तकनीकों जैसे पशुओं के रख रखाव और साफ-सफाई, पोषण, भरपूर पानी, स्वच्छ दूध के उत्पादन, पशुओं की नस्लों में सुधार, बछड़ों की देखरेख और टीकाकरण से जुड़ी जानकारियां देने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। बी.एम.सी. स्थापित होने से पहले महिलाओं को प्रति लीटर दूध पर 10 रुपये ही मिल पाते थे। बीएमसी प्रबंधक द्वारा दूध का मूल्य स्वयं सहायता समूह के बैंक खाते में जमा करा दिया जाता है, जहां से समूह की कोषाध्यक्ष जरूरत के समय पैसा निकाल कर सदस्यों में उनके द्वारा की गई दूध आपूर्ति के आधार पर बांट देती है। इस तरह डेयरी संबंधी क्रियाकलाप शुरु होने से गत दो वर्षों से शिव स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के जीवन में प्रभावकारी परिवर्तन आये हैं। दूध का यह कारोबार निरंतर बढ़ रहा है और एक छतनार वृक्ष का रूप ले रहा है। पिछले कुछ समय में सुल्तानपुर एवं रायबरेली जिलों के परियोजना क्षेत्र में 2000 लीटर क्षमता के 95 मिल्क बल्क कूलर्स लगाये गए हैं। दुधारु पशुओं के ईलाज के लिए 10 रक्षा वेटरनरी क्लिीनिक भी स्थापित किये गए हैं, जहां पर डेयरी किसानों को एन.डी.डी.बी. की ओर से सस्ती दरों पर दवाईयां उपलब्ध कराई जाती हैं। अब तक 1,686 से भी अधिक महिलाओं को डेयरी गतिविधियों का प्रशिक्षिण परियोजना क्षेत्रों में दियागया है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर एवं रायबरेली की 20,000 से अधिक ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों की सदस्य बनकर डेयरी व्यावसाय से जुड़ चुकी हैं और अब वे गर्व से गरीबी के दुष्चक्र से निकल कर अपनी जिंदगी में बदलाव की बात स्वीकार करती हैं। आज ये महिलाएं करीब 12 लाख रुपये का कारोबार प्रतिदिन कर रही हैं और इन स्वयं सहायता समूहों की कुल जमा राशि 9 करोड़ 20 लाख रुपये से भी अधिक है, जिस पर 60 करोड़ 10 लाख रुपये की {ण सीमा निजी क्षेत्र के बैंकों द्वारा निर्धारित की गई है। गरीबी उन्मूलन के लिए राजीव गांधी महिला विकास परियोजना (आर.जी.एम.वी.पी) द्वारा संचालित यह अभियान राजीव गांधी चैरीटेबल ट्रस्ट के लैगशिप मिशन का हिस्सा है। विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन से निजात दिलाना इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य है, जिससे गरीब परिवारों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जा सके। हालांकि गंवई परिवेश एवं परंपरागत जड़तामूलक समाज की महिलाओं के बीच इस तरह का प्रयोग कभी आसान नहीं रहा। वर्ष 2004-05 के दौरान योजना आयोग के 61वें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की तादात देश में सर्वाधिक पाई गई थी। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश की करीब 18 करोड़ आबादी के 44 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिसमें से 80 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के रायबरेली, सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ समेत आसपास के अन्य जिलों के गरीब लोगों की जीविका का साधन खेती-बाड़ी एवं इससे जुड़े कार्य रहे हैं। आर.जी.एम.वी.पी. के परियोजना क्षेत्र में शामिल जिलों की करीब 85 फीसदी लोग गरीब एवं सीमांत किसान हैं, जिसमें 55 प्रतिशत किसानों के पास आधे हेक्टेयर से भी कम जमीन है। भूमि में मौजूद लवणीय तत्वों, सिंचाई सुविधाओं के अभाव एवं कम वर्षा के चलते खेती से जैसे-तैसे खाने भर का अनाज मिल पाता है।
इन तमाम चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन कर उन्हें विभिन्न कौशल आधारित व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए आजीविका विकास गतिविधियों का खाका तैयार किया गया। जब इस अभियान पर अमल शुरु हुआ तो धीरे-धीरे महिलाओं का उत्साह जागृत होने लगा और वे स्वयं सहायता समूहों की गतिविधियों में शामिल होने लगी। आर.जी.एम.वी.पी. के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी.सम्पथ कुमार कहते हैं कि-‘शुरु में सामुदायिक जीवन में व्यापत सामंती एवं पितृसत्तात्मक सोच को तोड़ पाना आसान नहीं था। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में दृढ़ इच्छाशक्ति से काम करने वाले प्रोफेशनल लोगों का न मिलना भी एक समस्या थी, लेकिन अब तो समुदाय के लोग ही विभिन्न कार्यक्रमों का नेतृत्व कर रहे हैं।’ अभियान को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए विभिन्न सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं एवं एजेंसियों का समावेश भी किया गया है। इस दृष्टिकोण के चलते जब राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से दूध की मार्किटिंग के लिए जिक्र छिड़ा तो बात बन गई और आज सुल्तानपुर एवं रायबरेली के 20 हजार से भी अधिक दूध उत्पादक परिवारों द्वारा उत्पादित दूध को बाजार मिल गया है। इसी तरह बेफ डेव्लपमेंट रिसर्च फांउडेशन (बी.ए.आई.एफ.) की विशेषज्ञता का उपयोग पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान एवं नस्ल सुधार हेतु लिया जा रहा है। इसके अलावा विभिन्न बैंकों को भी स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है।
डेयरी के साथ साथ पॉल्ट्री, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, बेंत के फर्नीचर, चमड़े का काम, मूर्ति एवं मिट्टी के खिलौने, मोमबत्ती, सौर उर्जा संचालित स्टडी लाईट और डिटर्जेंट उत्पादों के निर्माण से जुड़ी विभिन्न आय सृजक गतिविधियों में लगे 10,632 स्वयं सहायता समूहों का बैंक लिंकेज कराया गया है। स्वयं सहायता समूहों के संबंध में एक अच्छी बात यह है कि इनकी कर्ज वापसी की दर करीब 97 प्रतिशत है। फिलहाल सिर्फ डेयरी गतिविधियों से ही रायबरेली एवं सुल्तानपुर जिलों के 100,000 से भी अधिक ग्रामीण सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। भविष्य में डेयरी से जुड़े क्रियाकलापों से 500,000 से अधिक परिवारों को जोड़े जाने की योजना है। इन सबसे भी ऊपर इस पूरे अभियान के चलते स्थानीय ग्रामीण महिलाओं मंे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, आत्मगौरव एवं आत्मनिर्भरता की ललक पैदा हुई है, जिससे न केवल उन्हें अर्थोपार्जन में मदद मिली है बल्कि समाज में भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है।
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