बिना बैलों के दौड़ पड़ती है बैलगाड़ी
नागपुर। यह चमत्कार यहां हर साल होता है और पिछले दो सौ साल से हो रहा है. नागपुर से 13 किलोमीटर दूर वाड़ी खड़गांव में स्थित लावा गांव में होली से पांच दिन बाद होनेवाले उत्सव में एक ऐसा चमत्कार होता है जिसे हजारों लोग अपनी आंखों से देखते हैं लेकिन दो सौ साल बाद भी इस चमत्कार के रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है.
स्थानीय लोग इसे चमत्कार करके स्वीकार कर लेते हैं तो तो वैज्ञानिक सोच समझ वाले लोग भी इसे चमत्कार कहकर अस्वीकार कर देते हैं. लेकिन दोनों ओर के लोग इसे चमत्कार तो मानते ही हैं. होली के पांच दिन बाद हर साल इसी दिन सोनबा बाबा की दैवी शक्ति से 'बैल से रहित, बिना बैलों की बैलगाड़ियां' चलाने का करिश्मा दिखाया जाता है।
हर साल की तरह इस वर्ष भी इस करिश्मे को देखने दूर-दूर से लोग आए। शुक्रवार की शाम 5 बजे सोनबा बाबा के शिष्य 75 वर्षींय माधवराव गणपत गोरले गांव के पंचायत चौक मार्ग पर सोनबा मंदिर मैदान में बिना बैलों की बैलगाड़ियां चलाकर अद्भुत दैवी शक्ति का प्रदर्शन किया। यहां 5 से 7 बैलगाड़ियां (धुरी निकाली हुई) एक दूसरे से रस्सी से बंधी हुई बिना बैल की रखी गई। सोनबा बाबा के शिष्य ने अपने घर में स्थित मंदिर के देवी- देवताओं की पूजा-अर्चना करने के बाद एक बकरे की बलि दी। इसके बाद महोत्सव का शुभारंभ हुआ। ग्रामीणों द्वारा बाबा के शिष्य को मंदिर के सामने के झूले पर झुलाया गया। इसके बाद मंदिर के मुख्य रास्ते पर बिना बैलों की बंडियों की तरफ सोनबा बाबा के शिष्य हाथों में तलवार लेकर आए। इनके पीछे अनेक लोगों की भीड़ थी।
गोरले भगत ने बिना बैलों की इन बंडियों के चारों ओर प्रदक्षिणा कर सामनेवाले जू की पूजा-अर्चना की। इस पूजा में कपूर आदि जलाने के बाद नीबू, दही-भात, चावल के दाने गो-मूत्र की चारों दिशाओं में छिड़काव किया गया। इसके बाद वे पहले बंडी (बैलगाड़ी) पर विराजमान हुए। उनके पीछे अन्य श्रद्धालु भी बंडी पर खडे हुए। 'होक रे होक सोनबा बाबा की जय' के नारे गूंजे। फिर धीरे-धीरे बिन बैलों की बंडियां सरकने लगीं। इसकी एक झलक पाने के लिए लोग बेताब दिखे। यह करीब 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जूना सोनबा बाबा की जागृत भूमिगत देवस्थान तक चली।
इस उत्सव को देखने के लिए विदर्भ ही नहीं बल्कि राज्य के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन सोनबा बाबा के मंदिर में दर्शन करके लोग अपनी मनोकामना की पूरी करने का आशीर्वाद मांगते हैं। इस मौके पर यहां चारों ओर मेला लगता है। स्थानीय नागरिकों व कुछ अन्य सामाजिक संगठनों की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। ग्रामीण पुलिस की ओर से तगड़ा बंदोबस्त किया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि सैकड़ों लोग बडी पर सवार होते हैं, और वह करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी अपने आप चलती है। इसे चमत्कार मानकर इसका विरोध करने वाले यहां कई आए, पर वे इस रहस्य का पर्दाफाश नहीं कर सके।
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sanjay jee agar is mudde par aap aur likhein to na keval achchha lagega balki shayad nai
sanjay jee agar is mudde par aap aur likhein to na keval achchha lagega balki shayad nai jankari bhi milegi
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