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पेट्रोल से आग कहां बुझती है?

image सच नामक पेट्रोल पंप

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख संत गुरमीत सिंह राम रहीम के खिलाफ पुराने डेरा प्रबंधक फकीर चंद की हत्या का मामला दर्ज होने के बाद भावुक हुए डेरा प्रेमियों द्वारा किए गए हिंसक प्रदर्शन और तोड़-फोड़ की घटनाओं के बाद डेरा प्रबंधन भी सकते में है। जिस प्रकार इस उग्र प्रतिक्रिया का समाज में संदेश गया है उसके चलते जहां समाज के लोगों में सहम है वहीं डेरा सच्चा सौदा के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में भी नकारात्मता का समावेश हुआ है।

ये ऐसा टर्निंग प्वांइट है जिसने डेरा सच्चा सौदा के कर्ता धर्ता लोगों की पेशानी पर भी चिंता की लकीरें उकेर दी हैं। डेरे के प्रवक्ता पवन बंसल इंसां इस संदर्भ में कहते हैं, ''जिस प्रकार की प्रतिक्रिया हुई है उसके चलते डेरा प्रबंधन भी हैरान है क्योंकि ऐसी प्रतिक्रिया की किसी को उम्मीद नहीं थी, इस प्रकार की उग्र प्रतिक्रिया के चलते आम जनमानस में डेरे की छवि में अंतर आ सकता है। हमें जैसे ही पता चला कि हिंसक दौर शुरु हो गया है तो हमने हर प्रकार के यत्न किये, चैनलों अखबारों में अपीलें जारी कीं गुरु जी की तरफ से भी अपील हुई। निजी स्तर पर प्रेमियों से संपर्क किया गया कि इस गड़बड़ी को रोका जाए। हमारे प्रयासों का इतना असर जरूर हुआ कि हिंसा जल्द ही थम गई पर एक दिन की हिंसक घटनाओं ने भी हमें कम आहत नहीं किया।''

असल में डेरा प्रबंधन को इस सवाल का  जवाब देना काफी भारी पड़ रहा  है कि एक तरफ डेरा प्रमुख सभी धर्मों का समान आदर करने की बात कहते हैं, अपने नाम गुरमीत सिंह के साथ राम रहीम लिखने का संदेश भी सर्वधर्म सद्भाव वाला ही है। वे हमेशा शांत रहने व प्रभु के चरणों में अपना ध्यान लगाने की बात कहते हैं, उनके अनुयायी भी उनसे इतना प्रेम करते हैं कि गुरु के नाम पर लाखों एकत्रित हो जाते हैं। जिन रास्तों से गुरु की सवारी ने जाना हो उसकी सफाई व मुरम्मत तक करने को अपना परम सौभाग्य मानते हैं। फिर गुरु द्वारा बार बार शांत रहने की अपील को उन्होंने कैसे नजरंदाज़ करके हिंसा व साडफूंक जैसी उग्र कारवाईयां कीं? इस सवाल का जवाब किसा के पास नहीं है। असल में डेरा प्रबंधन या प्रवक्ता जिस बात को अपने मुंह से स्वीकार करने को तैयार नहीं है वो ये है कि चार करोड़ के करीब अनुयाईयों को पूरी तरह से नियंत्रित रखना प्रबंधन के लिए भी लोहे के चने चबाने जैसा हो गया लगता है।

वैसे  डेरा प्रेमियों ने पहले जितने भी प्रदर्शन किए वे हमेशा शांतमय  ही रहे। मामला चंडीगढ़ में  संत राम रहीम की पेशी का  हो या कोई और, डेरा प्रेमी लाखों की संख्या में मौके पर पहुंच कर केवल अपनी संख्या शक्ति का प्रदर्शन करने तक ही सीमित रहते रहे हैं। ये हथकंडा डेरा प्रशासन को भी मुफीद लगता रहा है क्योंकि संख्या का भय दिखा कर ही सरकारों की सोच को पलटने जैसी करामात आज तक डेरा प्रशासन करता आया है, पर हिंसा व सरकारी सम्पत्ति का नुक्सान डेरा प्रेमियों की पहली कार्रवाई है।

वैसे  हाल ही में सीबीआई द्वारा दर्ज  की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट जिसमें डेरे के पूर्व प्रबंधक फकीर चंद  की कथित हत्या में डेरा प्रमुख को लपेट लिया गया है उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डेरा प्रवक्ता का कहना है कि संत गुरमीत सिंह राम रहीम 1990 को गुरु गद्दी पर बैठे थे जबकि फकीर चंद उससे पहले अपनी पत्नी व इकलौती बेटी की मृत्यु के कारण इस हद तक अवसादग्रस्त हो गया था कि वो डेरा को छोड़ कर चला गया। उसके भाई ने कई साल पहले उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखवाई थी। फकीर चंद कहां है कहां नहीं, जिंदा है या दुनिया से रुखस्त ले चुका है, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता । फिर अचानक बीस बाईस साल बाद उसकी हत्या की बात कहां से आती है जबकि संत गुरमीत सिंह राम रहीम इस काल्पनिक कहानी में रंग भरने के लिए हत्या के पात्र बना दिये गए हैं।

आहत भी हैं डेरा प्रेमी
डेरा प्रेमी  बनाम सिख विवाद वर्ष 2007 में शुरु हो गया था जब डेरा प्रमुख संत गुरमीत सिंह राम रहीम द्वारा गुरु गोबिंद सिंह जी से मिलती जुलती पोशाक पहन कर खालसा पंथ की स्थापना की तर्ज पर इंसा मत का शुभारंभ किया था। तब भड़के हुए सिख समुदाय के दबाव में आकर पांच सिंह साहिबान ने आधा दर्जन के करीब हुक्मनामे जारी करके सिखों के डेरा प्रेमियों के साथ किसी भी प्रकार के संबंध रखने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उसके बाद लगातार ये आलम चल रहा है कि पंजाब में कट्टïर सिख संगठन डेरा प्रेमियों के धार्मिक समागम नाम चर्चा भी नहीं होने देते, चाहे ये धार्मिक रीत किसी के घर के अंदर हो रही हो। इन परिस्थितियों से खिन्न डेरा प्रेमियों को पंजाब सरकार से भी कोई राहत नहीं मिली क्योंकि मौके पर पहुंचे प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी मामला शांत करने के लिए अक्सर ही डेरा प्रेमियों पर ही दबाव डालते रहे हैं कि नाम चर्चा बंद करके स्थिति को विस्फोटक होने से बचाया जाए।

इन हालात के चलते अपने दुख व पीड़ा का इज़हार करने के लिए करीब पांच डेरा प्रेमी आत्मदाह तक कर चुके हैं जिनमें जसविंदर, शाम सुंदर, गुरजीत सिंह व भगवान दास का नाम शामिल है। जाहिर है कि सरकार के समर्थन न मिलने के कारण डेरा प्रेमी रोष से भरे हुए हैं। यहां तक कि कुछ माह पहले डेरा सच्चा सौदा में जब इन परिस्थितियों पर विचार हेतू रुटीन बैठक हुई तो एक डेरा प्रेमी ऐसा भड़का कि शांत रहने को कहने वाले पदाधिकारी से उलझ बैठा। जाहिर है कि लगातार दबाव झेल रहे डेरा प्रेमी जहां सिख पंथ द्वारा किया गया सामाजिक बहिष्कार झेल रहे हैं वहीं अपने धार्मिक रीति रिवाजों को पूरा न कर पाने के चलते वे भीतर तक उबले हुए हैं। इन हालात के चलते मालवा संभाग जोकि पंजाब का सबसे बड़ा संभाग है, तथा डेरा प्रेमियों का गढ़ भी है वहां पर हालात भीतर ही भीतर ज्वालामुखी जैसे हो गए हैं। जिस दिन ये लावा फूटेगा तो पूरे मालवा को तबाह करके रख देगा।

ये आग कैसे बुझेगी?
इस आग को बुझाने के लिए सरकारों को भेदभाव छोड़ कर न्यायपूर्ण नीति अपनानी पड़ेगी। जहां तक अपने धार्मिक रीति रिवाज अपनी मर्जी से मनाने की संविधान भारत के हर नागरिक को आज़ादी देता है उस अधिकार को कायम रखने की जरूरत है न कि किसी से भी इस अधिकार को छीना जाए।

सरकार को न्याय सुनिश्चित करना पड़ेगा। दूसरी तरफ डेरा प्रेमी भी इस बात को मान कर चलें कि यदि उनके डेरा प्रमुख के खिलाफ अदालत में मामले चल रहे हैं तो वे भी कानून को अपने हाथ में लेना बंद करें व न्याय व्यवस्था को बिना किसी दबाव के काम करने दें। रोजाना का टकराव किसी के भी हित में नहीं है। आतंकवाद का दंश जिन्होंने भोगा है वे तो जानते ही हैं कि तब कैसे काले दिन थे जब पंजाब की फिज़ा में रुक रुक कर ज़हरीली हवा चला करती थी। वैसे हालात से सबक लेते हुए सिख संगठनों को भी बिना वजह के शक्ति प्रदर्शन से परहेज़ करना पड़ेगा। यदि सरकार कानून का राज कायम करने के मामले को वोट बैंक से तौल कर देखेगी तो इस आग को जलाए रखने में ही सरकार की परोक्ष इच्छा मानी जाएगी। याद रखने लायक तथ्य है कि राज करने के लिए प्रदेश का बचा रहना बहुत जरूरी है। यदि प्रदेश ही शमशान बन जाएगा तो राज करने का भी क्या अर्थ रहेगा?

(डेढ़ साल पहले अर्जुन शर्मा द्वारा लिखी गयी रिपोर्ट डेरा का घेरा जिसमें उन्होंने जो आशंकाएं व्यक्त की थीं वे आज सब सही साबित हो रही हैं.)

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rajeshwar singh on 07 March, 2010 04:22;13
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अर्जुन जी नमस्कार आपके लेख से ढेर सारी शिकायतें हैं
डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी रक्तदान में दो बार विश्वरिकार्ड बना कर देश का नाम दो बार गिनीज बुक मैं दर्ज करा चुके हैं. http://www.guinnessworldrecords.com/records/human_body/body_parts/largest_blood_donation.aspx
कभी कोई स्टोरी बनाई है आपने इस पर ? डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी वृक्षारोपण में भी (9,38,007 plants in one hour ) विश्वरिकार्ड बना कर देश का नाम गिनीज बुक मैं दर्ज करा चुके हैं. जबकि सारी दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रही है, ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की दिशा में ये इक बहुत बड़ा कदम है. इस बारे में विस्फोट.कॉम पर आपकी कलम चली है कभी ?
विगत तीन वर्षों से इंडियन आर्म्ड ट्रांस फ्यूजन सेंटर में भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए डेरा प्रेमी अबाध रूप से रक्त की आपूर्ती कर रहे हैं. प्रेमियों का रक्त कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के जवानों के काम आता है. आपने इसका भी जिक्र कभी अपने लेखों में किया?
गुजरात का भूकंप , उड़ीसा की बाढ़, जम्मू कश्मीर की बर्फबारी, सुनामी आदि सेकडो आपदाओ में गुरु जी व डेरा प्रेमियों ने जान पर खेल कर पीडितों की मदद की है, आपको वो काम भी नजर नहीं आते?
जनवरी में ५ डेरा प्रेमी युवकों ने वेश्याओं के साथ शादी करके उनके साथ घर बसा कर दुनिया में अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया है, यह भी आपको लिखने के काबिल नहीं लगा. सद अफ़सोस!
आज आपको जलती हुई सरकारी सम्पती नजर आती है उस दिन आप कहाँ थे जब डबवाली में प्रशासन की आँखों के सामने डेरा प्रेमियों के १०८ घरों व दुकानों में आग लगा दी गई बुजुर्गो तक कों नहीं बख्शा.
डेरा प्रेमी भी आखिर इंसान हैं उनमें भी भावनाएं हैं कब तक जुल्म को सहते रहें. जो लोग अपने गुरु के इक इशारे पर मानवता के लिए विश्व में सर्वाधिक खून (रक्तदान) बहा सकते हैं वे अगर हिंसा पर उतर आयें तो क्या होगा ? कहते हैं जनता की आवाज़ खुदा की आवाज़ होती है, क्या साढ़े तीन करोड़ से अधिक जनता (डेरा अनुयायी ) की आवाज़ कोई मायने नहीं रखती
आपने लेख में साढ़े तीन करोड़ से अधिक जनता को दोषी सिद्ध करने की कोशिश की है और पूरी तरह पुर्वाग्रह से ग्रस्त होकर ये लेख लिखा है तो और आपकी भाषा भी बेहद घटिया है.
अर्जुन शर्मा जी पुर्वाग्रह से ग्रस्त पत्रकारिता समाज व देश के लिए घातक है दोनों में से इक छोड़ दीजिए पुर्वाग्रह या पत्रकारिता
आपका भाई
राजेश्वर
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Arjun Sharma on 07 March, 2010 09:13;59
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Rajeshwar ji aapki shikayten sar mathe per. is baar ka vishey hinsa tha. is story main maine agar vo vistaar nahin daala jo aapne diya hai to un mukaddmon ka bhi poora hawala nahin diya jise sant gurmeet singh bhugat rahe hain.rahi biased journalism wali baat to aapka apna nazariya hai. is mamle main main valtere ko manta hoon jo kehte hain MAIN AAPKE VICHARON SE SEHMAT HOUN YA NA HOUN PER MAIN HAR VICHAR KI RAKSHA KAROONGA
Jai Hind
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Amrik Singh Journalist on 07 March, 2010 17:03;40
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Mr rajeshwar singh aapne dera sacha souda ke sambandh main unke ache kamon ka vyakhyan kiya hai vo sab to deron ke kaam hi hote hain. per sirsa ke journalist sh ram chander chatarpati jinki hatya ka aaropi dera parbandhan ko mana ja raha hai unki shav yatra bhi 6 k.m lambi thi. dera ke jo ache kaam hain vo to unka motive hai.dera ke pass 1000 acer ke kareeb jo kheti main istemaal ho rahi zameen hai wahan kheti karne wali labour ka kharch yadi 4,000 Rs per acer maan liya jaye to bhi premion dwara ki jaa rahi free labour ke 40 lakh per month banti hai. kheti ka munafa to chod hi deejiye. itne paison se kayi sunamiyan theek ki ja sakti hain. journaliston per poorvagrehi hone ka aarop lagane se pehle dera administration ko apne aapko dekhna chahiye.
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avtar singh on 07 March, 2010 19:37;46
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amrikji ki teepni arjun sharma ki report aur rajeshwar singh ke partikarm ka ekdam sateek uttar hai. deron ka sahi kam kuch jaiyada hi jana jata hai par visangtiyan nahin.
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rajeshwar singh on 08 March, 2010 00:22;05
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प्रिय अमरीक सिंह जी शव यात्रा की लम्बाई से मरने वाले की अच्छाई का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. मौत कभी भी अच्छी नहीं हो सकती. संसद पर हमले के आरोपी को फांसी देकर देखो १६ किलोमीटर लंबी लाइन मिलेगी मय्यत में. इसका मतलब यह नहीं हो जायेगा कि वो महान आत्मा था. रही बात पत्रकारिता की , जिस पत्रकारिता के नाम पर हम पत्रकार लोग सीना फुलाए घूमते हैं वो मात्र ५०० रूपये का खेल है. एप्लिकेशन की पांच कॉपी दो , फ्री में पंजीकरण होता है और ५०० रूपये में एक अंक निकलता है. दो चार महीने में इक अंक निकालो और आजीवन प्रेस का तमगा लिए घूमो. ऐसे में एक बेहद बारीक रेखा है जो पत्रकार और भयदोहन करने वालो कों अलग करती है उनमे फर्क करना अत्यंत कठिन है. पत्रकारिता के गिरते स्तर से आप भी अच्छी तरह वाकिफ होंगे. मकतूल छत्रपति के बारे में विस्तार में नहीं जाना चाहता. सारा सिरसा शहर उस शख्स की करनी से वाकिफ है. टीचर सभी बच्चों कों समान शिक्षा देता है कोई बच्चा डी सी बनता है तो कोई डकैत . इसमें टीचर का क्या दोष. ऐसा ही कुछ इस मामले में हुआ है, गुरु जी तो किसी को गलत शिक्षा नहीं देते, अब बात मानने कि है, कोई मानता है कोई नहीं.
डेरे के पास आज हजारों एकड़ जमीन है, सब जानते हैं. वो डेरे के सेवादारो की खून पसीने का प्रतिफल है वरना १९४८ से लेकर आज तक डेरे में न तो दान चढावा लिया जाता है और न ही हराम का खाने की शिक्षा दी जाती है. गुरु जी स्वयं खेतीबाड़ी से लेकर अपने कपडे धोने तक का काम खुद करते हैं तब दूसरों को हक हलाल का खाने की शिक्षा देते हैं. अमरीक जी डेरे में जो प्रेमी सेवा करते हैं वो स्वतन्त्र भारत के ही स्वतंत्र नागरिक हैं किसी के गुलाम नहीं. हैरत होती है की आपने सेवा का भी मोल लगा दिया.शुक्र है आपने रक्तदान की यूनिट्स का कैलकुलेशन नहीं किया. अमरीक सिंह जी मैं इस बहस को और आगे नहीं बढ़ाना चाहता. बेहतर होगा कि अपने कीमती समय में से एक दिन निकालें और डेरा सच्चा सौदा घूम कर आयें आखिर देखें तो सही कि वो कौन संगीतकार है जिसकी धुन पर साढ़े तीन करोड़ लोग जान की बाज़ी लगाने तो तैयार रहते हैं.....
आपका भाई
राजेश्वर
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image अर्जुन शर्मा जालंधर के रहनेवाले अर्जुन शर्मा बीस साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. बीस साल में 10 मीडिया घरानों की सैर कर चुके अर्जुन शर्मा का ट्रैक रिकार्ड बताता है कि उन्होंने कलम के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. मीडिया में नये आनेवाले पत्रकारों के लिए व्यावहारिक पत्रकारिता नाम की एक पुस्तक भी लिखी है. विस्फोट.कॉम के लिए पंजाब और हिमाचल का प्रभार. journalistarjun@gmail.com 09814055501
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