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पंजाबी शेर होने लगे ढेर

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अपनी कद काठी के लिए सेना में भर्ती के लिए अंग्रेजों की पहली पसंद रहे पंजाबियों के अब न तो वे चौड़े सीने रहे हैं और न ही लंबे कद। नियमित व्यायाम और खान-पान में आए अंतर के साथ-साथ नशे की लत ने उनकी स्थिति ऐसी बना दी कि आज 78 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने के लायक ही नहीं रहे।

सैन्य भर्ती रैलियों से मिले आंकड़े साबित करते हैं कि पंजाबियों के स्वास्थ्य की स्थिति 21वीं सदी में ही ज्यादा खराब हुई है। वर्ष 1971 के युद्ध के तुरंत बाद करीब 60 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने लायक होते थे। 80 के दशक में यह औसत लुढ़क कर 40 फीसदी पर आ गया जो आज 22 फीसदी तक रह गया है।

पटियाला, मोहाली, फतेहगढ़ साहिब, बरनाला, संगरूर व मानसा जिलों के नौजवानों के लिए आयोजित सैन्य भर्ती रैलियों में सामने आया है कि सेना में भर्ती के लिए होने वाली 400 मीटर गुणा 4 रेस युवाओं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है। एक-तिहाई लड़के 400 मीटर के चार चक्कर ही पूरे नहीं कर पाते। चौथा चक्कर समय पर पूरा करने वालों की गिनती 28 से ऊपर कभी नहीं जा पाई। निचले स्तर पर यह आंकड़ा 15 के आसपास तक आता रहा है। कर्नल कटोच कहते हैं कि यह आंकड़ा 22 फीसदी के आसपास रह गया है। संगरूर और मानसा के लड़के यदि कुछ आगे हैं तो मोहाली, पटियाला के उतना ही पीछे रह जाते हैं। दौड़ की बाधा पार करने वाले का समझो 95 फीसदी सपना पूरा हो गया। पुलअप, पंपिंग अथवा अन्य कसरतों में उसके निकलने की संभावना खासी कम रह जाती है। दस्तावेजों की जांच में दो से चार फीसदी लड़के और बाहर हो जाते हैं।

कर्नल (रिटायर्ड) प्रताप इंदर सिंह फुलका बताते हैं कि वर्ष 1972 में वह पटियाला में बतौर कैप्टन तैनात थे। उन दिनों सेना में भर्ती की इच्छा से आने वाले 60 फीसदी लड़के सफल रहते थे, पर 72 की जवानी और आज के लड़कों में बड़ा अंतर है। गांव जाने को सिर्फ साइकिल की मांग रखी जाती थी। 10-15 किलोमीटर का चक्कर पैदल यों ही लगा लेते थे पर आज के बच्चे गली के मोड़ पर ब्रेड लाने भी मोटरसाइकिल निकालते हैं। अब वैसे शारीरिक खेल भी रहे नहीं। सैन्य भर्ती रैलियों का जमीनी स्तर पर प्रबंध कर चुके कर्नल फुलका कहते हैं कि 80 के दशक के मध्य की भर्ती रैलियों में उन्होंने देखा कि कड़े नियमों ने यह औसत 40 फीसदी पर ला खड़ा किया। सेना को अच्छे लड़के चाहिए, जो देश की रक्षा कर सकें, यह सही है पर इसके लिए भर्ती से पहले प्रशिक्षण का इंतजाम बड़े स्तर पर नियमित रूप से प्रशासन को करना चाहिए।

सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. प्रेम प्रकाश खोसला कहते हैं कि पंजाब में पांच में से दो नदियां तो पाकिस्तान चली गई पर यहां छठे दरिया के रूप में शराब बहने लगी है। ढाई करोड़ की आबादी में यदि एक-चौथाई युवा और मर्द हैं तो सालाना 16 करोड़ बोतल शराब वैध रूप से यहां पी जा रही है। एक व्यक्ति के हिस्से हर महीने शराब की दो बोतल आ रही है। इसे सामाजिक मान्यता कुछ ऐसी मिली कि मना करने वाला ही कोई नहीं रह गया। इसमें अवैध शराब इसमें शामिल नहीं है। इतना तेजाब जिस किसी सभ्यता अथवा संस्कृति पर उडे़ला जाएगा, वह दौड़ना तो क्या चलने लायक भी नहीं रहेगी।

सेना के डिप्टी डायरेक्टर (भर्ती उत्तर पश्चिम) ब्रिगेडियर केडी मल्होत्रा कहते हैं कि यदि लड़के तीन महीने ढंग से मेहनत कर लें और थोड़ा तकनीक का प्रयोग देसी खुराक के साथ कर लें तो सेना में भर्ती प्रतिस्पर्धा कोई खास मुश्किल नहीं है। दौड़ते समय मुंह बंद रख नाक से ही सांस ले ली जाए तो आप की रेस का समय कम भी होगा और यह पूरी भी होगी। सेना में बेहिसाब पद खाली हैं। अपार संभावनाएं हैं। सिग्नल कोर, पंजाब व सिख रेजिमेंट, नर्सिग, तकनीकी इत्यादि.. हर वर्ग में अवसर हैं। पंजाब में यह मौका अब साल में पांच बार दिया जाने लगा है।

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Bhupinder Singh Brar on 17 March, 2010 19:24;54
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आप ने बिलकुल सही लिखा है नशों ने तो सथिती और भी खराब कर दी है .
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