नर्मदा के सौंदर्य पर जादू-टोने का अमावस
'भले ही गंगा मैली हो गई हो और यमुना काली, मगर नर्मदा माई की पवित्रता आज भी बरकरार है। निर्मल जलधारा और मनोहर घाट। देखकर रोम-रोम पुलकित हो उठता है।’ अक्सर यह सब सुनता और पढ़ता आया हूं, मगर जब अपनी आंखों से देखा तो महसूस हुआ कि जितना सुना था वह कितना कम था। नर्मदा नदी की तारीफ में गढ़े गए कशीदे उसकी गरिमा और सौंदर्य को व्यक्त करने में कितने अक्षम थे।
12 से 14 मार्च तक मैं मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के एक बड़े ही महत्वपूर्ण कस्बे महेश्वर में था। जहां मीडिया को अधिक से अधिक संवेदनशील बनाने के प्रयास में जुटी संस्था विकास संवाद अपना चौथा राष्ट्रीय मीडिया संवाद आयोजित करवा रही थी। अहिल्या बाई होल्कर की नगरी के नाम से पुकारा जाने वाला यह कस्बा नर्मदा नदी के तट पर बसा है। यह कस्बा धार्मिक कारणों से तो प्रसिद्ध है ही, बड़े बांधों के विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र होने के कारण भी अक्सर सुर्खियों में रहता है। वहां तीन दिन गुजरे और तीनों दिन सुबह नर्मदा
स्नान और शाम को तटों की खूबसूरती निहारते हुए गुजरे। यह एक अनूठा अनुभव था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस दौर में जहां विकास के नाम पर हर खूबसूरत चीज पर कालिख पोती जा रही है, वहां कम से कम कोई तो ऐसी जगह है जहां का माहौल शांत, सुंदर और स्निग्ध है। मगर जिस दिन लौटना था, उस सुबह अनायास निगाहों के सामने ऐसा नजारा आ गया कि उसने तीन दिनों तक मन पर पड़ी पवित्र छाप को मटियामेट करके रख दिया। ठीक उसी तरह जैसे एक सुंदर चेहरे पर किसी शैतान ने तेजाब फेंक दिया हो।
सामने ढोल की आवाज पर तलवार लेकर दो औरतें नाच रही थीं। देखकर पहले तो यही लगा कि यह सब निमाड़ क्षेत्र की खूबसूरत संस्कृति का हिस्सा हो। देवी अहिल्या की नगरी में नर्मदा माई को रिझाने का एक पारंपरिक अनुष्ठान। मगर धीरे-धीरे ढोलक की थाप तेज होती गई और तलवार लेकर नाचने वाली औरतों का नृत्य जुनून में बदलने लगा। दोनों रह-रहकर उन्मत्त हो उठती थीं। उनमें से एक ने अचानक अपना जीभ काट लिया और फिर दोनों रह-रहकर चीखने लगीं और आवेग में पूरे शरीर को झुमाने लगीं। आसपास खड़े लोगों ने उन्हें चारो तरफ घेरकर गोला बना लिया, जैसे कोई बड़ा रोचक तमाशा हो रहा हो। देखने वालों ने बताया कि दोनों पर देवी की सवारी हुई है और अब यह देवी एक महिला के सिर पर सवार भूत को भगाएंगी। फिर उस महिला को लाया गया जिस पर भूत सवार होने का अंदेशा जताया जा रहा था। पहली नजर में वह महिला मानसिक रूप से पीड़ित नजर आ रही थी। लोगों ने बताया कि भूत ने उसे कुछ इस तरह कब्जे में ले लिया है कि वह अपने बच्चों तक पर ध्यान नहीं देती। महिला को एक अन्य बूढ़ी महिला ने उन दोनों नाचने वाली महिलाओं के हवाले कर दिया, बूढ़ी महिला संभवत: उसकी सास होगी। इसके बाद उन दोनों महिलाओं ने भूत उतारने के नाम पर उस पीड़ित महिला के साथ जो कुछ भी किया, न उसका वर्णन किया जा सकता है और न ही इसकी आवश्यकता है। मगर वह शारिरिक अत्याचार की इंतेहां थी और पद्धतियां इतनी खतरनाक थी कि कई बार ऐसा लगता था कि कहीं पीड़ित महिला की मौत न हो जाए। वहां खड़े हमारे साथियों ने जब इस गोरखधंधे को रोकने की कोशिश की तो स्थानीय लोगों ने कहा- आप लोग तनाव न लें। उसे कुछ नहीं होगा, वह जल्द ठीक होकर अपने घर चली जाएगी।
इसके बाद वहां खड़े लोगों ने जो जानकारियां दीं वह दिल को दहलाने वाली थीं। दरअसल माना जाता है कि नर्मदा माई के पानी में इतनी ताकत है कि यहां स्नान करने से भूत-पे्रत का साया उतर जाता है। इसलिए अमरकंटक से लेकर गुजरात तक नर्मदा नदी के तटपर इस तरह के अनुष्ठान चलते ही रहते हैं। हमारे वहां से आने के बाद 15 मार्च को सोमवार के दिन नर्मदा के तटपर प्रेतबाधा मुक्ति के जबरदस्त अनुष्ठानों का दौर चला। इस दिन को लोग भूतड़ी आमावश्या के नाम से पुकारते हैं। नर्मदा तट पर जगह-जगह ओझाओं की दुकानें लग गई थीं और पूरे मध्यप्रदेश से लाखों की संख्या में लोग प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए ओझाओं के शरणागत हो गए थे। चौदस और अमावश्या की दरमियानी रात कई घाटों पर तंत्र पूजा हुई और भजन-कीर्तन, गम्मत और कथाओं के बीच पूरी रात ओझाओं और तांत्रिकों की दुकानदारी प्रशासनिक सुरक्षा के बीच निर्बाध रूप से चलती रही।
सौंदर्य की इस नदी के किनारे बरसों से इतना घिनौना कारोबार चल रहा है, सोचकर हैरत होती है। अंधविश्वास और शारिरिक यंत्रणा के इन अनुष्ठानों पर सवाल उठाना तो दूर इनकी कहीं चर्चा तक नहीं होती। नर्मदा नदी को साबुन के झागों तक से बचाने में जुटा प्रशासन भी इसकी छवि को कलंकित करने वाले इन कृत्यों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। और न ही इस नदी का गुण गाने वाला मध्यप्रदेश का बुद्धिजीवी ही इसके खिलाफ कोई मुहिम चलाने का तैयार नजर आता है। सौंदर्य की इस नदी पर जादूटोने का अमावस निस्संदेह हम सबके लिए शर्मनाक है।
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मुझे समझ नहीं आ रहा कि तंत्र "विद्या" के इतने महान लोगों का देश होते हुए भी हिंदू धर्म के इतने दुश्मन कैसे बचे हुए हैं. :-) :-D
इस तंत्र महाविद्या के आगे तो भगवान क्रिष्ण का कर्मवाद भी फ़ेल है. :-) :-) :-)
Sad but true. Anyway thanks Pushya for attracting us towards the incident. Hope you will keep your eyes open bring up all the things to a larger society.
hum jis samaaj ki baat kar rahe hai usi samaaj me 100 logo main se keval 2-3 hi logo ne virodh kia. agar hum sab milkar use rokte to shayad us din ye nahi hota.
main ye bhi janti hun ki bhale hi hum log us din us mahila ko bacha lete par agle din uske sath phir wahi hota. kyoki
ye sab cheezo main samaaj ki sweekaryata hai. aur rahi baat sarkaar ki to yah keval ek din ki ghatna nahi hai aisa aksar hota hai waha aisi sthiti main sarkaar ka hastshep jaroori hai nahi jiske jo man aayega wah karega chahe kisi ki jaan bhi chali jaye
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