Home | भारत की कहानी | दस्यु सरगनाओं की शरणस्थली में दलित पुजारी का मंदिर

दस्यु सरगनाओं की शरणस्थली में दलित पुजारी का मंदिर

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चंबल की घनघोर घाटियों को आम तौर पर लोग दस्यु दलों की शरणस्थली मानते हैं परंतु इसके साथ ही यह घाटी सामाजिक समरसता का एक ऐसा उदाहरण भी प्रस्तुत करती है जो समाज में व्याप्त छुआछूत जैसी बीमारियां फैलाने वालों पर तमाचा मारती है। लोगों को यह जानकर हैरत होगी कि देश में इटावा जिले के लखना कस्बा में स्थिति मां कालिका देवी मंदिर ऐसा एकमात्र मंदिर है जिसका पुजारी मंदिर निर्माण के समय से लेकर अब तक सिर्फ दलित ही होता है।

दलित पुजारी के प्रति लोगों में सम्मान का भाव है और इस प्रथा से समाज के सवर्ण वर्ग अथवा ब्राहमणों को भी कोई गुरेज नहीं है। वह इसे आपसी सद्भाव की एक मिसाल है। इसके साथ ही इसी मंदिर से सटी मजार भी गंगा-जमुनी तहजीब की इबारत लिखती है। इस मंदिर के इतिहास को जानने वाले बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1820 में तत्कालीन जमींदार जसवंत राव ने कराया था। जानकार बताते हैं कि लखना से सटे दिलीप नगर के जमींदार जसवंत राव लोकप्रियता हासिल करने के साथ ही मां कालिका देवी में अनन्य श्रद्धा रखते थे। जमींदार बाद में अघोषित राजा भी बन कर उभरे लेकिन उनके हृदय में सभी धर्म और वर्ग के प्रति बेहद लगाव था। वह मां कालिका देवी के दर्शन करने के लिए यमुना नदी के पार स्थित कंचेसी धार स्थित मंदिर जाया करते थे परंतु एक दिन यमुना का बहाव इस कदर तीव्र हुआ कि नियमित रूप से माता के दर्षन करने जाने वाले राजा जब उस दिन नहीं पहुंच सके तो उन्हें बेहद अफसोस हुआ। वह मां के दर्षन न कर पाने की सोचते ही सोचते सो गए तो मां कालिका देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए।

स्वप्न में मां कालिका के दर्शन करने के अगले ही दिन लखना में स्थित एक पीपल के पेड़ में आग लग गई। उसी पेड़ के नीचे माता कालिका देवी की मूर्ति निकली। जिस पर राजा ने उसी स्थान पर माता कालिका का भव्य व विशाल मंदिर की स्थापना करा दी। इसके साथ ही यहां आने वाले भक्तों को असुविधा न हो इसके लिए मंदिर के समीप ही एक विशाल तालाब बनवाया। जानकार बताते हैं कि इस तालाब में हिंदुस्तान की प्रत्येक नदी का जल मिलाया गया था लेकिन बदलते परिवेश में प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह तालाब गंदगी से पटा पड़ा हुआ है।

राजा जसवंत राव को जब यह अहसास हुआ कि मंदिर के निर्माण से कहीं इस्लाम को मानने वाले मुस्लिमों को किसी प्रकार की ग्लानि न हो तो उन्होंने उनकी भी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए मंदिर से ही सटकर एक मजार की स्थापना कराई जिस पर मुस्लिम समुदाय अब अपनी आस्था जताता है। मंदिर निर्माण के साथ ही जब राजा जसवंत राव ने यह महसूस किया कि दलितों को समाज में सम्मान नहीं मिलता है और उन्हें हीन भावना का अहसास होता है, बस यही सोचकर उन्होंने एक नया इतिहास रचते हुए ऐलान कर दिया कि माता कालिका देवी के मंदिर का पुजारी दलित परिवार का ही होगा और छोटेलाल के पिताजी मंदिर के पहले दलित पुजारी बने। तब से लेकर आज तक इस मंदिर की पूजा-अर्चना का काम एक ही दलित परिवार की पांचवी पीढ़ी के अखिलेष एवं अषोक कर रहे हैं।

इलाकाई लोग बताते हैं कि इस मंदिर के प्रति लोगों में इस कदर आस्था की देश के तमाम प्रांतों के लोग यहां माता के दर्षन को आते हैं और इन भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में जो कुछ भी देवी मां से मांगो उसकी आरजू देवी मां पूरी करती हैं। ताज्जुब यह है कि इस मंदिर में हर वर्ग के लोग पूजा-अर्चना करते हैं परंतु आज तक के इतिहास में किसी ने भी दलित पुजारी के मुद्दे को लेकर अपना विरोध तक दर्ज नहीं कराया है। एक साथ जहां मंदिर में घंटे बजते हैं वहीं मजार पर कुरान की आयतें भी पढ़ीं जातीं हैं जो गंगा-जमुनी सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल है।

मंदिर का दलित पुजारी एवं उसका परिवार मंदिर की पूजा-अर्चना से खासे उत्साहित हैं। वह इसे अपने लिए जहां गर्व समझते हैं वहीं राजा जसवंत राव का इसे उपकार मानते हैं। शास्त्र और पुराणों को जानने वालों का मानना है कि राष्ट्र की मनीशा में दो शक्तियां उभरीं हैं। इनमें से एक श्रव्य शक्ति है वहीं दूसरी शाक्त शक्ति है। श्रव्य शक्ति में जहां भगवान शंकर की पूजा अर्चना सिर्फ ब्राहमण करता है वहीं शाक्त शक्ति में देवी मां की पूजा अर्चना का विधान है जिसका पुराणों में भी उल्लेख है। देवी की पूजा दलित भी कर सकता है। इस मंदिर पर क्षेत्र के अधिकाधिक लोग अपने बच्चों का मुंडन कराने के साथ ही विवाहोपरांत नई बहू को माता के दर्शन कराने के लिए लाते हैं। इस कार्य में बधाई गीत भी चकवा जाति के लोग गाते हैं। यह काम उनका वंशानुगत कार्य है और वह तमाम पीढ़ियों से यह काम करते आ रहे हैं।

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sanjiv panday on 20 March, 2010 09:41;36
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चलो अच्छा हुआ जिस समय जसंवत राव ने मंदिर बनवाया उस समय आरएसएस नामक संगठन नहीं था। नहीं तो आरएसएस वाले जसंवत राव को भी संघ का प्रचारक या कार्यकर्ता बताते। यह खबर इस सच्चाई की पुष्टि करती है कि जब आरएसएस नहीं था तब भी इस देश में हिंदू मान्यताओं को बचाने वाले, मंदिर बनाने वाले लोग थे।
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Jitendra Dave on 21 March, 2010 00:31;00
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"दलित पुजारी के प्रति लोगों में सम्मान का भाव है और इस प्रथा से समाज के सवर्ण वर्ग अथवा ब्राहमणों को भी कोई गुरेज नहीं है। वह इसे आपसी सद्भाव की एक मिसाल है।"
वाकई में एक सुखद खबर और एक भागीरथ परम्परा. हमारा भारत और हमारा समाज ऐसा ही होना चाहिए. वाकई में दिल गदगद हो गया. इस सकारात्मक पत्रकारिता के लिए लेखक को हार्दिक साधुवाद.
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Sanjeet Tripathi on 21 March, 2010 01:41;38
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bahut badhiya. mai ummeed karta hu ki desh se lekar samaj ko baantne wale yaha kabhi na pahunche....
aamen ( aisa hi ho)
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pushpendra on 03 August, 2010 19:37;42
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dalit agar itne apman ke bad hindu bana hai to yah hmare liye garv ki bat hai; brahmado ki shoch hoti to unhe hindu dharm chod dena chahiye tha .
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Author info
image दिनेश शाक्य इटावा के रहनेवाले दिनेश शाक्य १९८९ से मीडिया में कार्यरत. १९८९ में पत्रिका हलचल से जुडे फिर साप्ताहिक चौथी दुनिया के बाद दिल्ली प्रेस प्रकाशन से जुडे,१९९६ से समाचार ए़जेसी वार्ता में २००३ मार्च तक इटावा में रिपोर्टर के रूप में काम किया, सहारा समय न्यूज चैनल में काम. उत्तर प्रदेश में विस्फोट.कॉम की ओर से स्पेशल स्टेट करेस्पांडेन्ट.
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