सारण के अंधेरे में उजाले की दस्तक
‘कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता है, जरा तबियत से पत्थर तो उछालो यारों’। इस कथन को सच कर दिखाया है बिहार के सारण जिला में चल रहे सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड (कंपनी) के चार प्रमोटरों ने। योगेन्द्र प्रसाद, जर्नादन प्रसाद, रमेश कुमार और विवेक गुप्ता ने सन् 2006 में मिलकर सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड का गठन किया था, जिनकी एक ही मंशा थी अंधेरे में डूबे हुए सारण जिले के गांवों तक बिजली पहुँचाना।
इस कंपनी के प्रमोटर तो चार हैं, लेकिन इस कंपनी को बनाने में मूल योगदान 32 वर्षीय श्री विवेक गुप्ता का है। मूलतः छपरा जिला के निवासी श्री गुप्ता का लालन-पालन सारण जिले में हुआ था। उन्होंने बचपन से ही बिजली की किल्लत से जुझते हुए सारण के वाषिंदों को देखा था। हालांकि अपने करियर की शुरुआत विवेक गुप्ता ने भी अन्य युवाओं की तरह ही की थी। भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, दिल्ली से एमबीए करने के बाद श्री गुप्ता ने तकरीबन 8 सालों तक स्टैंडर्ड चाटर्ड बैंक, टाटा स्टील और आईसीआईसीआई बैंक में काम किया। सारण जिले में बिजली उत्पादन शुरु करने का ख्याल श्री गुप्ता के जहन में तब आया जब वे आईसीआईसीआई बैंक में शाखा प्रबंधक थे। सन् 2006 में आईसीआईसीआई बैंक के पास कुछ ऐसे उत्पाद थे जिसके माध्यम से बैंक माइक्रो फाइनेंस स्कीम के अंतर्गत रिन्यूबल एनर्जी की संकल्पना को अमलीजामा पहनाने में रुचि रखने वाले इच्छुक और उद्यमशील उद्यमियों को वितीय सहायता उपलब्घ करवा रही थी।
इस अनुकूल माहौल को देखकर श्री गुप्ता को लगा कि यही सही समय है अपने बचपन के सपनों को पूरा करने का। अपने सपनों को सच करने के लिए श्री गुप्ता ने रमेश कुमार से संपर्क किया, क्योंकि वे एक पढ़े-लिखे अनुभवी व्यापारी थे और छपरा में तकरीबन 10 सालों से जेनरेटर के द्वारा लोगों को बिजली मुहैया करवा रहे थे। श्री गुप्ता ने रमेष कुमार से कहा कि वे सारण जिला के गारखा गांव जाकर वहाँ जमीन की उपलब्धता, बिजली उत्पादन के लिए जरुरी कच्चे माल की आसानी से सर्वसुलभता, बिजली की मांग इत्यादि की सही जानकारी को सामने लायें, ताकि इस दिशा में आगे कदम बढ़ाया जा सके। रमेश कुमार के लिए इस तरह का सर्वे करना आसान था। श्री कुमार जानते थे कि इस तरह के सपने को अकेले साकार नहीं किया जा सकता है। लिहाजा काम सुचारू रुप से चलता रहे और सर्वदा गतिशील रहे, इसके लिए रमेश कुमार ने बाद में अपने पिता योगेन्द्र प्रसाद को भी इस काम में शामिल कर लिया। योगेन्द्र प्रसाद छपरा के जाने-माने किसान और व्यापारी थे और उनके पास 40 वर्षों का अनुभव भी था। इस टीम के चौथे सदस्य थे जर्नादन प्रसाद। श्री प्रसाद एक अनुभवी कृषक थे और साथ में छपरा में 38 सालों से अपना कारोबार भी कर रहे थे। श्री प्रसाद का स्थानीय किसानों पर अच्छा प्रभाव था और वे हर तरह से कंपनी के कार्यों को सफलता पूर्वक आगे बढ़ाने में सक्षम थे।
बावजूद इसके पॉवर ग्रिड स्थापित करने के लिए जमीन, बिजली उत्पादन की तकनीक, पावर सप्लाई, बिजली उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपल्ब्धता, आर्थिक सहायता प्राप्त करना, लोगों को इसके लिए राजी करना एवं सकारात्मक वातावरण बनाना इत्यादि कुछ ऐसे मुद्दे थे जिनपर विजय पाना आसान काम नहीं था। फिर भी सफलता मिलने की आषा में विवेक गुप्ता की अगुआई में सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड ने अंततः सन् 2006 से बिजली उत्पादन करना चालू कर दिया। कंपनी का तत्कालिक उद्देष्य था गारखा गांव के हर घर में ग्रीन बिजली पहुँचाना। अपने उद्देष्य की प्राप्ति के लिए कंपनी ने बिजली के उत्पादन के लिए चावल व गेंहू की भूसी, पौधों की टूटी डाल, जुलिफ्लोरा, बेकार लकड़ी और ढैंचा जैसे पर्यावरण के दृष्टिकोण से सुरक्षित एवं मुफीद उत्पादों का सहारा लिया।
सारण रिन्यूबल एनर्जी का कार्य वैसे तो विशुद्ध व्यापार का पर्याय है, किंतु यह व्यापार समाज और पर्यावरण के सरोकारों से जुड़ा हुआ है इसलिए इसकी महत्ता अतुलनीय है। अगर इस तरह से व्यापार हमारे देश के सभी कारपोरेट हाउस करने लगें तो हमारे देश और समाज का पूर्णरुप से कायाकल्प हो जाएगा। शुरुआती दिक्कतों के बावजूद सन् 2006 से लेकर अब तक यह कंपनी 200 से ज्यादा घरों को रोशनी से जगमगा चुकी है। इसके अलावा यह अनेक छोटे-मोटे फर्म, निजी अस्तपताल और एक स्कूल में अरसे से कायम अंधेरे को भी हरा चुकी है। पारंपरिक तरीके से हटकर बिजली उत्पादन के विकल्प के रुप में ढैंचा नामक पौधे से बिजली पैदा करने की योजना को कंपनी द्वारा कार्यरूप दिया जा रहा है। फिलवक्त बिजली उत्पादन का 85 फीसद हिस्सा ढैंचा की मदद से किया जा रहा है।
दरअसल सारण जिले की भूमि ढैंचा के उत्पादन के लिए बेहद ही अनुकूल है। गंगा और गंडक के बीच की जमीन में ढैंचा नामक पौधे का उत्पादन जमीन की उर्वरा शक्ति के कारण सामान्य से ज्यादा होता है और यह समयपूर्व 6 से 8 महीनों में ही परिपक्व हो जाता है, जबकि सामान्यतः इस पौधे को तैयार होने में तकरीबन 11 से 12 महीनों का वक्त लगता है। ढैंचा का उत्पादन अधिक से अधिक हो और किसान इस पौधे के उत्पादन के लिए प्रेरित हों, इसके लिए कंपनी किसानों को मुफ्त बीज उपलब्ध करवा रही है। साथ ही किसानों को इसके उत्पादन के लिए बिजली भी उपलब्ध करवाया जा रहा है।
किसानों को इस फसल को बेचने के लिए न तो बाजार जाना पड़ता है और न ही दलालों के हाथों मूर्ख बनना पड़ता है। कंपनी किसानों द्वारा उत्पादित सारा फसल कंपनी खरीद लेती है। इससे जुड़ी हुई सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पौधे का उत्पादन बंजर जमीन पर भी किया जा सकता है और इसके लिए किसानों को खाद-बीज के लिए कोई निवेश करने की जरुरत नहीं होती है। फलस्वरुप वे किसान जोकि अपने जमीन के बंजर बनने के कारण कभी मजदूर बन गए थे, वे फिर से किसान बन गए हैं। सामान्य रुप से एक हेक्टेयर में अंदाजन 5000 किलोग्राम ढैंचा का उत्पादन किया जा सकता है, जिसकी कीमत किसानों को 7500/- से 10000/- रुपयों तक कंपनी द्वारा दी जाती है। फिलहाल कंपनी गांवों में 8 से 10 घंटे बिजली दे रही है और इसके लिए वह 8 से 10 रुपये प्रति यूनिट कीमत वसूल कर रही है जोकि शहरों से दुगना से ढाई गुना है, फिर भी जेनरेटर में होने वाले खर्च से यह बहुत ही कम है।
अब धीरे-धीरे सारण रिन्यूबल एनर्जी की बिजली गारखा गांव से सटे आस-पास के गांवों में पहुँच रही है। साल दर साल बिजली की मांग में बढ़ोत्तरी हो रही है, जोकि अब लगभग 80 फीसद तक बढ़ गई है। लिहाजा मांग और आपूर्ति में संतुलन कायम करने के लिए कंपनी की योजना 30 से 60 किलोवाट क्षमता वाले छोटे-छोटे प्लांट लगाने की है। इसके बरक्स में यहाँ यह स्पष्ट करना समीचीन होगा कि कम क्षमता वाले ऐसे प्लांट गांवों में बिजली उपलब्ध करवाने के लिए सबसे आसान माध्यम हैं। मूलरुप से इस कंपनी ने अपना कार्यक्षेत्र गारखा गांव को बनाया है। इस गांव में 120 किलोवाट क्षमता का एक बायो गैसिफिकेषन प्लांट भी लगाया गया है। इस प्लांट से गैस से बिजली पैदा की जाती है। गारखा गांव में स्थापित 1 मेगावॉट के प्लांट के अतिरिक्त 2 मेगावॉट का प्लांट छपरा में और 5 मेगावॉट का प्लांट सारण जिले के शीतलपुर में कंपनी द्वारा शीघ्रताषीघ्र संचालित किये जाने की संभावना है।
भविष्य की अन्यान्य योजनाओं के तहत कंपनी वैषाली, सिवान और मुज्जफरपुर इत्यादि जिलों में 4 से 6 मेगावॉट के प्लांट लगाना चाहती है। भोजपुर जिला में 950 मिलियन की लागत से कंपनी के पास 24 मेगावॉट का बायोमास पर आधारित पावर प्लांट लगाने की योजना है। इसी क्रम में पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बलिया और देवरिया में भी पावर प्लांट लगाने का इरादा कंपनी रखती है। भूसा पर आधारित 4 प्लांट 2010 के अंत तक आरंभ होने वाली है। गारखा की तर्ज पर भरतपुर और नेपाल में भी जल्द ही पावर प्लांट कंपनी द्वारा शुरु की जाने वाली है। गारखा में चल रहे पावर प्लांट की कैपिसिटी को भी दुगना किये जाने की योजना पाईपलाईन में है।
भविष्य की योजनाओं को मूर्त्तरुप देने के लिए श्री गुप्ता ने कंपनी की 46 फीसद हिस्सेदारी बेचकर 6 करोड़ रुपये हाल ही में इकट्ठा किया है। उल्लेखनीय है कि कंपनी ने मात्र 80 लाख रुपयों के बलबूते पर अपने कारोबार की शुरुआत की थी और देखते-देखते वितीय वर्ष 2009-10 में कंपनी ने 1.5 करोड़ रुपये का विषुद्ध मुनाफा भी अर्जित कर लिया। ज्ञातव्य है कि कंपनी के व्यापार में प्रतिवर्ष 30 फीसद की दर से इजाफा हो रहा है। ‘आऊटलुक बिजनेस’ पत्रिका द्वारा देष के 50 सामाजिक उद्यमियों में से एक के रुप में सम्मानित और 2009 के ऐशडेन पुरस्कार से नवाजे गए श्री गुप्ता सचमुच बिहार के लोगों के लिए एक आइकॉन के समान हैं। उनकी ऐसी अविस्मरणीय सफलता तब है जब बिहार के युवाओं के बीच कभी भी कारोबार करने का क्रेज नहीं रहा है। यहाँ के युवाओं की प्रथम प्राथमिकता आईएएस बनने की होती है। अगर आईएएस नहीं बन पाए तो कोई भी सरकारी नौकरी कर लेते हैं, चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो? ऐसे प्रतिकूल माहौल में श्री गुप्ता ने जिस तरह से अंधेरे को रोशनी दिखाने की पहल की है वह अपने आप में एक अतुलनीय मिसाल है और साथ में बिहार के युवाओं के बदलते मिजाज की बानगी भी।
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