Home | भारत की कहानी | गोल की कहानी गोलमोल

गोल की कहानी गोलमोल

image अपनी टीम के साथ ईशान (सबसे ऊपर, बीच में)

मणिशंकर अय्यर ने कामनवेल्थ खेलों पर तल्ख टिप्पणी करके खेल गिरोहों को आंदोलित कर दिया है. गिरोहबाज कह रहे हैं कि अय्यर ने जो टिप्पणी की है वह देशद्रोह से कम नहीं है. लेकिन अय्यर ने ऐसा क्या गलत कहा है? अय्यर कहते हैं कि कामनवेल्थ खेलों के नाम पर दिल्ली में जितना पैसा बरबाद किया जा रहा है उतने पैसे से देश के करोड़ों बच्चों के लिए खेलने का माहौल बनाया जा सकता है. स्वीडन से फुटबाल खेलकर लौटे ईशान्त के उदाहरण को देखें तो मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी उतनी तल्ख नजर नहीं आती.

सचिन और सानिया को जानने वाले ईशान को नहीं जानते होंगे ,१४ साल का ईशान भी सचिन और सानिया को नहीं जानता, उसकी निगाहें सपनों में भी गोल पोस्ट की और तेजी से बढते हुए अग्रिम पंक्ति के विरोधी खिलाड़ियों की और होती है जिनके किसी भी वार को असफल करने कीं वो हरसंभव कोशिशें करता है, वो फुटबाल खाता है, फुटबाल जीता है, फुटबाल को ही सोचता है। दो दिन पहले स्वीडन से गोथीया कप खेल कर वापस लौटे ईशान से जब पूछता हूँ कि तुम्हे फुटबाल और पढाई में से कोई एक चीज चुननी हो तुम क्या चुनोगे? वो मुस्कुराते हुए कहता है पढता कौन है मुझे तो सिर्फ फुटबॉल चाहिए।

गोठिया कप में ब्राजील, नार्वे, पुर्तगाल जैसी टीमों को शिकस्त देकर क्वार्टर फाइनल में पहुँचने वाली ईशान की टीम सेमी –फाइनल सिर्फ इसलिए नहीं खेल पायी क्यूंकि उनका कोच मैच वाले दिन सो गया ,वो जब उठा और टीम को लेकर स्टेडियम पहुंचा दूसरी टीम को वाक ओवर दिया जा चुका था, ईशान हताश नहीं है, मुझे हिंदुस्तान की टीम में जगह चाहिए, मै देश की तरफ से खेलना चाहता हूँ। जानता हूँ ये मुश्किल है, मगर कोशिश तो कर सकता हूँ। ईशान उस देश की टीम में हिस्सेदारी चाहता है जहाँ बच्चों को शायद ही देश की फूटबाल टीम के कप्तान का नाम मालूम हो, जहाँ फुटबाल प्रेमियों की आँखें अपनी टीम को विश्व कप में खेलते देखने की चाह में बूढी हो गयी हैं क्रिकेट और उससे जुड़े ग्लैमर और पैसे का जुनून इस कदर सर चढ कर बोलता है कि हर माँ बाप बच्चे में धोनी और सचिन ही को ही ढूंढते हैं।

ये कहानी ईशान की है ,छोटी आँखों वाले इस लड़के को सबसे अधिक खुशी तब होती है जब वो गोली की रफ़्तार से किये गए प्रहार को अपना दमखम लगाकर रोक पाने में सफल रहता है ,उसके “इस्टर्न मेत्योर फुटबाल अकादमी “के कोच अमित नंदा और उसके खिलाडी उसके पूर्वानुमान का लोहा मानते हैं शायद यही वजह है कि देश के बड़े फुटबाल क्लब उसे अपनी ओर से खेलने का बार बार न्योता दे रहे हैं. मगर पैसा? ईशान अभी जब १० दिन पहले स्वीडन गया तो उसने अपने जेबखर्च से बचाए सारे पैसे इकट्ठे किये, फिर भी वो उतने नहीं हो पाए कि वो बाहर खेलने जा सके जैसे तैसे करके माँ आशा और पिता रामप्रकाश ने जो कि एक वक्त खुद दिल्ली की फुटबाल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, ने टिकट का जुगाड किया तो बाहर जाने पर एक दूसरी दिक्कत आन पड़ी, अजीब थी ये दिक्कत भी, ईशान हँसते हुए बताता है कि हम हिन्दुस्तानी तीन वक्त खाते हैं वहां दो वक्त का ही खाना मिलता था, तीसरे वक्त के खाने का इंतजाम भी हमें अपनी जेब से करना पड़ा।

आप जानते हैं वो हमसे बेहतर नहीं खेलते; लेकिन बात अवसरों की होती है हमारे यहाँ अवसर कम हैं, उन्हें देश की टीम में जगह नहीं मिले तो क्लब में खेलने को मिल जाता है वो अपना कैरियर फुटबाल में बना सकते हैं ,मगर हमारे यहाँ ऐसा नहीं हो पाता, कभी कभी हम मैच खेलने को तरस जाते हैं, ऐसा नहीं हो सकता क्या कि हर कालेज की अपनी फुटबाल टीम हो, देश में क्रिकेट की तरह गली गली में फुटबाल खेली जाए, ऐसा होगा, मुझे लगता है होगा। अर्जेंटीना के मेस्सी का दीवाना ईशान, माराडोना को एक बेहतरीन खिलाड़ी के लिए नहीं एक कोच के रूप में ज्यादा पसंद करता है ,कहता है “आपने देखा होगा वो अपने खिलाड़ियों का माथा चूम उन्हें मैदान में भेजते हैं, ऐसा भला कोई करता है ?

ग्यारहवीं में पढ़ने वाले ईशान की माँ से मै जब पूछता हूँ आपको डर नहीं लगता लड़का फुटबाल खेलता है, कहती हैं नहीं, हम लोगों को डर नहीं लगता। हम उसे पैसे के लिए नहीं खिला रहे हम उसे नाम के लिए नहीं खिला रहे। हम चाहते हैं वो जिसे वो सबसे ज्यादा प्यार करता है वो जिंदगी भर उसके साथ रहे वो सिर्फ फुटबाल है, अगर ईशान को फुटबाल के मैदान में रात को २ बजे जाना है तो वो जायेगा, अमेरिका के कोंटिनेंटल कप में पैरों में चोट के बावजूद उसने गोलपोस्ट नहीं छोड़ी, हम उसके सपनों को जी रहे हैं, वो अपने आप जैसा बनना चाहता है बन जायेगा।

Subscribe to comments feed Comments (3 posted):

संध्या अग्रवाल on 28 July, 2010 14:32;31
avatar
ईशान तुम्हे ढेर सारी शुभकामनायें ,कल तुम्हारा है
Thumbs Up Thumbs Down
0
deepak baba on 28 July, 2010 20:48;50
avatar
पूर्व मंत्री और कांग्रेस के राज्‍यसभा सदस्‍य मणिशंकर अय्यर: मैंइस मुद्दे पर अब 15 अक्टूबर को बात करना चाहूंगा। 15 अक्टूबर को आप खुद सेपूछिएगा कि इन खेलों के आयोजन से आप गौरवमहसूस कर रहे हैं या फिर शर्म।
मैं अय्यर साहेब से बिलकुल सहमत हूँ..................
Thumbs Up Thumbs Down
1
Sandeep Narula on 29 July, 2010 16:46;08
avatar
Ishan has done a wpnderful job.We are pround on Ishan.Keep it up.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 3 | displaying: 1 - 3

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image awesh tiwari मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है | विगत २ वर्षों से लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट ' में ब्यूरो प्रमुख। awesh29@gmail.com
Rate this article
5.00
More from भारत की कहानी
Previous
image
अपने होने पर ही हैरान
‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं। ...
image
जमीन ले लो या गोली मार दो
भारत-पाक सरहद पर बसे किसान इन दिनों खासी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि किसान मरने तक को तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या पर न तो नौकरशाह गौर कर रहे हैं और न ही सफेदपोश। दरअसल, लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे किसानों के सामने हाल ही में आए एक सरकारी फरमान ने कई दुविधाएं खड़ी कर दी है। इस फरमान के मुताबिक सीमा क्षेत्र में तारबंदी के पार दो फिट से ज्यादा ऊंची फसल पर पाबंदी लगा दी गई है, जबकि किसान सीमा क्षेत्र में जो भी फसल बोते हैं, उनकी ऊंचाई दो फिट से अधिक ही है।...
image
डकैती छोड़ दी, पर पुलिस पीछा नहीं छोड़ती
पुलिस कहती है कि चंबल से डाकुओं का खात्मा हो गया है. इसमें बहुत हद तक सच्चाई भी है लेकिन डाकुओं के खात्मे के बाद भी पुलिस का काम खत्म नहीं हुआ है. जो डाकू डकैती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले गये या कुछ तो बाकायदा साधु सन्यासी हो गये. पुलिस अभी भी उनके पीछे पड़ी हुई है और खोज खोज कर गिरफ्तार कर रही है. दिनेश शाक्य की रिपोर्ट-...
image
विस्थापन के 33 साल बाद,पूरी तरह बर्बाद
भारत की औद्योगिक प्रगति और शहरी विकास के लिए सबसे आधारभूत जरूरत है जमीन. जहां भी विकास का पहिया पहुंचता है, पहले वहां की जमीन और जमीन के वाशिंदों को रौंदता है. फिर अपनी मर्जी के मुताबिक एक नया साम्राज्य विकसित करता है जो विकास का विस्तार बताकर हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन इस साम्राज्य के विकासक्रम में पीछे छूट गये लोगों की एक दुनिया शेष रह जाती है. सरकार और कंपनियां जिन्हें मुआवजा देकर "अमीर" बनाकर छोड़ देती हैं वे पीछे छूट गये लोग कितने दयनीय होकर रह जाते हैं इसका सटीक उदाहरण है गाजियाबाद का कड़कड़ मॉडल गांव. इस गांव के जरिए विकास और विस्थापन का जायजा ले रहे हैं अनिल पाण्डेय. ...
image
बज गया बस्तर का बैंड
हाल के वर्षों में देश दुनिया बस्तर को सिर्फ इसलिए जानती है कि वहां कब कहां कैसे कितने नक्सली मारे गये या फिर नक्सलियों ने कितने पुलिसवालों को मार गिराया है. लेकिन आदिवासियों की समृद्ध दैवीय परंपरा से एक ऐसा नाद उठ खड़ा हुआ है जो संगीनों की कर्कश आवाज को दबाने के लिए बस्तर से निकल पड़ा है. यह बस्तर बैण्ड है. आदिवासियों की अपनी पहल पर निर्मित हुए बस्तर बैंड देश दुनिया को बस्तर के इस परंपरागत स्वरूप से परिचय करा रहा है जो बस्तर के संगीत में विराजमान दैवीय नाद से श्रोताओं के अनहद को छू रहा है. ...
image
गर्त में गये गांव
2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है, जबकि निवास स्थान छोड़ने को आधार मानें तो 30 करोड़ लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है....
image
बाल अधिकारों के बीस साल बाद
अब से बीस साल पहले 1989 को सयुंक्त राष्ट्र द्वारा पारित बाल-अधिकारों के कन्वेंशन के जरिए बच्चों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ्य और सुरक्षित दुनिया का लक्ष्य रखा गया था. मगर समय के दप दशक गुजर जाने के बाद आज बच्चों की यह दुनिया कहीं बदतर, असुरक्षित और बीमार दिखाई देती है....
image
दलित उद्यमियों का बढ़ता दबदबा
पहले दलित उद्यमी गंगाराम कांबले के राज्य महाराष्ट्र में इन दिनों दलित उद्यमशीलता की नई इबारत लिखी जा रही है। कांबले ज्ञात दलित इतिहास में भारत के पहले दलित उद्यमी के तौर पर नजर आते हैं। वे शाहूजी महाराज के समकालीन थे। आज दलित समाज से निकलकर व्यवसाय में पांव जमाने वाले उद्यमियों की संख्या पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। लेकिन यह गति महाराष्ट्र में थोड़ी तेज है. अब महाराष्ट्र में दलित व्यवसायियों को एक मंच पर लाकर खड़ा करने के लिए दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) जैसा मंच भी तैयार हो चुका है।...
image
पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन
कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।...
image
भूख के पेट में भारत के बच्चे
यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।...
image
भारत के भूख का अर्थ
पीयूसीएल द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है वह भारत की असली कहानी कहता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकार गोदामों और खुले स्थानों पर अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देती है. यह सरकारी बदइंतजामी है और कुछ नहीं. इससे तो अच्छा है कि अनाज गरीबों को मुफ्त में दिया जाए. भारत में सबसे तेजी से बढ़ते आईटी, मोबाइल टेलेफोनी, आटोमोबाइल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आईपीएल सेक्टर को बढ़त का सबसे तेज रफ्तारवाला माना जाता है लेकिन भूख की रफ़्तार के आगे ये सारे सेक्टर बहुत पीछे हैं। ...
image
बाढ़ से लथपथ हुआ लद्दाख
इस बात पर मौसम वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे कि यह कैसी घटना थी जिसमें बादल फटने से किसी गांव या जिले पर विपत्ति नहीं बल्कि लद्दाख जो कि क्षेत्रफल में देश के कुछ छोटे राज्यों के बराबर है, पूरा का पूरा इसकी चपेट में आ गया जिसके कारण लद्दाख से करगिल तक का मार्ग ध्वस्त हो गया. छह पुल उड़ गये और लेह मनाली के मार्ग में दो पुल टूट गये जिसने लेह को सारे देश से काट दिया. वैज्ञानिक कोई भी दलील दें यह बात फिर भी अनुत्तरित ही रहेगी कि आखिर लेह कस्बे को कब्रिस्तान में बदलने के लिए बादल फटने की एक घटना काफी क्यों थी?...
image
सुभागलाल का सपना सच हो गया
वैसे तो देश के असंख्य सुभागलालों का सपना सच नहीं होता है। मगर घोरवाल के सुभागलाल का सपना सच हो गया। उसके गांव के सारे बच्चे अब स्कूल जाते हैं। जब वह छोटा था तब ऐसा कतई नहीं था।...
image
महिलाएं बन गयी विकास की पहरुआ
कहते हैं कि राजनीति की चाबी से हर ताले खुलते हैं, परन्तु बिहार के समाज में महिलाओं को यह चाबी वर्षों से नहीं मिली थी। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के जाते-जाते करिश्मा हुआ। वर्ष 2001 में लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई, ग्राम पंचायत में आरक्षण के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करा दी गई।...
image
गोल की कहानी गोलमोल
मणिशंकर अय्यर ने कामनवेल्थ खेलों पर तल्ख टिप्पणी करके खेल गिरोहों को आंदोलित कर दिया है. गिरोहबाज कह रहे हैं कि अय्यर ने जो टिप्पणी की है वह देशद्रोह से कम नहीं है. लेकिन अय्यर ने ऐसा क्या गलत कहा है? अय्यर कहते हैं कि कामनवेल्थ खेलों के नाम पर दिल्ली में जितना पैसा बरबाद किया जा रहा है उतने पैसे से देश के करोड़ों बच्चों के लिए खेलने का माहौल बनाया जा सकता है. स्वीडन से फुटबाल खेलकर लौटे ईशान्त के उदाहरण को देखें तो मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी उतनी तल्ख नजर नहीं आती....
image
सारण के अंधेरे में उजाले की दस्तक
‘कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता है, जरा तबियत से पत्थर तो उछालो यारों’। इस कथन को सच कर दिखाया है बिहार के सारण जिला में चल रहे सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड (कंपनी) के चार प्रमोटरों ने। योगेन्द्र प्रसाद, जर्नादन प्रसाद, रमेश कुमार और विवेक गुप्ता ने सन् 2006 में मिलकर सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड का गठन किया था, जिनकी एक ही मंशा थी अंधेरे में डूबे हुए सारण जिले के गांवों तक बिजली पहुँचाना।...
image
कुख्यात चंबल घाटी होगी विख्यात
दस्यु संरक्षण के लिए कुख्यात रहीं चंबल की वादी की तस्वीर बदलने के लिए की जा रही कवायद का एक हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रकृति की तमाम अद्भुत धरोहरों को अपने आगोश में समाने वाली इन्हीं वादियों के प्रति राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने आने वाले देशी व विदेशी सैलानियों के अंतःमन में रम चुकी कुख्यात चंबल घाटी को अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात करने का प्रयास मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन ने कर दी है। चंबल चेलेंज नाम से तैयार कराए गए इस प्रोजेक्ट में पर्यटक चंबल की घाटी में संरक्षित दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के दीदार तो कर ही सकेंगें अपितु मिट्टी के पहाड़ों पर रोमांचक खेलों का आनंद भी उठा सकेंगें।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2