बाढ़ से लथपथ हुआ लद्दाख
इस बात पर मौसम वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे कि यह कैसी घटना थी जिसमें बादल फटने से किसी गांव या जिले पर विपत्ति नहीं बल्कि लद्दाख जो कि क्षेत्रफल में देश के कुछ छोटे राज्यों के बराबर है, पूरा का पूरा इसकी चपेट में आ गया जिसके कारण लद्दाख से करगिल तक का मार्ग ध्वस्त हो गया. छह पुल उड़ गये और लेह मनाली के मार्ग में दो पुल टूट गये जिसने लेह को सारे देश से काट दिया. वैज्ञानिक कोई भी दलील दें यह बात फिर भी अनुत्तरित ही रहेगी कि आखिर लेह कस्बे को कब्रिस्तान में बदलने के लिए बादल फटने की एक घटना काफी क्यों थी?
दुनिया की छत 'लेह' की बाढ़ एक असाधारण घटना है, लेकिन जब यह पता चले कि आमतौर पर बरसात में भी वह इलाका सूखा ही रहता है और वहां पूरे साल कुछ इंच पानी ही बरसता है तो यह घटना आश्चर्यजनक ही कही जाएगी. कहते हैं कि बादल फटे, बिजली गिरी और पानी ऐसे उतर आया जैसे किसी ने बादल तोड़ दिया हो. बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं बरसात के दिनों में देश के कई भागों में अक्सर हुआ करती है. उनसे कुछ तबाही भी होती है. पानी आता है और छोटी छोटी नदियां अचानक विकराल रूप धारण कर लेती हैं. आस पास के इलाके में जो कुछ सामने आता है, बहाकर ले जाती हैं. लद्दाख जैसे क्षेत्र में तो पानी और भी तेजी से बह जाएगा. लेकिन यहां जो बाढ़ आयी उसने बहाने की बजाय दबाने का काम किया. रास्ते में पशु, घर, आदमी जो कुछ आया बाढ़ सबको दबाती चली गयी. इसलिए यह बाढ़ के पानी का प्रकोप कम था, कीचड़ का कहर अधिक था. यानी पानी और धरती का मिला जुला प्रतिशोध.
जब मैं बच्चा था, लेह उस वक्त बहुत छोटा सा कस्बा था, काफी खुला खुला. पहाड़ी पर बने लद्दाख के पारंपरिक राजा के महल और मुख्य कस्बे के बीच काफी खुलापन हुआ करता था. कस्बे के बीच से एक छोटी नदी या पहाड़ी नाला बहता था जो कस्बे के पानी का स्रोत था. कुछ साल पहले पांच दशक बाद जब मैं फिर लेह गया तो मैं उसे किसी कोने से नहीं पहचान सका. मैंने बाजार में अपने पुराने घर को खोजना चाहा तो नहीं मिला क्योकि उसकी एकमात्र पहचान वह नदी अब वहां नहीं थी. मकान सटे हुए थे, वैसे ही जैसे मैदानी कस्बों में होते हैं. तब मेरे दिमाग में यह बात नहीं आयी थी, लेकिन लेह की बरबादी की कहानी पढ़ते हुए अचानक याद आया कि अगर पानी अचानक आया होगा तो कहां जाता? वह निकलता कहां से? उसके निकलने के सारे रास्ते तो बंद कर दिये गये हैं.
अगर लेह की नदी नगर के विकास के लिए भूमिगत हो गयी है तो आसपास के कई और नाले भी गायब हो गये होंगे. हजारों घनफिट विप्लवकारी पानी वेग के साथ आयेगा और उसे अपना पुराना रास्ता मिलने की बजाय मकान मिलेंगे तो वह उन्हें ध्वस्त करता हुआ आगे बढ़ जाएगा. दुर्भाग्य की बात है कि इसमें बड़े लोगों के घर या सरकारी इमारतें तो पहला वार सह गयीं लेकिन गरीबों के कच्चे घर नहीं झेल पाये. वे न केवल धराशायी हो गये बल्कि कीचड़ के नीचे सदा के लिए सो गये. लद्दाख में पारंपरिक तौर पर घर कच्ची ईंटों से बनते रहे हैं क्योंकि वहां ईंट पकाने के लिए लकड़ी का अभाव रहा है. लेह जैसे कस्बे में तो नई तरह की ईमारतें बनी हैं, जिनमें सीमेन्ट कंक्रीट का इस्तेमाल होता है लेकिन गांव में अब भी इन सुविधाओं का अभाव है इसलिए लेह से केवल छह किलोमीटर दूर बसे चोगलमसर गांवों में हर उस आदमी की वहां समाधि बन गयी जो समय से पहले भाग नहीं पाया. पूरा का पूरा गांव कीचड़ में दब गया.
बहुत लोगों के मन में यह सवाल उठता होगा कि एक दिन की बाढ़ में इतने लोग कैसे मरे? एक सौ पचास के मरने की खबर है. चार सौ लोग दो दिन तक लापता थे. दो सौ लोग अपने घरों को वापस लौट आये हैं लेकिन शेष लोगों के जीवित बचे न होने की पूरी संभावना जताई जा रही है. इस तबाही को समझने के लिए लद्दाख की भौगोलिक संरचना को भी समझना होगा. लद्दाख हिमालय की छाया में बसा क्षेत्र है जहां मानसून पहुंचता ही नहीं है इसलिए वहां पानी बहुत कम बरसता है. अत्यंत ठंडा क्षेत्र होने के बावजूद हिमपात भी नहीं होता है. इसीलिए इसको ठंडा मरुस्थल कहा जाता है. इसका प्रभाव इसकी जमीन पर भी पड़ा है. यानी नमी के अभाव में हरियाली कम है, पेड़ पौधे केवल वहीं उगते हैं, जहां कुछ पानी हो. जमीन रेतीली है, इसलिए वह टिकती नहीं है.
रेतीली जमीन को बांधे रखना बहुत मुश्किल होता है इसलिए जब तेज पानी की धार आ जाती है तो वह जमीन को काटती ही नहीं चली जाती बल्कि उसे कीचड़ में भी बदलती चली जाती है. जो पानी ऊपर से आता है वह थोड़ी ही देर में कीचड़ की बाढ़ का रूप ले लेता है. कीचड़ पानी की तुलना में अधिक मारक है. पानी में तो कहीं बहकर पहुंचने की उम्मीद रहती है लेकिन कीचड़ तो दबाता चला जाता है. कीचड़ हवा के सारे रास्ते सील कर देती है. इन परिस्थितियों को समझ सकें तो समझना आसान होगा कि लद्दाख की त्रासदी किसी आम बाढ़ की त्रासदी से घातक और खतरनाक है.
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