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दलित उद्यमियों का बढ़ता दबदबा

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पहले दलित उद्यमी गंगाराम कांबले के राज्य महाराष्ट्र में इन दिनों दलित उद्यमशीलता की नई इबारत लिखी जा रही है। कांबले ज्ञात दलित इतिहास में भारत के पहले दलित उद्यमी के तौर पर नजर आते हैं। वे शाहूजी महाराज के समकालीन थे। आज दलित समाज से निकलकर व्यवसाय में पांव जमाने वाले उद्यमियों की संख्या पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। लेकिन यह गति महाराष्ट्र में थोड़ी तेज है. अब महाराष्ट्र में दलित व्यवसायियों को एक मंच पर लाकर खड़ा करने के लिए दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) जैसा मंच भी तैयार हो चुका है।

इस तरह की शुरुआत के लिए ‘डिक्की’ के अध्यक्ष अम्बेदकरवादी मिलिन्द कांबले बधाई के पात्र हैं। वे महाराष्ट्र की निर्माण क्षेत्र की एक कंपनी ‘फॉर्च्यून कन्स्ट्रशन’ के मालिक हैं। उनकी कंपनी का साल का कारोबार 60 करोड़ का है। कांबले सोमवार से शुक्रवार तक डिक्की के लिए समय निकालते ही हैं लेकिन शनिवार और रविवार के पूरे 48 घंटे वे अपनी छोटी सी टीम के साथ डिक्की को समर्पित करते हैं। डिक्की और डिक्की से जुड़े साथियों के श्रम की वजह से आज दलित समाज से जुड़े व्यावसायी अपनी पहचान के साथ सामने आ रहे हैं। डिक्की की अपनी टीम इस वक्त जितनी बड़ी है, उसके शुभ चिन्तकों की टीम उससे कई सौ गुणा बड़ी है।

सूर्याटेक सोलर सिस्टम के मालिक मुकुन्द कमलाकर ने अपनी दलित पहचान छुपाने के लिए कभी मुकूुन्द कांबले से अपनी पहचान कमलाकर कर ली थी। आज उनकी कंपनी का साल का दो करोड़ का टर्न ओवर है, इस समय उनके ग्राहकों की लिस्ट में जहीर खान जैसे क्रिकेटर भी शामिल हैं। पूणे के समाज में वे एक प्रतिष्ठित व्यवसायी के तौर पर जाने जाते हैं। इन सबके साथ आज कमलाकर डिक्की के सदस्य होकर अपने पुराने कांबले पहचान के साथ खड़े हैं। अब उन्हें फर्क नहीं पड़ता की लोग उन्हें कांबले कहें या कमलाकर।

महाराष्ट्र में इन युवा दलित उद्यमियों के बढ़ते कदमों की थाप अभी धीमी है, लेकिन उन सभी व्यवसायियों के हौंसले बुलन्द हैं। 300 दलित कारोबारियों से मिलकर बनी डिक्की, जिसका साल का संयुक्त टर्नओवर पांच हजार करोड़ का है। वैसे तो यह पहल अपने शैशवावस्था में है। अभी इस मुहीम के साथ देशभर के दलित उद्यमियों का जुड़ना शेष है। हाल ही में जब डिक्की ने दलित उद्यमियों के लिए एक बड़े ट्रैड फेयर ‘दलित डीप एक्सपो’ का आयोजन पूणे में किया। उस आयोजन को देखने के लिए देश भर से व्यवसायी एकत्रित हुए। इस आयोजन में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए की लागत आई। आयोजकों ने इस बात का विशेष ख्याल रखा कि आयोजन का आर्थिक बोझ ट्रेड फेयर में स्टॉल लगाने वाले छोटे व्यवसायियों पर ना आए। उनके लिए स्टॉल निशुल्क ही उपलब्ध कराया गया। जिन लोगों से शुल्क लिया भी गया, तो वह भी नाम मात्र को ही था। यह आयोजन का जादू ही था, जिसकी वजह से कम विज्ञापन के बावजूद, इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली के लगभग सौ व्यवसायी शामिल हुए। व्यावसायी आयोजकों से मिले और उनसे आग्रह किया कि वे उनके राज्य में भी डिक्की को लेकर आएं।

डिक्की को उसके शुभचिन्तक एसोचैम, सीआईआई और फिक्की की श्रृंखला में अभी से ही देखने लगे हैं। खैर इसके लिए तो डिक्की को अभी लंबा सफर तय करना है, लेकिन इसे दलित समाज के उत्थान में एक ऐतिहासिक पहल के रुप में देखा जा सकता है। यहां उल्लेखनीय यह है कि इस ऐतिहासिक कदम के पीछे ना कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा काम कर रही है और ना यह किसी दलित आंदोलन का परिणाम है। यहां जो भी स्वत स्फूर्त है। महाराष्ट्र के बाद डिक्की मध्य प्रदेश और गुजरात के व्यवसायियों के बीच जा रहा है। जल्द ही वह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के दलित उद्यमियों से मुखातिब होगा।

बाबा साहब के सपनों की बात अक्सर सेमिनार, परिसंवादों में होती ही रहती है। यह सारी बहस आरक्षण और दलितों के साथ समाज में हो रहे भेदभाव से शुरू होकर मनुवाद और कर्मकांड को कोसते हुए सिमट कर रह जाती है। अम्बेदकर के उन सपनों पर बात नहीं होती, जिनमें वे भारत के दलितों को धन सम्पन्न देखना चाहते थे। समृद्ध देखना चाहते थे। हमेशा नौकरी लेने वालों की कतार में नहीं, नौकरी देने वालों में देखना चाहते थे। आज वह सपना साकार होता दिख रहा है। आज महाराष्ट्र के राजेन्द्र गायकवाड़ की आठ करोड़ की टर्न ओवर वाली ‘जीटी पेस्ट कंट्रोल कंपनी’ की वजह से छह सौ लोगों को रोजगार मिला है। इसमें बड़ी संख्या सवर्णों की भी है। इतना ही नहीं उनकी कंपनी की कई शाखा भारत में तो है ही, एक शाखा सिंगापुर में भी है और आने वाले दो सालों में वे अपनी को कंपनी को जापान और मलेशिया में लेकर जाने वाले हैं। देवानन्द लोंधे जो सांगली के छोटे से गांव हिंगनगांव में दास्ताने बनाने का काम करते हैं। उनकी कंपनी खासियत यह नहीं है कि वह दास्ताने बनाती है, बल्कि खासियत यह है कि उनकी कंपनी से बने सौ फीसद दास्ताने निर्यात होते हैं। महज दो साल पुरानी कंपनी का साल का कारोबार अस्सी लाख पर पहुंच गया है। वे चाहते तो अधिक उत्पादन वाली मशीने लगाकर अपने कर्मचारियों की संख्या कम कर सकते थे लेकिन उनका मकसद सिर्फ व्यवसाय करना नहीं था। वे अपने गांव में जिनके पास रोजगार नहीं है, उनके लिए रोजगार पैदा करने की इच्छा लेकर अफगानिस्तान से अपने गांव लौटे थे। वे एक संस्था की तरफ से दो साल अफगानिस्तान रहे, उससे पहले लंबा समय उन्होंने चेन्नई के सुनामी पीड़ितों के बीच बिताया था। देवानन्द ने अपनी कंपनी में 150 महिलाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था की। महिलाओं को रोजगार देने के पीछे उनकी दूरदर्शिता भी नजर आती है। चूंकि पैसा महिला के हाथ में आएगा तो उससे पूरे परिवार का सही सही विकास होगा।

महाराष्ट्र में चीनी माफिया की कहानी देश प्रसिद्ध है। वहां चीनी मिल के कारोबार में नए लोगों के आने के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। विपरित परिस्थ्तिियों में 20 सालों के लंबे प्रयास के बाद तीन साल पहले स्वप्निल भिंगारदवे महाराष्ट्र के पहले दलित चीनी मिल मालिक बने। उनके कुछ कारोबार पहले से भी चल रहे थे। चीनी मिल उसमें अब जाकर जुड़ा है। उनके सभी कारोबारों का संयुक्त सालाना टर्नओवर 90 करोड़ रुपए का है। उन्होंने 250 लोगों को रोजगार दिया है।

डिक्की ईकाई से खड़ी और बड़ी हुई संस्था है, ईकाई, दहाई से सैकड़ा पर पहुंचे डिक्की से जुड़े लोगों का आत्मविश्वास देखकर महसूस होता है कि आने वाले समय में यह सफर हजार, लाख से होता हुआ आगे बढ़ेगा। आज यह सवाल उठना लाजिमी है, देश में फिक्की, एसोचैम, सीआईआई जैसी बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट तरिके से काम करने व्यावसायियों के हितों का ख्याल रखने वाली संस्थाएं पहले से मौजूद हैं। इनकी मौजूदगी में दलितों के लिए क्या है? इनमें दलितों की भागीदारी कितनी है और कहां है? दलित वहां नही ंतो क्या हुआ, दलित डिक्की में हैं। अब इन्हें  नजर अंदाज  करना आसान नहीं होगा।

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पंकज झा . on 06 September, 2010 16:19;02
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आशीष जी कथित मुख्यधारा के लिए अनावश्यक लेकिन मानव-धारा के लिए ज़रूरी ख़बरों को चुन-चुन कर निकालने में माहिर हैं. ऐसे ही बाजारू मीडिया को आँखे दिखाते रहिये आशीष.
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Sanjeet Tripathi on 07 September, 2010 00:14;53
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बहुत ही बढ़िया रपट. पंकज जी से सहमत.
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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