अपने होने पर ही हैरान
‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं।
यह वह वंचित समाज है, जिन्हें आज भी पुलिस प्रशासन और समाज अपराधियों की नजर से देखता है। इस वंचित समाज से ताल्लुक रखने वालों को अपराधी साबित करने के लिए पुलिस को सबूत नहीं चाहिए होता। इनकी जाति ही इनके खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में सबसे बड़ा सबुत हो जाती है। एक समाज के साथ इससे बड़ी नाइंसाफी क्या होगी कि पूरा देश जब 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया। देश भर में हजारों विमुक्त एवं घुमंतू समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगबाग जेलों में ही कैद रहे। देश भर में समुदाय के लोगों के लिए जेल बने थे। जिन्हें आजादी के बाद भी खोला नहीं गया। इनमें सबसे बड़ा जेल शोलापुर का सेट्लमेन्ट था। इस सेट्लमेन्ट में नौ जमात के लोग रहते थे। इनको जेल से 31 अगस्त 1952 को आजादी मिली। देश के आजाद होने के भी पांच साल सोलह दिन बाद। पश्चिमी देश भारत को तीसरी दुनिया का देश कहते हैं। इस तीसरी दुनिया में चौथी दुनिया दलितों और आदिवासियों की माने तो उनसे भी अधिक बुरी दशा में अपनी जिन्दगी जीने को विवश विमुक्त समाज के लोगों की दुनिया को पांचवीं दुनियां ही कहना होगा। जिन्हें सरकार ने भी अपने नसीब के साथ मरने के लिए छोड़ रखा है।
देश भर में इस प्रकार की 190 जातियां थीं, जिन्हें देश की आजादी के बाद भी आजादी नसीब नहीं हुई। उनमें अधिकांश जेल में थे और जो बाहर थे, वे पुलिस से खुद को बचाते मारे मारे फिर रहे थे। आयंगर कमिटी के अनुसार ऐसे विमुक्त एवं घुमुतू समुदाय से ताल्लुक रखने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ थी। (जो आज लगभग साढ़े छह करोड़ है) आयंगर कमिटी ने स्वीकार किया इस समुदाय की हालत अच्छी नहीं है। उन्होंने सरकार से इनको विशेष सुविधा देने की सिफारिश की। सकार का इस विषय में रुख यह रहा कि हमने जो सूची बनानी थी, वह 1950 में बना ली। आदिवासी और पिछड़ी जाति के तौर पर। इन दो सूचियों के बाद अब तीसरी नई सूचि बनाना संभव नहीं है। उसके बाद 190 में से कुछ जातियों को पिछ़ड़ी और कुछ को आदिवासी जातियों में डालने की खानापूर्ति की गई। इसके बावजूद कई जातियां दोनों समुदायों में जाने से वंचित रहीं। दक्षिण भारत में एनाड़ी और एनाकुला नाम की दो वंचित जातियां हैं, जिन्होंने तय किया है कि वे वापस अपने समाज के लोगों को जेल में भेज दिए जाने के लिए अपील करेंगे। क्योंकि उन्हें समाज और पुलिस वालों के जेल से भी बदत्तर बर्ताव को रोज-रोज झेलना पड़ रहा है।
घुमक्कड़ी साहित्य में सम्मान दिलाती होगी, पर्यटन में मान दिलाती होगी लेकिन स्वभाव से घुमक्कड़ इन 119 जातियों को मान सम्मान मिलने की बजाय अपमान मिलता है. एक लिहाज से देखा जाए तो समाज व्यवस्था में घुमक्कड़ जातियां संदेशवाहक का काम करती और स्थिर समाज को एक दूसरे से जोड़ती थीं. लेकिन हमने समाज की इस स्वाभाविक व्यवस्था को अपराधी घोषित करके समाज के संवाद के तरीके को ही छिन्न भिन्न कर दिया.मुम्बई में आन्तोरोलिकर कमिटी बनी। आन्तोरोलिकर एक नेक इंसान थे। वे विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोगों के घरों में गए। उन्होंने स्थिति का अनुभव करके लिखा, इन समुदाय के लोगों की स्थिति में कैसे सुधार हो सकता है। उनकी शिक्षा और समाज के मूलभूत संरचना में सुधार के लिए उन्होंने कुछ सिफारिशें की। जो पूरी नहीं हो सकीं। 1980 में मंडल कमिशन आया। वहां इनकी कई जातियों को पिछड़ी जातियों में डाल दिया गया। लेकिन यह काम भी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुआ। विमुक्त एवं घुमंतू समुदाय के साथ लंबे समय से काम कर रहे प्रोफेसर गणेश देवी के अनुसार ‘लगातार ‘विमुक्त एवं घुमुतू समुदाय’ के लोग छले जाते रहे हैं। उन्हें अपनी सरकार से छल के सिवा कुछ नहीं मिला है। अब सरकार के पास हमलोग एक खत लिखने वाले हैं, जिसमें सिर्फ दो पंक्तियां लिखी होगी- ‘बहुत देर हुई है, अब आपको करना ही होगा।’ इसके सिवा हम कुछ नहीं लिखेंगे। इसके नीचे पचास हजार लोगों के हस्ताक्षर होंगे। 10 दिसम्बर को यह खत सरकार के पास चला जाएगा।’
अधिकार अभियान से जुड़े लोग अब छले जाने और सब्र के अश्वासनों के सहारे जीने को अब तैयार नहीं हैं। उनकी योजना स्पष्ट है। अगले साल इक्कीसवीं सदी के ग्यारहवें साल के ग्यारहवें महीने में विमुक्त समाज के लोगों के साथ कांजीभाई पटेल के नेतृत्व में ‘अधिकार अभियान’ के अन्तर्गत एक बड़ी रैली की जाएगी। यदि सरकार ने वंचित समाज के हक में कुछ काम किया तो उस रैली में समुदाय के लोग मिलकर खुशी मनाएंगे, नाचेंगे और गाएंगे। वह दिन दिपावली का होगा। यदि सरकार ने अगले एक साल में समुदाय की तरक्की के लिए कोई काम नहीं किया तो उस मुलाकात से यही संदेश समुदाय के लोग लेकर जाएंगे कि जो जहां है वहां रहकर अपने मरने का इंतजार करे क्योंकि इस देश में कोई उनकी तरफ देखने वाला नहीं है।
अधिकार अभियान के साथ जुड़े साथियों ने इस अभियान के लिए गीत और कुछ गाने भी तैयार किए हैं, जो उनकी तकलीफ को बयान करता है। अधिकार अभियान के समापन पर जब छारा समाज के रॉक्सी छाड़ा की देख रेख में ‘बुद्धन थिएटर’ के बच्चों ने बुद्धन सबर की कहानी को मंचित किया, मैदान का नजारा कुछ इस तरह का था कि मानों यह नाटक बुद्धन की नहीं, वहां मौजुद हर एक विमुक्त एवं घुमंतू समाज से जुड़े व्यक्ति की कथा कह रहा हो। अपनी होने की हैरानी आपको बता रहे हों.
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