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अमीर धरती गरीब लोग

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छत्तीसगढ़वासियों को `अमीर धरती के गरीब लोग´ कहा जाता है। कुदरत ने इस प्रदेश को अकूत संपदा का वरदान दिया है। इस नैसर्गिक संपदा के बावजूद छत्तीसगढ़ की 45 फीसदी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे होने के क्‍या कारण हो सकते हैं और इन विधानसभा चुनावों से यहां के लोगों की क्‍या हैं आशाएं...

एक नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश के कुछ हिस्से को काटकर छत्तीसगढ़ का गठन किया गया था। छत्तीसगढ़ के निर्माण की मांग पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा और लगातार उपेक्षित बने रहने के कारण लम्बे समय से की जा रही थी। इस राज्य में 75 फीसदी आबादी सीमांत एवं छोटे किसानों की है जबकि सींचित भूमि सिर्फ 29 प्रतिशत है। यहां 32 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजातियों, जबकि 12 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं और 45 फीसदी परिवार गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करते हैं। राज्य का 44 प्रतिशत हिस्सा वनों से घिरा हुआ है। जनजातीय आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा लघु वनोपज संग्रह पर आश्रित रहता है। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए सिंचाई सुविधाओं का न होना एक बड़ी समस्‍या रही है। जबकि धान एक ऐसी फसल है जो पानी की अधिक मांग करती है। ये आंकड़े छत्तीसगढ़ की एक छोटी सी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जिससे स्‍थानीय जनमानस की अपेक्षाएं वहां की परिस्थितयों के मुताबिक क्‍या हो सकती हैं, इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है। 70 के दशक में छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में पनपने वाला नक्सलवाद आज यहां कैंसर का रूप ले चुका है। आलम यह है कि करीब 40 हजार आदिवासियों को सेना के संरक्षण में अपना घर-बार छोड़कर शिविरों में रहना पड़ रहा है। जानकारों की मानें तो नक्सलवाद पर आज सत्‍ता पक्ष एवं विपक्ष की स्थिति एक सी है। राज्य की आंतरिक सुरक्षा एवं विकास के लिए खतरा माने जाने वाले नक्सली आतंक को लेकर कोई कार्ययोजना जनप्रतिनिधियों के पास नहीं है।

बहरहाल सरकारी दावे तो काफी हैं। जल, जंगल, जमीन, जुवान (छत्तीसगढ़ी) और जीविका के संबंध में सुधार किये जाने की बात सरकार करती है। कृषि को लाभकारी बनाने के साथ किसानों को फसल का सही मूल्य दिलाने की बात भी कही जा रही है। सरकार कहती है कि गरीबों की बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए 3 रुपये की दर से 35 किलो चावल और 25 पैसे प्रति किलो नमक दिया जा रहा है। गरीब परिवारों को बिना राशन कार्ड के मिट्टी तेल, 9 लाख से अधिक गरीब परिवारों को एकल बत्ती कनेक्शन एवं 49 लाख राशनकार्ड धारकों को रियायती दरों पर खाने का तेल दिए जाने का दावा भी सरकार करती है। वनवासियों को पट्टा, नये स्कूल, आश्रमशाला, बालिकाओं को साईकिलें, मध्यान्ह भोजन आदि से वनवासी बालक/बालिकाओं की साक्षरता में व्यापक सुधार के दावे भी इसी फेहरिस्त में शामिल हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? इस बात को जानने के लिए हमने बिलासपुर शहर के मुहाने पर बसे गांव उस्लापुर का दौरा किया। मुख्य सड़क से उस्लापुर को जाने वाली सड़क कई वर्षों से कच्ची पड़ी है। गांव वालों ने बताया कि यहां लौह अयस्क के अपशिष्ट को फेंका जाता है। इस कूड़े को लाने वाले ट्रकों का आना जाना यहां हमेशा बना रहता है। जिससे उड़ने वाली धूल मिट्टी ने टीबी एवं दमे जैसी बीमारियां स्थानीय लोगों को सौगात दी हैं। इसी तरह की स्थिति छत्तीसगढ़ के अन्य नगरों जैसे रायपुर, भिलाई इत्यादि की भी है। उस्लापुर में रहने वाले अधिकतर लोग सतनामी एवं गोंड जाति के भूमिहीन मजदूर हैं। 55 वर्षीय चैतराम टंडन भी उन्हीं में से एक हैं। वे बताते हैं कि `सरकार 3 रुपये किलो चावल तो दे रही है, लेकिन सिर्फ 35 किलो से पूरे परिवार का पेट नहीं भरता। ऐसे में बाकी चावल 16 रुपये की दर से खरीदना पड़ता है।´ हमने उनसे पूछा कि सरकार आखिर कितना वहन कर सकती है? जवाब देते हुए सुरेश कुमार कहते हैं कि हम फ्री में नहीं मांग रहे हैं, लेकिन सरकार कम से कम इस बात की व्यवस्था कर दे कि सही दाम पर समान मिल जाये। महंगाई की बात करते हुए वे कहते हैं कि टमाटर यहां 40 रुपये किलो है। कुछ अन्य लोगों ने बताया कि खाने के तेल कि घोषणा राज्‍य सरकार ने उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने की थी। लेकिन सिर्फ एक बार ही तेल मिल पाया है।

औद्योगीकरण से आम छत्तीसगढ़िया को कुछ मिला तो वह प्रदूषण और उससे फैलने वाली बीमारियां हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि राज्य के विकास में आम छत्तीसगढ़िया की भागीदारी नहीं मिल पा रही है। स्थानीय लोगों के शिक्षा एवं कौशल में पिछड़ेपन पर इस बात का ठीकरा मढ. दिया जाता है।उस्‍लापुर के ही शंख कुमार टंडन कहते हैं कि इस बार बरसात अच्छी नहीं होने से फसल कमजोर है। ऐसे में धान कटाई में मजदूरी मिलना आसान नहीं रहेगा। हालांकि पीने के पानी के लिए गांव में 20 नलकूप होने की बात ग्रामीणों ने स्वीकार की। लेकिन सेनीटेशन की समस्या को अधिकतर लोगों ने गिनाया। उन्होंने यह भी बताया कि बिजली तो आमतौर पर रहती है, लेकिन ट्रांसफार्मर कम क्षमता का होने से पूरा लोड नहीं मिल पाता। 25 पैसे किलो नमक मिलने की बात को भी लोगों ने स्वीकार किया। बालिकाओं को साईकिल मिल रही है क्या? इस सवाल का जवाब मिला कि `उस्लापुर में तो किसी लड़की को साईकिल नहीं मिली है। लेकिन पास के गांव में कुछ लड़कियों को जरूर साईकिलें मिली हैं। कुछ लोग इस बात को स्‍वीकारते हैं कि आदिवासियों के जीवन की जड़ता को समाप्‍त करने में ये कदम कारगर साबित होंगे। 3 रुपये किलो चावल 34 लाख परिवारों को दिये जाने के सरकारी दावे हालांकि पचते नहीं हैं, क्‍योंकि आंकड़ तैयार करने में अधिकारी न जाने कैसे गच्‍चा खा गए। इस बात को लेकर सरकार पर उंगलियां जरूर उठी हैं। राजनीतिक विश्‍लेषक रमेश नैयर अमर्त्‍य सेन की थ्‍योरी का हवाला देते हुए कहते हैं कि `अनाज की कमी कभी नहीं होती है, बल्कि लोगों में परचेजिंग पावर नहीं होती।´ वे कहते हैं कि 'बहुत सारे हिस्सों में सूखा पड़ा है। फिर किसानों को यह थोड़ी कहा जा रहा है कि तुम 3 रुपये किलो में ही चावल बेचो। ऐसे में कांग्रेस और सीपीआई का यह प्रचार की किसान कम दामों में चावल देने पर निकम्मे हो जाएंगे सही नहीं है। सरकार एक-एक दाना धान का खरीद रही है। हां फ्री में बांटने से एक नुकसान हुआ है। लेबर मिलना कठिन हो गया है और शराब की बिक्री बढ़ी है।'

भ्रष्टाचार के आरोपों से वर्तमान सरकार का दामन दागदार हुआ है।

विपक्ष ने तो सरकार के खिलाफ 101 आरोपों की पुस्तिका भी तैयार कर डाली है। बेलगाम नौकरशाही और भ्रष्ट मंत्रियों की नकेल न कसे जाने को लेकर भी मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। लेकिन सीधे मुख्यमंत्री पर किसी तरह का आरोप विपक्ष के पास मौजूद नहीं है। इस बीच कुछेक जनसंगठनों ने छत्तीसगढ़ की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर `जनता का घोषणा पत्र´ तैयार किया है। इसमें सभी राजनैतिक दलों से आगामी पांच सालों के लिए विकास का मास्टर प्लान प्रस्तुत करने, कृषि को उद्योग का दर्जा दिए जाने, कृषि के लिए 33 फीसदी बजट राशि का प्रावधान करने, फसल बीमा प्रीमीयम सरकार द्वारा दिए जाने, आलू उत्पादन क्षेत्र-जशपुर, सरगुजा में आलू उत्पादों से बने उत्पादों के लघु उद्योग हेतु अनुदान एवं प्रोत्साहन दिए जाने, दुर्ग एवं राजनांदगांव में टमाटर की खेती को विकसित कर संबंधित लघु उद्योगों को विकसित करने, बस्तर में इमली, आंवला एवं जड़ी बूटियों पर आधारित उद्योग स्थापित करने और चावल से बनने वाले उत्पादों के लिए भी लघु उद्योग स्थापित करने की योजनाएं तैयार करने की बात कही गई है। इसमें 2 से 5 एकड़ के सीमांत किसानों की सहकारी समिति का निर्माण कर सामूहिक खेती हेतु ट्रेक्टर एवं अन्य कृषि उपकरण पर 50 फीसदी अनुदान दिए जाने की मांग भी जनसंगठनों ने की है। सिंचाई इस प्रदेश की खेती के लिए एक बड़ी समस्या रही है। इसके लिए एक पूरी पंचवर्षीय योजना समर्पित किए जाने की मांग की जा रही है। साथ ही प्रदूषण से निपटने के लिए प्रभावी कार्ययोजना की भी जरूरत है। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से युक्त है। यहां लौह अयस्क के अलावा, चूना पत्थर, टिन, यूरेनियम के भंडार हैं। साथ वनोत्पाद भी भारी मात्रा में है। जिसका अभी तक लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल पाया है। उद्योग व्यापार के लिए एकल खिड़की प्रणाली बनाए जाने और नियमों के सरलीकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। खनिज आधारित उद्योगों को अनुसूचित क्षेत्रों में स्थातिप करने के लिए विशेष पैकेज की बात भी जनता के घोषणा पत्र में कही गई है। पिछड़ेपन को दूर करने के लिए रेल यातायात के विस्तार की बात लम्बे समय से यहां उठती रही है। ऐसा माना जा रहा है कि बस्तर से सरगुजा, डोंगरगढ़ और जांजगीर चांपा तक रेल लाईन का विस्तार प्रदेश चौमुखी विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

सस्‍ते दामों पर चावल दिये जाने की बात पर जनसत्‍ता (रायपुर) के स्‍थानीय संपादक अनिल विभाकर कहते हैं कि 'रातों-रात आदिवासी उपभोक्ता बन जाएं यह संभव नहीं है। योजनाएं तो यहां काफी है, लेकिन उनमें घपले भी हैं। यह सही है कि सरकार चावल योजना को चुनाव में भुना रही है। लेकिन कांग्रेस द्वारा 2 रुपये में चावल दिए जाने की बात विरोध जताने का कोई तरीका नहीं है। आगे वे कहते हैं कि कौशल आधारित प्रशिक्षण संस्थानों की तो घोषणा भर हुई है। लोगों के पिछड़ेपन का का एक बड़ा कारण शराब भी है। शराब माफिया हर जगह हैं। नक्सलवाद की बात यदि करें तो गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यहां नक्सली हिंसा में कमी आई है। यदि सरकार गंभीर नहीं होती तो यह संभव नहीं होता। शराबबंदी यदि हो जाए तो यह प्रदेश अपने आप पिछड़ेपन एवं गरीबी से उबर जाएगा। '  'लोकमानस' के संपादक बबन प्रसाद मिश्र कहते हैं कि 'ब‍स्‍तरिया को शिक्षित नहीं होने दिया गया। यही काम आज नक्सली वहां कर रहे हैं और पूंजीपतियों के दलाल बने बैठे हैं। छत्तीसगढ़ जिसे पिछड़ेपन के आधार पर बनाया गया थाऋ भ्रष्टाचार, कुंबापरस्ती और चंद कारणों से यहां धन कमाने की अराजक स्थिति पैदा हुई है। छत्तीसगढ़ जमीन खरीदे जाने के मामले में ब्राजील को भी पीछे छोड़ चुका है। यह पैसा कहां से और कैसे आया? इसका सीधा सा उत्‍तर है भ्रष्‍टाचार। ' राज्य बनने के बाद विषमता एवं गरीबी कम जरूर हुई है, ले‍किन छत्तीसगढ़ीया को मनोरंजन एवं अजायबघर की चीज़ समझकर उसे नचाते रहने वाले लोगों की सोच का बदलना सबसे पहले जरूरी है।

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दीपक on 14 November, 2008 13:45;38
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छ्त्तीसगढ जैसा छोटा प्रदेश देश मे शराब बेचने के मामले मे तीसरे नंबर पर है अब आप समझ सकते हे कि नशाखोरी यहा कितनी बडी समस्या है !मगर इसी के सहारे तो रातो-रात मतदाता बदले जाते है इसलिये किसी भी पार्टी ने इसके रोकथाम के लिये घोषणा नही की !!

शिक्षा मुफ़्त बांटिये और हर हाथ को काम दिजीये यह जरुरी है ना कि चावल की राजनिती !!
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tulsisinghbisht@gmail.com on 14 November, 2008 16:14;31
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मिश्रा जी आपका लेख अच्छा है और जो आपने लिखा है कि कुदरत ने वहां काफी अच्छी जमीन दी है। जो लोग खेती करना चाहते है लेकिन पैसों के अभाव में खेती नहीं कर पाते। जिसका उदाहरण सिंचाई से भी संबंधित है। आज हम लोग बार-बार सरकार की तरफ देखते है कि सरकार हमारे लिए कुछ करेगी। परन्तु अब हम सभी भारतीयों को समझ लेना चाहिए कि कोई भी सरकार हो - चाहे बीजीपी या कांग्रेस सभी एक थाली के चट्टेबट्टे है। ये लोग किसी भी जनता का भला करने वाले नहीं है। जैसाकि हम सभी जानते है अगर पार्टी का नेता बनना है तो पचास लाख से एक करोड़ रुपए चन्दा दीजिए और टिकट ले लीजिए। यानी इतने पैसे देने पर पार्टी का टिकट मिलता है तो फिर अगला आदमी जनता की क्या सेवा करेगा। हर इलेक्शन में शराब, मीट और पैसा बहाया जाता है साथ-ही-साथ वोटरों को रिझाने के लिए कई तरह के लोभ दिए जाते है और अन्त में परिणाम क्या निकालता है। नेता बनें फिर जनता भाड़ में जाए। इसलिए मिश्रा जी आपसे विनती है कि अगली बार जब भी आप किसी राज्य की रिपोर्ट करें तो वहां के नागरिकों को बताए सरकार की तरफ मत देखो आपस में विचार-विमर्श करो कि हमारे गांव को क्या लाभ हो रहा है और कौन-कौन हमारे गांवों में भूखा मर रहा है - जब सभी गांव के लोग ऐसा सोच लेंगे तब किसी भी भारतीयों को आज की वर्तमान सरकार के नेता केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे।
विस्फोट साईट पर इसी तरह के लेख आपके आगे भी पढ़ने को मिले तो काफी अच्छा होगा।
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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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