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'मेरा बयान अखबार में जरूर छापना कि पाकिस्तान हमला करेगा तो हम झेल लेंगे'

image गांव दिलावर भैंणी में रोजमर्रा की जिंदगी

पंजाब का गांव दिलावर भैणी तीन तरफ से पाकिस्तान से घिरा हुआ है. लेकिन यह गांव कल तक जैसे बेखौफ था आज भी बेखौफ है. युद्ध की आहट देहरी पर है. भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की राजधानियों में भले ही युद्ध की आशंका से भले ही पारा गरम हो लेकिन यहां इस गांव में सबकुछ सामान्य है. यह कोई कूटनीतिक रणनीति नहीं है. बल्कि यहां के गांववालों की यह दिलेरी और जिंदादिली है जो जंग की आशंकाओं के बीच भी उनको बैखौफ जीने को प्रेरित कर रहा है. सीमा से लौटकर अर्जुन शर्मा की रिपोर्ट-

किसी शिकार कथा को पढ़ कर शेर की भयानकता का अंदाला लगाने व शेर की मांद में रह कर हंसते खेलते जीवन व्यतीत करने वाले अनुभव में जमीन आसमान का अन्तर होता है। इस्लाम धर्म के कथित रहबरों द्वारा न्यूयार्क व वाशिंगटन से लेकर मुंबई तक में दिखाए गए दुस्साहस की चर्चा चाहे बंगाल के किसी अध्यापक, उत्तर प्रदेश के पनवाडी या बिहार के खेतिहार के लिए एक ही जैसा महत्व रखती हो पर भारत पाकिस्तान की सीमा पर बैठे व्यक्ति के लिए यह चर्चा उसके व उसके परिवार के भविष्य के साथ बावस्ता होती है। ये वो लोग हैं जो भारत-पाक संबंधों में सुधार की गुंजायश देख कर जश्र मानाते हैं। जबकि दोनों देशों में आती कटुता से इन्हें अपने भविष्य की जन्म कुंडली में घुसपैठ कर आए राहू जैसी स्थिति का अहसास होता है। जहां जंग की आशंका के चलते दुनिया भर के शेयर बाजार बुखार जैसे अनुभव से गुजर रहे हों वहीं अंतरराष्ट्री सीमा से मात्र पांच सौ गज की दूरी पर स्थित अपने खेत में हल चला रहे किसान को, ट्रैक्टर पर लगे टेप-रिकार्ड पे फुल वाल्युम पर जुगानी जा वड़ी कलकत्ते सुनते हुए उसका खिलंदड़ रूप देख कर आपको कैसा लगेगा? और यदि पत्रकार के तौर पर आप इन हालात व इस प्रकार के नजारे के गवाह रहे हों तो इस नजारे को देश के लोगों के समक्ष न रखना धोखेबाजी होगी।

सीमांत जिला फिरोजपुर के अन्तर्गत भारत-पाक सीमा पर बसे गांव जोधे के किसान रछपाल काफी उत्साहित हैं। उनकी रिहायश के बाहर गांव के कई लोग जमा हैं व रछपाल उनके आदर सत्कार में अपने बेटों को बार-बार आवाज देकर समझा रहे हैं कि केले व सेब सबको खिलाएं, जबकि वहां मौजूद लोगों में जिस विषय पर चर्चा हो रही है भारत-पाक की संभावित जंग का सीमांत ग्रामीणों पर क्या असर हो सकता है। उनकी पच्चीस एकड़ जमीन भारत-पाक सरहद पर भारत सरकार द्वारा लगाई कंटीली तार फैंस के उस तरफ, पाकिस्तान की सीमा से बिल्कुल सटी हुई है। वे कहते हैं, ``दुनिया जंग के चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है। आतंकवाद का दंश भारत के साथ साथ अमेरिका को भी पूरी शिद्दत से महसूस हो रहा है तो कुछ न कुछ जरूर होगा। हम सीमा पर बैठे हैं पर हमें कोई खतरा दिखाई नहीं देता क्योंकि हमें अपने देश की सेनाओं पर पूरा भरोसा है। मौजूदा हालात में भारत को अतंकवाद का कांटा पूरी तरह से निकाल देना चाहिए। रही हमारी बात तो हमें बस डीजल व खाद की सप्लाई में किल्लत नहीं होनी चाहिए।´

रछपाल सिंह के साथ बैठे जोगिंद्र सिंह टियर्ड पटवारी हमारी बातचीत में दिलचस्पी लेते हैं पर यकायक वो हम पर बरस पड़ते हैं, ``बाउ जी, तोहाड़ी सरकार किद्दां दी है, फौजी मोर्चे पर दुश्मन के दांत खट्ठे कर देता है पर तुसी कुर्सी ते बैठ के ओह सारे इलाके वापस कर देंदे ओ जेहड़े फौजां ने अपनी जान ते खेल के जित्ते हुंदे नें।´´ (आपकी सरकार कैसी है। फौज जो दुश्मन के दात खट्ठे करके, अपनी जान को जोखिम में डालकर जंग में जिन इलाकों पर जीत दर्ज करती है आपकी सरकार उन्हें बातचीत के दौरान आराम से वापिस कर देती है।) असल में पटवारी साहिब ने मुझे सरकारी अधिकारी समझ लिया था। रछपाल उन्हें समझाते हैं कि ये तो पत्रकार हैं जो इन हालात में हम लोगों की सुध लेने आए हैं। तब यकायक जोगिंद्र सिंह खामोश हो जाते हैं। उन्हें इस बात पर खुशी है कि पत्रकारों ने इतनी दूरदराज बैठे उन लोगों की कोई खबरा-सार ली है। जोगिंद्र सिंह जब तेरह साल के थे तब बटवारे के कारण वे लाहौर से भारत आए थे। उन्होंने 1965 व 1971 की भारत पाक जंग को देखा व सहसूस किया है। वे अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं,``देश के सैनिकों की बहादुरी व देशभक्ति पर हमें कोई शक नहीं परन्तु नेता नपुंसक हैं। मेरा यह बयान अखबार में जरूर छापना कि यदि पाकिस्तान हमला करता है तो हम झेल लेंगे पर जो इलाका हमारी फौज जीत ले उसे वापिस नहीं किया जाना चाहिए।´´ इन्हीं के साथ बैठे फत्तूवाला गांव के राजेन्द्र सिंह नंबदार का अनुभव यह था कि 1971 की जंग में उनके गांव में पाकिस्तानियों ने हवाई हमले करके कुछ बम गिराए थे पर वो खेतों में ही गिरे थे जिसके चलते जान-माल की हानी नहीं हुई थी। वे कहते हैं कि उस जंग में भारतीय सेनाओं को गांव के लोगों ने दूध-चाय व दाल-फुल्के की कमी नहीं आने दी। गांव के उत्साही नौजवान तो फौज को चाय पिलाने के लिए मोर्चों तक चले जाते थे व फौजियों से कहते थे कि आप खा-पी लें, तब तक गोली हम चलाते हैं।

हालांकि बार्डर पर बसे सभी ग्रामीणों से बातचीत हो पाना संभव नहीं था पर उनके खेतों की स्थिति देख कर उनकी मनोभावनाओं का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं था। इससे यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि सीमा पर बसे लोगों को पाकिस्तानी हमले का या तो खतरा नहीं या फिर सहम जैसी कोई बात नहीं। गांव के बाहर व अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब चार सौ गज की दूरी पर बने बड़े से अहाते में रखीं आधुनिक कुर्सियों पर बैठ कर अखबार पढ़ते हुए सरकार बगीचा सिंह से बातचीत का दौर भी काफी उत्साह वर्धक रहा। वे इस अत्यंत पिछते इलाके के निवासी होने के बावजूद काफी अप-डेट दिखे। बातचीत का सिलसिला शुरू होते ही बड़ी जीवट मुस्कान के साथ उन्होंने विश्वास जताया कि पाकिस्तान भारत पर हमला नहीं करेगा। थोड़ा कुरेदने पर उनकी मुद्रा थोड़ी दार्शनिक हो गई। उन्होंने कहा,``जंग का नाम ही महापाप जैसा है, पर दुनिया के हालात देखते हुए ऐसा लगता है कि नाम लेने या न लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां यह दुआ है कि जंग न लगे। पर इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमें कोई खौफ है। मेरी तो यह मान्यता है कि पाकिस्तान हम पर हमले जैसी मूर्खता नहीं करेगा क्योंकि उसके पास है ही क्या? वर्ष 95 में जब मैं पाकिस्तान गया था तब बड़ा विचित्र अनुभव हुआ। जब मैने वहां के लोगों से बातचीत के दौरान बताया कि हमारे यहां एक खेत से इतना गेहूं व इतना चावल पैदा होता है तो उन लोगों का हैरानी से मुंह फटा रह गया था व उनकी टिप्पणी थी कि सरदारजी झूठ बोल रहे हैं। जब मैंने अपने पंजाब की भूमि पर खेती करने में सहायक यंत्रों (टयूबवैल,टैक्टर इत्यादि) की अनुमानित गिनती बताई तो वे हैरान रह गए कि खेती के क्षेत्र में भारतीय पंजाब ने इतनी तरक्की कैसे कर ली,।´´ बगीचा सिंह ताजा प्रकरण के चलते दुनिया भर में मंडरा रहे तनाव के बादलों पर भी काफी ठोस राय रखते हैं। उनका मानना है कि जुल्म करने वाले को सजा न देना भी जुल्म करने वाले की मदद करने जैसा है। मुठ्ठी भर लोगों को धर्म के नाम पर दुनिया को मुसीबत में डालने का कोई हक नहीं है।

Jang_ke_dour_main_border_per_khari_dr_Ravi_apni_vanaspation_main_vyast_hai_929888321.jpg

उस गांव से हमारा अगला पड़ाव भारत सीमा से महज सवा किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव डि्डा के बाहर स्थित खेत रहे। मात्र 22-23 वर्षीय वो चुलबुली सी डा. रवि हमें पूरे उत्साह के साथ अपने तीन में से एक एकड़ भूमि के खेत में उगी जड़ी बूटियों की किस्में बताने में मशगूल है। वो धारा-प्रवाह बोलती हुई हमें समझा रही है कि इन वनस्पतियों में कौन-कौन सी बीमारियों को भगाने की क्षमता है। डा. रवि अपने पिता डा. गुरबचन के साथ जलालाबाद में रहती है जो भारत पाक सीमा से करीब पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर है परन्तु उसका मन सीमा पर बसे अपने वनस्पतियों से ओत-प्रोत उस खेत में ही रमता है। मैने उससे पूछा कि हम इस वक्त सरहद के इतने नजदीक खड़े है पाकिस्तान की तरफ से चली बंदूक की गोली हमारे पास आकर गिर सकती है। वनस्पति पर चर्चा बंद करके क्यों ने बार्डर की टैंशन पर चर्चा करें? इस पर उसका जवाब सुन कर मैं हैरान रह गया। उसका कहना था। हम बार्डर के रहने वाले लोग जंग से नहीं डरते। चाहे कोई समझे या न समझे पर हम भी इस देश के बिना वेतन वाले फौजी हैं। विश्वास करें, पिछले हफ्ते से टैंशन बढ़ी है, तब से मैंने यहां के दुगने चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। एक अकेली लड़की को बेखौफ अपनी स्कूटी पर बार्डर की तरफ आता जाता देख कर यहां के निवासियों का मनोबल बढ़ता है। हमें अपनी सेनाओं की वीरता पर पूरा भरोसा है, पाकिस्तान आमने सामने की जंग में हमारे सामने एक दिन भी टिक नहीं पाएगा। कायर केवल पीठ पर वार करके भागता ही जानते होते हैं।

इसी प्रकार फाजिल्का सैक्टर में एक गांव है दिलावर भैणी। उस गांव की स्थिति ऐसी है जैसे किसी ने एक चौरस डिब्बा उठा कर बार्डर की सीधी लाईन के उस पार रख कर केवल आगे वाला हिस्सा भारत की तरफ रखा हो। इस गांव के तीनों तरफ पाकिस्तान है, फैंसिंग से घिरे हुए इस गांव का जो प्रवेश द्ववार है वहां सतलुज नदी बहती है जिस पर टैंपरेरी पुल सा बना हुआ है। प्रवेश द्ववार पर बीएसएफ की पोस्ट है। इस समय उस गांव में बाहरी व्यक्ति के जाने पर पाबंदी है। आखिरकार तीन तरफ से पाकिस्तान से घिरे उस गांव के लोग बार्डर पर फौजों का जमावड़ा देख कर कैसा महसूस करते हैं। हमने इस बार दिलावर भैणी के बाहर टैप लगाया ताकि आने जाने वाले लोगों के विचार व उसके हावभाव से उनकी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा सकें। ज्यादातर लोग तो अपनी रोजाना की समस्याओं जैसी बातों में मश्गूल दिखे। दिलावर भैणी के निवासी चंदा सिंह ने बताया कि गांव में लोग पूरी तरह से चढ़दी कला में है। पाकिस्तानी फौज के बंकर तो हमारे गांव से ही दिखते हैं जहां गतिविधियां काफी तेज हैं पर हमारी तरफ से बीएसएफ की तैनाती के चलते हमें कोई खतरा नहीं लगता।

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ravinder pathania on 27 December, 2008 15:08;30
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this is the duty of every indian to work like Mr Arjun Sharma for the intrest of nation.we all indian aer always together we all are unite we all love our country like our mother.
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Yusuf Kirmani on 27 December, 2008 17:22;33
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अर्जुन शर्मा की यह रिपोर्ट हमें सच्चाई से रूबरू कराती है। बहरहाल, युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। कुछ बातें मैंने भी रखी हैं, उसे आप लोग मेरे ब्लॉग http://hindivani.blogspot.com पर जाकर पढ़ सकते हैं। सभी का स्वागत है। अर्जुन को इस शानदार रिपोर्ट पर बधाई।
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pawan sharma on 27 December, 2008 20:29;34
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desh ko in border ke wasion ki sathiti bata kar visfot ne bahut nek kaam kiya hai. Border valon ke hausle ko mera salam
Pawan Sharma, State Correspondent Divya Himachal, Punjab
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Amarjit s.Rai on 27 December, 2008 20:42;51
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Bharat-Pak seema se kewal saat K.M door Jalalabad Tehsil ke rehne wale logon ka visfot ko pranam aur dhanyawad dete hue bolte hain ki hamare zazbaat va samasyaen pesh ki gai hain vo media ki asli duty jaisa kaam lagta hai. Hamari desh bhakti aur Milwartan ke liye national media visfot.com ko dhanyawad. hamari reqest hai ki hum logon ki samasyaon per fir se kuch likha jaye.agar zameeni khabron ki kisi patarkaar ko zaroorat ho to border ka jeevan apne aap main bahut bari khabren hain
Advocate Amarjit Singh Rai
President
Human Rights & Media organisations Regd
Jalalabad Distt Firozpur
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Arjun Sharma on 27 December, 2008 21:30;48
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Bhai Amarjit ji. chinta mat karen. visfot ne aapke poore ilake ka jayja liya hai. yeh to aagaz hai. border ki sathiti per bahut matter aayega. yusuf ji ko bhi salam. ap jaise seniour journalist ke comment dekh kar acha laga. patarkarita ka asli maqsad jameen se juri baat karna hai na ki journalism ke naam per khabaron ki bazigiri karna. muddat baad sanjay tiwari jaisa editor mila hai, kalam ki sabhi tammanayen puri hongi
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sanjay on 28 December, 2008 18:16;52
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achhi report hain. rochak lagi.
journalism m aisa hone v chahiye. hakikat janne ke liye dur madain me ja kar hi pathko ko achhi kabar de sakte hain.
tanks
keep it up
sanjay
sanjayinmedia@rediffmail.com
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Amrik on 28 December, 2008 21:40;03
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aisi zamini reporting jab dekhnae ko milti hai to hame garv hota hai ki hamare beech aise patarkar bhi hain. is report ke followup ka intzaar rahega
AMRIK
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Rajesh kumar on 28 December, 2008 22:22;33
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mera koyi mail address nahi hai.mujhe yeh report ek tarfa lagi.border wale dil ke to bare hain per isme unki mazboorio ka zikr kam hai
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y on 29 December, 2008 22:43;39
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arjun ji
badhai
sarfarosi ki tamanna aab hamare dil me hai
dekh lenge jor kitna bajuekatil me haia
hai dukhi awam bhi utna hi pakistan ka
jitne hum daud se ya duniya hai laden se
hai yahi afsos ki neta hai apne dogle
warna mitna hi pak k mustakbil me hai
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amit on 01 January, 2009 17:26;48
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i liked this story. as i also did sutch stories during last deployment in indi pak border. and i also did worked for landmin victems in ferozepur distt and other three distt of punjab. villegers of border villeges r so brave that our delhi living people never even think.. because i saw both people from very near....
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