Home | भारत की कहानी | अनपढ़ हथौड़े से गढे हुए भगवान

अनपढ़ हथौड़े से गढे हुए भगवान

image

भरतपुर जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर बसा रूपनगर नामक एक छोटा सा गांव है। सीकरी कस्बे से सटा होने के कारण इसे रूपनगर सीकरी भी कहा जाता है। गांव के मुहाने पर प्रवेश करते ही छेनी-हथौड़ी भी ठक-ठक कानों में गूंजने लगती है। लगभग 177 दस्तकारों की 70 मूर्ति-निर्माण इकाईयां दिन-रात देवी-देवताओं के मनोहारी आकार को गढ़ने में जुटी रहती है। यहां मूर्ति निर्माण में जुटे करीब 350 कारीगर प्रतिवर्ष डेढ़ से दो करोड़ रूपये का कारोबार करते हैं।

सृष्टिकर्ताओं की सृष्टि का केन्द्र बन चुके रूपनगर गांव की सफलता की कहानी बेहद रोचक एवं प्रेरणादायी है। करीब 125 परिवारों के इस गांव में गौड़ जाति के लोग रहते हैं। इनका पैतृक व्यावसाय खेतीबाड़ी रहा है, लेकिन जोत छोटी होने के कारण स्थानीय लोगों को लम्बे समय तक समस्या का सामाना करना पड़ा और मुश्किल ही खाने भर का अनाज मिल पाता था। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले बालक जगदीश चंद्र शर्मा का परिवार भी उन्हीं में से एक था। 1980 में विद्यालय की तरफ से जयपुर भ्रमण पर गए जगदीश ने जब `खजाने वालों के रास्ते´ में मूर्ति निर्माण का काम देखा तो घर वापस नहीं लौटा और मूर्तिकला का काम सीखकर अपने परिवार के साथ-साथ पूरे गांव की गरीबी को दूर करने की ठान ली। उस समय 3 साल तक सीखने वाले को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था। फिर भी कुछ कर गुजरने की ललक में जगदीश ने पढ़ाई का मोह छोड़कर सिर्फ दो वक्त की रोटी और आश्रय की एवज में साल भर मन लगाकर काम सीखा।

कुछ समय पूर्व भारतीय गांवों के अथाह महासागर में रूपनगर की कोई पहचान नही थी। लेकिन आज रूपनगर में गढ़ी जाने वाली देवी-देवेताओं की आकर्षक मूर्तियां राजस्थान ही नही अपितु दिल्ली, असम, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र एवं हरियाणा समेत अन्य राज्यों में भी इस गांव की पहचान का पर्याय बन गई हैं। एक वर्ष बाद मालिक ने जब जगदीश की तारीफ की तो अपने मन में दबी पीड़ा को जगदीश ने व्यक्त करते हुए कहा कि ßमैं परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण लम्बे समय तक मुफ्त में काम नहीं कर पाऊंगा। जगदीश को तभी से 10 रूपये मिलने लगे और दो साल वहीं रहकर काम पूरी तरह सीखने के पश्चात् रूपनगर लौटने का निश्चय किया। अपने गांव लौटकर वहीं पर जगदीश ने मूर्ति निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। प्रारंभ में तो जयपुर से पत्थर लाकर वे कार्य करते रहे। कुछ समय पश्चात् जब उन्हें पूंजी की कमी खलने लगी तो जगदीश ने बैकों से संपर्क साधा। लेकिन उस समय को याद करके जगदीश आज भी अपना माथा पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं कि 1988 में कोई भी बैंक 10 हजार रूपये ऋण देने के लिए तैयार नही था। 1990 में भरतपुर में कार्य करने वाली गैर सरकारी संस्था `लुपिन आर्गेनाइजेशन´ के संपर्क में आने पर जगदीश की मानों दुनिया ही बदल गई। उस दौरान 40 हजार रूपये में पत्थर का एक ट्रक मिलता था। जगदीश की योजना थी कि यदि 10-10 हजार का ऋण 4 लोगों को मिल जाये तो काम बन जाएगा। लुपिन ने इसमें जगदीश और उसके साथियों का सहयोग करते हुए तत्कालीन कलैक्टर यादवेन्द्र माथुर से परिचय कराया। कलैक्टर साहब ने उन लोगों की समस्या को गौर से सुना और 15-15 हजार रूपये सिडबी की ओर से बतौर ऋण दिला दिए। फिर क्या था, जगदीश के सपनों को पंख लग गए और 12 किस्तों मे ऋण भी अदा कर दिया गया। 1996 में `लुपिन´ ने सिडबी और जिला उद्योग केन्द्र जैसी ग्रामीण विकास को संबल प्रदान करने वाली संस्थाओं के विभिन्न कार्यक्रमों से जोड़कर रूपनगर गांव के युवा मूर्तिकारों को प्रोत्साहित किया। साथ ही ऋण दिलाकर युवकों की मदद भी की।

संस्था के प्रयासों से `भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक´ ने `स्टोन कलस्टर´ के लिए रूपनगर का चयन किया गया। इसके तहत रूपनगर के 25 युवाओं को मूर्ति निर्माण का एक वर्ष तक गहन प्रशिक्षण `भारतीय शिल्प संस्थान´ के सहयोग से दिलाया गया। मूर्तिकारों को `रूडा´ से भी प्रशिक्षण दिलाया गया। उद्योग विभाग ने मूर्तिकारों के लिए जो कलस्टर विकास कार्यक्रम शुरू किया उसके तहत उन्हें किशनगढ़ (अजमेर) और सिकंदरा (दौसा) के मूर्ति निर्माण क्षेत्रों का भ्रमण कराया गया और मूर्तियों के साथ-साथ मार्बल के अन्य सजावटी उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। 2003 में डी.आई.सी. ने आर्टिसन्स कार्ड बनवा दिये। इसके आधार पर मूर्तिकारों को आर्टिसन्स कार्ड भी मिल गया। जिससे 25 हजार रूपये का ऋण 50 मूर्तिकारों को मिल गया। जिन्होंने उस ऋण को अदा कर दिया उन्हे पुन: 50 हजार रूपये का ऋण स्वीकृत हो गया। जगदीश बताते हैं कि उन्हें टर्नओवर बेहतर होने के कारण एक लाख रूपये का ऋण मिल गया।कारीगर जगदीश

पहले जगदीश घर पर ही काम करते थे, लेकिन आमदनी बढ़ी तो उन्होंने गांव के किनारे मुख्य सड़क पर अपनी दुकान ले ली। उत्साहित जगदीश बताते हैं कि `आज इस दुकान की कीमत 5 लाख रुपये है। यही नहीं हाल ही में उन्होंने 4 दुकानें नगर रोड पर भी शुरु की हैं और कारीगरों के रहने के लिए 2 कमरे भी बनवाए हैं। बकौल जगदीश आज रूपनगर में 20 मूर्तिकारों  की निजी दुकानें हैं। जबकि 30 लोग किराये की दुकानों में काम कर रहे हैं। हर दुकान पर 6 से 7 कारीगर हैं। दुकान में तैयार मूर्तियों की तरफ इशारा करते हुए जगदीश बताते हैं कि इनकी कीमत दो लाख से भी अधिक है। सही मायनों में रूपनगर को बदलने में जगदीशचंद्र शर्मा की प्रतिबद्धता का बड़ा हाथ रहा है, जिसे स्थानीय लोगों ने सहर्ष अपनाते हुए आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है।

जगदीश आज युवा मूर्तिकारों के अगुआ बन चुके हैं। राह चलते कोई भी उन्हें तकनीकी जानकारी लेने के लिए बुला लेता है। जगदीश भी दूसरों को अपना हुनर सिखाकर हर्ष का अनुभव करते हैं। लेकिन वे कहते हैं कि अब कोई भी युवा कारीगर 3 साल तक इंतजार नहीं करना चाहता। बहरहाल 6 महीने तक नए कारीगरों को निशुल्क काम सीखना पड़ता है। उसके बाद वे अपना कारोबार शुरू कर लेते हैं। जगदीश कहते है कि मध्यम दर्जे के कारीगर को मूर्ति की आधी कीमत दी जाती है। वे बताते है कि एक सामान्य कारीगर भी प्रतिदिन 150 रूपये तक कमा लेता है। जबकि अच्छा कारीगर औसतन 250 रुपये प्रतिदिन कमा सकता है। इतने पर भी जगदीश का उत्साह कम नही हुआ है। वे रूपनगर को जयपुर के मूर्ति बाजार की श्रेणी में खड़ा करने की इच्छा रखते हैं। उनकी मंशा है कि स्थानीय स्तर पर ही कोई बड़ा शोरूम खुल जाये तो मूर्ति खरीददारों को जयपुर नहीं जाना पड़ेगा। फिलहाल रूपनगर में बनने वाली मूर्तियों को जयपुर भेजा जाता है और वहीं पर उनकी पेंटिग करके शोरूमों में सजा दिया जाता है। जबकि जयपुर की अपेक्षा रूपनगर में मूर्तियां 30 प्रतिशत  से 40 प्रतिशत सस्ती मिल जाती हैं। निजी संपर्क के ग्राहक यहां पहुंच पाते हैं। इस बात को लेकर जगदीश ने `राजस्थान कोऑपरेटिव बैंक´ के चेयरमैन को आर्थिक मदद के लिए पत्र भी लिखा था। लेकिन उसका कोई जवाब नही आया, फिर भी जगदीश ने हार नहीं मानी हैं, जो उनकी दृढ़ता का परिचायक है। यही कारण है कि 10 रुपये की नौकरी से शुरु हुआ सफर आज करीब 25 वर्षों के बाद रूपनगर गांव में करोड़ो रुपये के कारोबार की शक्ल ले चुका है।

Subscribe to comments feed Comments (2 posted):

sanjay swadesh on 06 January, 2009 20:57;10
avatar
umashankar19mishra@gmail.com
achhi story hain. ek chij chut gayee. stone ko ghiste wakt aur katate wakat jo dhul kan sanso ke sath phephade me jata hain. wah behad katranak hota hain. esase wo log jald hi bhayankar bimari se grast hote hain.
achhi story ke liye badhaee.
sanjay swadesh
sanjayinmedia@rediffmail.com
Thumbs Up Thumbs Down
0
ummed Singh Baid Saadhak` on 07 January, 2009 12:08;03
avatar
मूल लेख के संग संजय-स्वदेश-ट्टिपणी भायी.
भारत के पुनर्निर्माण की, विधियाँ खूब सिखायी.
विधियाँ खूब सिखाई, उमाशंकर जी आपने.
लेखन-विधा को सार्थकता दिखालाई आपने.
कह साधक कवि और लिखें संवाद देश के.
नमन मेरा जगदीश को, जो हैं मूल लेख के.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
Rate this article
5.00
More from भारत की कहानी
Previous
image
अपने होने पर ही हैरान
‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं। ...
image
जमीन ले लो या गोली मार दो
भारत-पाक सरहद पर बसे किसान इन दिनों खासी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि किसान मरने तक को तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या पर न तो नौकरशाह गौर कर रहे हैं और न ही सफेदपोश। दरअसल, लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे किसानों के सामने हाल ही में आए एक सरकारी फरमान ने कई दुविधाएं खड़ी कर दी है। इस फरमान के मुताबिक सीमा क्षेत्र में तारबंदी के पार दो फिट से ज्यादा ऊंची फसल पर पाबंदी लगा दी गई है, जबकि किसान सीमा क्षेत्र में जो भी फसल बोते हैं, उनकी ऊंचाई दो फिट से अधिक ही है।...
image
डकैती छोड़ दी, पर पुलिस पीछा नहीं छोड़ती
पुलिस कहती है कि चंबल से डाकुओं का खात्मा हो गया है. इसमें बहुत हद तक सच्चाई भी है लेकिन डाकुओं के खात्मे के बाद भी पुलिस का काम खत्म नहीं हुआ है. जो डाकू डकैती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले गये या कुछ तो बाकायदा साधु सन्यासी हो गये. पुलिस अभी भी उनके पीछे पड़ी हुई है और खोज खोज कर गिरफ्तार कर रही है. दिनेश शाक्य की रिपोर्ट-...
image
विस्थापन के 33 साल बाद,पूरी तरह बर्बाद
भारत की औद्योगिक प्रगति और शहरी विकास के लिए सबसे आधारभूत जरूरत है जमीन. जहां भी विकास का पहिया पहुंचता है, पहले वहां की जमीन और जमीन के वाशिंदों को रौंदता है. फिर अपनी मर्जी के मुताबिक एक नया साम्राज्य विकसित करता है जो विकास का विस्तार बताकर हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन इस साम्राज्य के विकासक्रम में पीछे छूट गये लोगों की एक दुनिया शेष रह जाती है. सरकार और कंपनियां जिन्हें मुआवजा देकर "अमीर" बनाकर छोड़ देती हैं वे पीछे छूट गये लोग कितने दयनीय होकर रह जाते हैं इसका सटीक उदाहरण है गाजियाबाद का कड़कड़ मॉडल गांव. इस गांव के जरिए विकास और विस्थापन का जायजा ले रहे हैं अनिल पाण्डेय. ...
image
बज गया बस्तर का बैंड
हाल के वर्षों में देश दुनिया बस्तर को सिर्फ इसलिए जानती है कि वहां कब कहां कैसे कितने नक्सली मारे गये या फिर नक्सलियों ने कितने पुलिसवालों को मार गिराया है. लेकिन आदिवासियों की समृद्ध दैवीय परंपरा से एक ऐसा नाद उठ खड़ा हुआ है जो संगीनों की कर्कश आवाज को दबाने के लिए बस्तर से निकल पड़ा है. यह बस्तर बैण्ड है. आदिवासियों की अपनी पहल पर निर्मित हुए बस्तर बैंड देश दुनिया को बस्तर के इस परंपरागत स्वरूप से परिचय करा रहा है जो बस्तर के संगीत में विराजमान दैवीय नाद से श्रोताओं के अनहद को छू रहा है. ...
image
गर्त में गये गांव
2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है, जबकि निवास स्थान छोड़ने को आधार मानें तो 30 करोड़ लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है....
image
बाल अधिकारों के बीस साल बाद
अब से बीस साल पहले 1989 को सयुंक्त राष्ट्र द्वारा पारित बाल-अधिकारों के कन्वेंशन के जरिए बच्चों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ्य और सुरक्षित दुनिया का लक्ष्य रखा गया था. मगर समय के दप दशक गुजर जाने के बाद आज बच्चों की यह दुनिया कहीं बदतर, असुरक्षित और बीमार दिखाई देती है....
image
दलित उद्यमियों का बढ़ता दबदबा
पहले दलित उद्यमी गंगाराम कांबले के राज्य महाराष्ट्र में इन दिनों दलित उद्यमशीलता की नई इबारत लिखी जा रही है। कांबले ज्ञात दलित इतिहास में भारत के पहले दलित उद्यमी के तौर पर नजर आते हैं। वे शाहूजी महाराज के समकालीन थे। आज दलित समाज से निकलकर व्यवसाय में पांव जमाने वाले उद्यमियों की संख्या पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। लेकिन यह गति महाराष्ट्र में थोड़ी तेज है. अब महाराष्ट्र में दलित व्यवसायियों को एक मंच पर लाकर खड़ा करने के लिए दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) जैसा मंच भी तैयार हो चुका है।...
image
पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन
कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।...
image
भूख के पेट में भारत के बच्चे
यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।...
image
भारत के भूख का अर्थ
पीयूसीएल द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है वह भारत की असली कहानी कहता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकार गोदामों और खुले स्थानों पर अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देती है. यह सरकारी बदइंतजामी है और कुछ नहीं. इससे तो अच्छा है कि अनाज गरीबों को मुफ्त में दिया जाए. भारत में सबसे तेजी से बढ़ते आईटी, मोबाइल टेलेफोनी, आटोमोबाइल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आईपीएल सेक्टर को बढ़त का सबसे तेज रफ्तारवाला माना जाता है लेकिन भूख की रफ़्तार के आगे ये सारे सेक्टर बहुत पीछे हैं। ...
image
बाढ़ से लथपथ हुआ लद्दाख
इस बात पर मौसम वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे कि यह कैसी घटना थी जिसमें बादल फटने से किसी गांव या जिले पर विपत्ति नहीं बल्कि लद्दाख जो कि क्षेत्रफल में देश के कुछ छोटे राज्यों के बराबर है, पूरा का पूरा इसकी चपेट में आ गया जिसके कारण लद्दाख से करगिल तक का मार्ग ध्वस्त हो गया. छह पुल उड़ गये और लेह मनाली के मार्ग में दो पुल टूट गये जिसने लेह को सारे देश से काट दिया. वैज्ञानिक कोई भी दलील दें यह बात फिर भी अनुत्तरित ही रहेगी कि आखिर लेह कस्बे को कब्रिस्तान में बदलने के लिए बादल फटने की एक घटना काफी क्यों थी?...
image
सुभागलाल का सपना सच हो गया
वैसे तो देश के असंख्य सुभागलालों का सपना सच नहीं होता है। मगर घोरवाल के सुभागलाल का सपना सच हो गया। उसके गांव के सारे बच्चे अब स्कूल जाते हैं। जब वह छोटा था तब ऐसा कतई नहीं था।...
image
महिलाएं बन गयी विकास की पहरुआ
कहते हैं कि राजनीति की चाबी से हर ताले खुलते हैं, परन्तु बिहार के समाज में महिलाओं को यह चाबी वर्षों से नहीं मिली थी। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के जाते-जाते करिश्मा हुआ। वर्ष 2001 में लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई, ग्राम पंचायत में आरक्षण के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करा दी गई।...
image
गोल की कहानी गोलमोल
मणिशंकर अय्यर ने कामनवेल्थ खेलों पर तल्ख टिप्पणी करके खेल गिरोहों को आंदोलित कर दिया है. गिरोहबाज कह रहे हैं कि अय्यर ने जो टिप्पणी की है वह देशद्रोह से कम नहीं है. लेकिन अय्यर ने ऐसा क्या गलत कहा है? अय्यर कहते हैं कि कामनवेल्थ खेलों के नाम पर दिल्ली में जितना पैसा बरबाद किया जा रहा है उतने पैसे से देश के करोड़ों बच्चों के लिए खेलने का माहौल बनाया जा सकता है. स्वीडन से फुटबाल खेलकर लौटे ईशान्त के उदाहरण को देखें तो मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी उतनी तल्ख नजर नहीं आती....
image
सारण के अंधेरे में उजाले की दस्तक
‘कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता है, जरा तबियत से पत्थर तो उछालो यारों’। इस कथन को सच कर दिखाया है बिहार के सारण जिला में चल रहे सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड (कंपनी) के चार प्रमोटरों ने। योगेन्द्र प्रसाद, जर्नादन प्रसाद, रमेश कुमार और विवेक गुप्ता ने सन् 2006 में मिलकर सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड का गठन किया था, जिनकी एक ही मंशा थी अंधेरे में डूबे हुए सारण जिले के गांवों तक बिजली पहुँचाना।...
image
कुख्यात चंबल घाटी होगी विख्यात
दस्यु संरक्षण के लिए कुख्यात रहीं चंबल की वादी की तस्वीर बदलने के लिए की जा रही कवायद का एक हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रकृति की तमाम अद्भुत धरोहरों को अपने आगोश में समाने वाली इन्हीं वादियों के प्रति राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने आने वाले देशी व विदेशी सैलानियों के अंतःमन में रम चुकी कुख्यात चंबल घाटी को अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात करने का प्रयास मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन ने कर दी है। चंबल चेलेंज नाम से तैयार कराए गए इस प्रोजेक्ट में पर्यटक चंबल की घाटी में संरक्षित दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के दीदार तो कर ही सकेंगें अपितु मिट्टी के पहाड़ों पर रोमांचक खेलों का आनंद भी उठा सकेंगें।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2