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अनपढ़ हथौड़े से गढे हुए भगवान

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भरतपुर जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर बसा रूपनगर नामक एक छोटा सा गांव है। सीकरी कस्बे से सटा होने के कारण इसे रूपनगर सीकरी भी कहा जाता है। गांव के मुहाने पर प्रवेश करते ही छेनी-हथौड़ी भी ठक-ठक कानों में गूंजने लगती है। लगभग 177 दस्तकारों की 70 मूर्ति-निर्माण इकाईयां दिन-रात देवी-देवताओं के मनोहारी आकार को गढ़ने में जुटी रहती है। यहां मूर्ति निर्माण में जुटे करीब 350 कारीगर प्रतिवर्ष डेढ़ से दो करोड़ रूपये का कारोबार करते हैं।

सृष्टिकर्ताओं की सृष्टि का केन्द्र बन चुके रूपनगर गांव की सफलता की कहानी बेहद रोचक एवं प्रेरणादायी है। करीब 125 परिवारों के इस गांव में गौड़ जाति के लोग रहते हैं। इनका पैतृक व्यावसाय खेतीबाड़ी रहा है, लेकिन जोत छोटी होने के कारण स्थानीय लोगों को लम्बे समय तक समस्या का सामाना करना पड़ा और मुश्किल ही खाने भर का अनाज मिल पाता था। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले बालक जगदीश चंद्र शर्मा का परिवार भी उन्हीं में से एक था। 1980 में विद्यालय की तरफ से जयपुर भ्रमण पर गए जगदीश ने जब `खजाने वालों के रास्ते´ में मूर्ति निर्माण का काम देखा तो घर वापस नहीं लौटा और मूर्तिकला का काम सीखकर अपने परिवार के साथ-साथ पूरे गांव की गरीबी को दूर करने की ठान ली। उस समय 3 साल तक सीखने वाले को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था। फिर भी कुछ कर गुजरने की ललक में जगदीश ने पढ़ाई का मोह छोड़कर सिर्फ दो वक्त की रोटी और आश्रय की एवज में साल भर मन लगाकर काम सीखा।

कुछ समय पूर्व भारतीय गांवों के अथाह महासागर में रूपनगर की कोई पहचान नही थी। लेकिन आज रूपनगर में गढ़ी जाने वाली देवी-देवेताओं की आकर्षक मूर्तियां राजस्थान ही नही अपितु दिल्ली, असम, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र एवं हरियाणा समेत अन्य राज्यों में भी इस गांव की पहचान का पर्याय बन गई हैं। एक वर्ष बाद मालिक ने जब जगदीश की तारीफ की तो अपने मन में दबी पीड़ा को जगदीश ने व्यक्त करते हुए कहा कि ßमैं परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण लम्बे समय तक मुफ्त में काम नहीं कर पाऊंगा। जगदीश को तभी से 10 रूपये मिलने लगे और दो साल वहीं रहकर काम पूरी तरह सीखने के पश्चात् रूपनगर लौटने का निश्चय किया। अपने गांव लौटकर वहीं पर जगदीश ने मूर्ति निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। प्रारंभ में तो जयपुर से पत्थर लाकर वे कार्य करते रहे। कुछ समय पश्चात् जब उन्हें पूंजी की कमी खलने लगी तो जगदीश ने बैकों से संपर्क साधा। लेकिन उस समय को याद करके जगदीश आज भी अपना माथा पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं कि 1988 में कोई भी बैंक 10 हजार रूपये ऋण देने के लिए तैयार नही था। 1990 में भरतपुर में कार्य करने वाली गैर सरकारी संस्था `लुपिन आर्गेनाइजेशन´ के संपर्क में आने पर जगदीश की मानों दुनिया ही बदल गई। उस दौरान 40 हजार रूपये में पत्थर का एक ट्रक मिलता था। जगदीश की योजना थी कि यदि 10-10 हजार का ऋण 4 लोगों को मिल जाये तो काम बन जाएगा। लुपिन ने इसमें जगदीश और उसके साथियों का सहयोग करते हुए तत्कालीन कलैक्टर यादवेन्द्र माथुर से परिचय कराया। कलैक्टर साहब ने उन लोगों की समस्या को गौर से सुना और 15-15 हजार रूपये सिडबी की ओर से बतौर ऋण दिला दिए। फिर क्या था, जगदीश के सपनों को पंख लग गए और 12 किस्तों मे ऋण भी अदा कर दिया गया। 1996 में `लुपिन´ ने सिडबी और जिला उद्योग केन्द्र जैसी ग्रामीण विकास को संबल प्रदान करने वाली संस्थाओं के विभिन्न कार्यक्रमों से जोड़कर रूपनगर गांव के युवा मूर्तिकारों को प्रोत्साहित किया। साथ ही ऋण दिलाकर युवकों की मदद भी की।

संस्था के प्रयासों से `भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक´ ने `स्टोन कलस्टर´ के लिए रूपनगर का चयन किया गया। इसके तहत रूपनगर के 25 युवाओं को मूर्ति निर्माण का एक वर्ष तक गहन प्रशिक्षण `भारतीय शिल्प संस्थान´ के सहयोग से दिलाया गया। मूर्तिकारों को `रूडा´ से भी प्रशिक्षण दिलाया गया। उद्योग विभाग ने मूर्तिकारों के लिए जो कलस्टर विकास कार्यक्रम शुरू किया उसके तहत उन्हें किशनगढ़ (अजमेर) और सिकंदरा (दौसा) के मूर्ति निर्माण क्षेत्रों का भ्रमण कराया गया और मूर्तियों के साथ-साथ मार्बल के अन्य सजावटी उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। 2003 में डी.आई.सी. ने आर्टिसन्स कार्ड बनवा दिये। इसके आधार पर मूर्तिकारों को आर्टिसन्स कार्ड भी मिल गया। जिससे 25 हजार रूपये का ऋण 50 मूर्तिकारों को मिल गया। जिन्होंने उस ऋण को अदा कर दिया उन्हे पुन: 50 हजार रूपये का ऋण स्वीकृत हो गया। जगदीश बताते हैं कि उन्हें टर्नओवर बेहतर होने के कारण एक लाख रूपये का ऋण मिल गया।कारीगर जगदीश

पहले जगदीश घर पर ही काम करते थे, लेकिन आमदनी बढ़ी तो उन्होंने गांव के किनारे मुख्य सड़क पर अपनी दुकान ले ली। उत्साहित जगदीश बताते हैं कि `आज इस दुकान की कीमत 5 लाख रुपये है। यही नहीं हाल ही में उन्होंने 4 दुकानें नगर रोड पर भी शुरु की हैं और कारीगरों के रहने के लिए 2 कमरे भी बनवाए हैं। बकौल जगदीश आज रूपनगर में 20 मूर्तिकारों  की निजी दुकानें हैं। जबकि 30 लोग किराये की दुकानों में काम कर रहे हैं। हर दुकान पर 6 से 7 कारीगर हैं। दुकान में तैयार मूर्तियों की तरफ इशारा करते हुए जगदीश बताते हैं कि इनकी कीमत दो लाख से भी अधिक है। सही मायनों में रूपनगर को बदलने में जगदीशचंद्र शर्मा की प्रतिबद्धता का बड़ा हाथ रहा है, जिसे स्थानीय लोगों ने सहर्ष अपनाते हुए आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है।

जगदीश आज युवा मूर्तिकारों के अगुआ बन चुके हैं। राह चलते कोई भी उन्हें तकनीकी जानकारी लेने के लिए बुला लेता है। जगदीश भी दूसरों को अपना हुनर सिखाकर हर्ष का अनुभव करते हैं। लेकिन वे कहते हैं कि अब कोई भी युवा कारीगर 3 साल तक इंतजार नहीं करना चाहता। बहरहाल 6 महीने तक नए कारीगरों को निशुल्क काम सीखना पड़ता है। उसके बाद वे अपना कारोबार शुरू कर लेते हैं। जगदीश कहते है कि मध्यम दर्जे के कारीगर को मूर्ति की आधी कीमत दी जाती है। वे बताते है कि एक सामान्य कारीगर भी प्रतिदिन 150 रूपये तक कमा लेता है। जबकि अच्छा कारीगर औसतन 250 रुपये प्रतिदिन कमा सकता है। इतने पर भी जगदीश का उत्साह कम नही हुआ है। वे रूपनगर को जयपुर के मूर्ति बाजार की श्रेणी में खड़ा करने की इच्छा रखते हैं। उनकी मंशा है कि स्थानीय स्तर पर ही कोई बड़ा शोरूम खुल जाये तो मूर्ति खरीददारों को जयपुर नहीं जाना पड़ेगा। फिलहाल रूपनगर में बनने वाली मूर्तियों को जयपुर भेजा जाता है और वहीं पर उनकी पेंटिग करके शोरूमों में सजा दिया जाता है। जबकि जयपुर की अपेक्षा रूपनगर में मूर्तियां 30 प्रतिशत  से 40 प्रतिशत सस्ती मिल जाती हैं। निजी संपर्क के ग्राहक यहां पहुंच पाते हैं। इस बात को लेकर जगदीश ने `राजस्थान कोऑपरेटिव बैंक´ के चेयरमैन को आर्थिक मदद के लिए पत्र भी लिखा था। लेकिन उसका कोई जवाब नही आया, फिर भी जगदीश ने हार नहीं मानी हैं, जो उनकी दृढ़ता का परिचायक है। यही कारण है कि 10 रुपये की नौकरी से शुरु हुआ सफर आज करीब 25 वर्षों के बाद रूपनगर गांव में करोड़ो रुपये के कारोबार की शक्ल ले चुका है।

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sanjay swadesh on 06 January, 2009 20:57;10
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umashankar19mishra@gmail.com
achhi story hain. ek chij chut gayee. stone ko ghiste wakt aur katate wakat jo dhul kan sanso ke sath phephade me jata hain. wah behad katranak hota hain. esase wo log jald hi bhayankar bimari se grast hote hain.
achhi story ke liye badhaee.
sanjay swadesh
sanjayinmedia@rediffmail.com
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ummed Singh Baid Saadhak` on 07 January, 2009 12:08;03
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मूल लेख के संग संजय-स्वदेश-ट्टिपणी भायी.
भारत के पुनर्निर्माण की, विधियाँ खूब सिखायी.
विधियाँ खूब सिखाई, उमाशंकर जी आपने.
लेखन-विधा को सार्थकता दिखालाई आपने.
कह साधक कवि और लिखें संवाद देश के.
नमन मेरा जगदीश को, जो हैं मूल लेख के.
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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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