चुंबक से चिपकी जिंदगी
सरकारी विकास और शिक्षा के प्रसार के तमाम दावों के बावजूद देश में कई समाज ऐसे हैं जिन पर आज भी शिक्षा और विकास की छाया की दरकार है। लोग पुश्तैनी पेशे से जुडे हुए हैं। संतरानगरी नागुपर मे भी एक समुदाय ऐसा ही है। हाथ में लकडी का घमेला, लोहे की कांटेनुमा सलाख, झाडू, ब्रश, लोहे का तवा इसी के साथ चार या पांच फुट का एक लोहे का बार जिसमें लगा बडा सा गोल चुंबक।यह सोनझरी समाज है।
जिनकी दिनचर्या आज भी नहीं बदली। हर दिन गंदे कबाड और नाले से धातुओं की तलाश पुश्तैनी पेशा है। चुंबक से जो कुछ चिपक जाए, वही कमाई है। जिंदगी चुंबक के इर्द-गिर्द चिपक कर रह गई है। नागपुर के जूना सक्करदरा से सटे सोनझारी नगर में करीब 400 घर हैं। कुल जनसंख्या करीब 1500 के आसपास होगी। यहां के सर्राफा बाजार के दुकानों के सामने की नालियों से लेकर कचरा, झाड सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा आदि का बारीर से बारीक चकण जमा करने का कठिन काम आज भी जारी है। इस काम के लिए महिलाएं हर दिन सुबह चार बजे से ही सर्राफा बाजार में पहुंच जाती है।
जब तक कम से कम 150 से 200 रूपये तक की आमदनी का अंदाजा नहीं हो जाता, वे घर नहीं लौंटती। रमला मडावी टूटी-फूटी हिंदी में कहती हैं क्या करें साब घर-परिवार चलाने के लिए नदी से लेकर नालों तक कीचड में उतरना पडता है। जब घर में पति पत्नी दोनों कमाते हैं, तब कहीं जाकर परिवार की गाडी चलती है। कहती है मिटटी से सोना चांदी निकालना क्या असान काम समझते है। दिनभर शरीर को जलाना पडता है तब कहीं जाकर पेट भरने की जुगत होती है। सोना, चांदी, तांबा पीतल, लोहा की छंटानी करनी पडती है। जो कुछ भी मिला भटठी में गलते है। इसके बाद प्राप्त धातु सर्राफा बाजार में ही बेच देते है। कीचड में हाथ चला-चला कर छाले पड जाते हैं किसी एक जगह कुछ नहीं मिलता। शहर में हर तरफ घूमना पडता है। आजकल सर्राफा की दुकानें शहर भर में फैल गईं हैं।समाज के महिलाओं का कहना है कि दो चार साल में कभी कभार “मशानघाट की रेत या राख में जली लाश के हाथ की अंगूठी या छोटा बडा हार हाथ लग जाता है। पर इसके लिए उन्हें सुबह जल्दी उठकर जाना पडता है। समाज के सदस्यों का कहना है कि इस काम में केवल लाभ हो यह जरूरी नहीं। कभी-कभी तो कुछ भी हाथ नहीं लगता है। सर्राफा बाजार में सोना-चांदी तांबा, पीतल,बहुत कम मिलने से समाज के लोग अब कबाडी में चुंबक से धातु तलाशते है।
सुधीर का कहना है कि आजकल लोग शादी-विवाह में गहने नहीं बनवाते। रेडिमेड गहने लेना पसंद ज्यादा पसंद करते है। लिहाजा कबाड में सोना-चांदी के कण मिलने की संभावना कम होती है। समाज के करीब आधे लोग मुंबई, कोलकाता, उडीसा, झारखंड, रांची जैसे विभिन्न शहरों में इसी काम से घूमते रहते है। रमेश बेहरे ने बताया कि पेट और परिवार के लालन-पोशण के लिए घूमना ही पडता है, और वैसे भी सोझारी परिवार घुमक्कड है। शीतला माता को इश्ट देवता मानने वाले सोनझारी समाज हिंदू समाज के सभी त्योहार धूमधाम से मनाते है।
शिक्षा के मामले में समाज पूरी तरह से पिछडा हुआ है। समाज में केवल बसंता बेहरे नामक युवक ही दसवीं पास है।रमेश बेहरे ने बताया कि पढ-लिख कर क्या होने वाला है। आजकल अच्छे पढे-लिखे युवक बेरोजगार भटक रहे है। यदि पढाई के बाद भी नालियों में हाथ डालने पडे तो फिर क्या फायदा। हालांकि कुछ सालों से समाज के बच्चे स्कूल जाने लगे है। अनुसूचित जनजाति में आने वाले इस समाज के अध्यक्ष रमेशा देवाजी बेहर का कहना है कि किसी व्यक्ति के पास जाति प्रमाणपत्र नहीं है। प्रमाापत्र क्यों नहीं बना, यह बात वे स्वयं नहीं जानते। उपराजधानी का यह सोझरी नगर समाज की राजधानी मानी जाता है। यहां से कोई शिकयत थाने नहीं जाती है। सोनझारी समाज की स्वयं की एक पंचायत हैं जिसमें कुछ सदस्यहै। जो समाज के गणमान्य माने जाते है।। कभी किसी का किसी भी तरह का विवाद हुआ, झगडा हो या फिर शादी में आने वाली दिक्कतें हों, सभी विवादास्पद मामलों का निपटारा आपसी पंचायत ही करती हैं। पंचायत का निणर्य सभी को मान्य होता है। यहीं कारण है कि आज तक समाज का कोई झगडा या विवादास्पद मामला पुलिस स्टेशन तक नहीं पहुंचा। सहयोग - अजय पांडे
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