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डायमंड इन डेजर्ट

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नवलगढ़ की कहानी अकेले संजय की नहीं है, बल्कि गांव-देहात के हर उस परिवार की है जहां संसाधनों एवं रोजगार का अभाव परिवार नामक संस्था के भरण-पोषण के लिए एक चुनौती बन जाता है। लेकिन शेखावटी के लोगों के साथ अब ऐसा नहीं है। नवलगढ़ के कस्बाई माहौल में डायमंड कटिंग एंड पालिशिंग इंडस्ट्री से लोगों के लिए रोजगार के रास्ते खुलने लगे हैं।

नवलगढ़ के 13 वर्षीय संजय सालतसर की मां ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके बेटे के मासूम कंधों पर इतनी जल्दी जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ेगा। बात 1993 की है जब एक दुर्घटना में पिता असहाय हो गए और संजय की बड़ी बहन उसे नवलगढ़ के डायमंड ट्रेनिंग सेंटर में लेकर गई थी। मां ने यह सोचकर भेजा था कि बेटा काम सीख लेगा तो घर खर्च चल जाएगा। 5 बहनों की शादी और 2 छोटे भाईयों को अपने पैरों पर खड़ा करने की जिम्मेदारी संजय के कंधों पर आ पड़ी थी। नवलगढ़ में रहकर संजय ने काम सीखा और कमाने के लिए जयपुर की एक हीरा प्रोसेसिंग ईकाई में काम करने लगा। बाल मन कभी-कभी विचलित हो जाता था। एक दिन संजय जयपुर से वापस घर भाग आया। समझाने बुझाने और घर की परिस्थितियों को समझने के बाद वह फिर जयपुर लौट गया। हर महीने वह ढाई से तीन हजार रूपये अब कमाने लगा था। कुछ समय पश्चात सूरत जाने का मौका मिला और आमदनी बढ़कर साढ़े सात हजार रुपये हो गई। मां को पता चला तो वे फूली नहीं समाई। वे बताती हैं कि इस काम से जुड़कर संजय ने न केवल अपने से बड़ी बहनों की शादी कराई, बल्कि अन्य पारीवारिक जिम्मेदारयां जैसे घर की मरम्मत कराना और छोटे भाई को एमबीए कराने जैसे दायित्वों को भी पूरा किया है। आज संजय ने अपने कस्बे नवलगढ़ लौटकर एक छोटी सी सेमी ऑटोमेटिक डायमंड प्रोसेसिंग मशीन लगा ली है, जिसमें उनके अलावा अन्य तीन लोग काम करते हैं। वे खुद औसतन 15 हजार रुपये मासिक अपने घर-परिवार के साथ रह कर कमा लेते हैं। जबकि उनके साथ काम करने वाली लेबर भी करीब 6 से 7 हजार रुपये महीना कमा लेती है। हाल ही में संजय को हीरों के कारोबार के लिए विख्यात दक्षिण अफ्रीका से नौकरी की ऑफर भी मिल रही है।

बरसात की अनियमितता के चलते राजस्थान के शेखावाटी अंचल में खेती-बाड़ी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा था। स्थानीय लोगों की मानें तो 4 साल में औसतन यहां मात्र एक फसल होती थी। दूरदराज की ढाणियों और गांवों में बसे किसान परिवारों का जीवन-यापन मुश्किल हो गया था। जिसका सीधा परिणाम रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन के रूप में देखने को मिल रहा था। गांव और कस्बे खाली होने लगे तो कुछेक सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित हुआ। शेखावटी के गंवई परिवेश के किसानों में जैविक खेती को लोकप्रिय बनाने वाली संस्था मोरारका फांउडेशन के निदेशक मुकेश गुप्ता ने फील्ड विजिट के दौरान पलायन की पीड़ा और उसके मर्म को करीब से समझने का प्रयास किया। उल्लेखनीय है कि मोरारका फांउडेशन पहले ही न केवल शेखावटी बल्कि राजस्थान के विभिन्न इलाकों में किसानों को जैविक खेती से जोड़ने की प्रयास में कृषिगत अनुभव काफी बटोर चुका था। मुकेश गुप्ता ने यह अनुभव किया कि शेखावटी जैसे सूखाग्रस्त इलाके में केवल कृषि के भरोसे लोगों का जीवन यापन संभव नहीं है। यह विचार मन आया और कड़ियां जुड़ती चली गई। उन्होंने सोचा कि यदि स्थानीय लोगों को कोई वैकल्पिक रोजगार मिल जाए तो काम बन जाएगा। लेकिन वैकल्पिक रोजगार क्या हो सकता है, इसको निर्धारित करना आसान नहीं था। नवलगढ़ डायमंड कटिंग इंडस्ट्री के संचालक मदन पुरी कहते हैं कि `किसी भी प्रकार की इंडस्ट्री की स्थापना का आधार मुख्यत: तीन बातों उपभोक्ता, कच्चे माल की उपलब्धता और कौशल पर केन्द्रित होता है।´

रेतीली भूमि वाले शेखावटी के ग्रामीण अंचल मे ऐसी कोई संभावना नहीं दिखाई पड़ रही थी। यहां न तो कच्चा माल मिल सकता था और न ही उपभोक्ताओं की क्रय-क्षमता के आधार पर किसी इंडस्ट्री को लगाने का जोखिम उठाया जा सकता था। ऐसे में एक ही विकल्प बचता था कि कौशल आधारित किसी ऐसे उद्यम की स्थापना की जाये जिससे कि युवाओं को काम सिखाकर उन्हें स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध कराया जा सके। यह काम रेत में दूब उगाने के समान था। ऐसा कौन सा व्यावसाय हो सकता है, जिसमें महारथ हासिल करके बेरोजगारों को आत्मनिर्भर बन सकते थे? इस बात को लेकर विचार मंथन आरंभ हो गया। एक दिन मुकेश गुप्ता नवलगढ़ में अपने किसी परिचित के यहां बैठे बतिया रहे थे। बातचीत में उन्होंने पूछ लिया कि आपका बेटा क्या करता है। जवाब में उन महाशय ने अपने बेटे मदन पुरी गोस्वामी का जिक्र किया जो उस समय जयपुर में डायमंड कटिंग एवं पालिशिंग के व्यावसाय से जुड़ा हुआ था। वहीं से मुकेश गुप्ता के दिमाग में नवलगढ़ में डायमंड ट्रेनिंग सेंटर स्थापपित करने का विचार कौंधा और जयपुर लौटकर इस संबंध में उन्होंने मदन पुरी से मिलकर अपनी योजना उन्हें बताई। मदन पुरी तब तक सूरत और फिर जयपुर में रहकर हीरा व्यावसाय में काफी ख्याति अर्जित कर चुके थे। उस दौरान वे जयपुर में एक स्थापित डायमंड ट्रेनिंग सेंटर का संचालन कर रहे थे। मुकेश गुप्ता ने जब उन्हें नवलगढ़ जैसे छोटे से कस्बे में डायमंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोलने की बात कही तो उन्हें थोड़ा अटपटा सा लगा। वे सोचने लगे कि जयपुर से स्थापित कारोबार को छोड़कर दूरदराज के ग्रामीण इलाके में आखिर यह संस्थान क्या चल पाएगा? काफी सोच विचार के बाद उन्होंने यह आग्रह स्वीकार कर लिया। फिर क्या था, नवलगढ़ में मार्च 1994 में डायमंड ट्रेनिंग सेंटर की नींव मोरारका फांउडेशन के सहयोग से रख दी गई।

ऐसा नहीं था कि पहले लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास नहीं किए गए थे। मदन पुरी बताते हैं कि एक दिन में यह आइडिया नहीं आया। यहां आसपास के करीब 20 गांवों में लोगों आर्थिक एवं सामाजिक स्तर को ध्यान में रखकर सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण से पता चला कि कुछेक लोगों को छोड़कर अधिकतर लोगों का जीवन स्तर संतोशजनक नहीं था। जिसके चलते पलायन की दर बहुत तेजी से बढ़ रही थी। यह सही है कि शेखावटी के कई लोगों ने बाहर जाकर काफी नाम और पैसा कमाया है, लेकिन आम आदमी के लिहाज से यह व्यावहारिक नहीं माना जा सकता था, क्योंकि यह एक दिन की प्रक्रिया का प्रतिफल नहीं था। बल्कि कई पीढ़ियों के प्रयास से शेखावटी की माटी से पैदा बिरला, डालमिया, बजाज और मित्तल जैसे नाम स्थापित हुए थे। लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सबसे पहले सरकंडों की मूज से जेवड़ी बनाने का काम शुरु किया गया। दरियां, टेराकोटा के खिलौने, मेटल के खिलौने और `नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलजी´ के सहयोग से ऊनी वस्त्र निर्माण के काम को भी आजमाया जा चुका था। लेकिन बहुत अधिक सफलता इससे नहीं मिल रही थी। इसी कड़ी में डायमंड कटिंग का काम भी शुरू किया गया। बकौल मदन पुरी गोस्वामी- `दूध देने वाला पशु कितना दुधारू है, यह देखना पड़ता है। हर इंडस्ट्री की अपनी चुनौतियां हैं, लेकिन डायमंड कटिंग का काम उनसे हटकर है।

कोर्स तैयार करते समय अन्य संस्थानों की तरह दो-तीन साल के लंबे एवं उबाऊ पाठ्यक्रम न हों, इस बात का ध्यान रखा गया। तीन महीने एवं छ: महीने के पाठ्क्रम तैयार किए गए। संस्थान के विशेशज्ञों एवं प्रिशक्षकों की मेहनत रंग लाई और पहला बैच छ: माह में प्रिशक्षित हो गया। जहां तक फीस की बात थी तो स्थानीय प्रिशक्षुओं से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था, बल्कि उन्हें कुछ रािश प्रोत्साहन स्वरूप दी जा रही थी। जबकि अन्य राज्यों से आने वाले छात्रों 5,800 रुपये की मामूली रािश फीस के तौर पर ली जा रही थी। अन्य संस्थानों में जहां स्टील के छर्रों पर ट्रेनिंग दी जाती है, वहीं नवलगढ़ में पहले दिन से कच्चा डायमंड प्रिशक्षणार्थियों को थमा दिया जाता था। सूरत, जयपुर, अहमदाबाद, भावनगर, जोधपुर और नवसारी जैसे स्थानों पर यहां से प्रिशक्षित युवाओं को रोजगार मिल गया। डायमंड इंडस्ट्री में नियुक्ति के लिए पर्याप्त गारंटी की मांग की जाती है। यहां भी मोरारका फांउडेशन ने प्रत्येक रत्निशल्पी की बॉण्ड पेपर पर लिखित गारंटी देकर रोजगार दिलाया।

सरकारी क्षेत्र ने भी इस ओर ध्यान देकर संस्थान से सरकारी खर्चे पर प्रिशक्षण कराना आरंभ कर दिया। जिसमें विभिन्न जिला ग्रामीण अभिकरण, ग्रामीण विकास मंत्रालय (भारत सरकार), अनुसूचित जाति विकास निगम, राजस्थान सरकार, ग्रामीण गैर कृशि विकास अभिकरण (रूडा), राजस्थान उद्योग विभाग इत्यादि शामिल थे। इसके अलावा अन्य कई विकासोन्मुख स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी देश के कोने-कोने से प्रिशक्षणार्थियों को भेजना आरंभ कर दिया। अख़बारों में इस बात की चर्चा हुई तो अन्य प्रांतों के छात्र भी नवलगढ़ जैसे कस्बानुमा शहर में आकर प्रिशक्षण प्राप्त करने लगे। दिसंबर 1995 से मार्च 1996 तक 18 प्रांतों के करीब 66 छात्र नवलगढ़ में प्रिशक्षण प्राप्त कर रहे थे। कैम्पस प्लेसमेंट भी यहां होने लगा था। शेखावटी के सैकड़ों युवा इस व्यावसाय से जुड़ने लगे थे। लेकिन मोरारका फांउडेशन की योजना प्रिशक्षण संस्थान स्थापित करने की नहीं थी। डायमंड ट्रेनिंग सेंटर के माध्यम से फांउडेशन की योजना स्थानीय युवाओं को प्रिशक्षित करके नवलगढ़ में डायमंड कटिंग एण्ड पॉलिशिंग इंडस्ट्री खड़ा करने की थी।

संस्था के प्रतिनिधियों का मानना था कि प्रिशक्षण संस्थान से ढाबे, होटल और पान-बीड़ी की दुकाने पनप सकती हैं, लेकिन इंडस्ट्री स्थापित नहीं हो सकती। इसी बात को ध्यान में रखकर संस्थान को बंद कर दिया गया। करीब साढ़े आठ सौ छात्र इस संस्थान से प्रिशक्षण प्राप्त कर विभिन्न स्थानों पर कार्य करना आरंभ कर चुके थे। नवलगढ़ में डायमंड प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना में भी फांउडेशन ने सहयोग दिया और पहले से प्रिशक्षिण प्राप्त कर चुके लोगों ने भी अन्य लोगों को काम सिखाकर इस व्यावसाय को बढ़ावा देने का काम किया है। जिन छ: लोगों को सहयोग करके 9 मशीनों के साथ प्रोसेसिंग ईकाइयों की स्थापना कराई थी, उनमें से 4 ने कुछ समय बाद लागत खर्च संस्था को लौटा दिया। आज नवलगढ़ और आसपास के कई गांवों में दर्जनों डायमंड प्रोसेसिंग इकाईयां काम कर रही हैं। इससे करीब 15 सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। जिसमें से कुछ लोग आसपास के गांवों में कार्यरत हैं तो कुछ बड़े शहरों में काम कर रहे हैं। कुछ लोग कच्चा माल जयपुर के बड़े व्यावसायियों से लेकर आते हैं और कटिंग पॉलिशिंग के पश्चात् वापस कर देते हैं। कुछ ईकाइयां ऐसी भी हैं जो कच्चा माल खुद खरीद कर लाते हैं और माल तैयार करके स्वयं बेचते हैं। अच्छी बात यह हुई कि रत्न जड़ाव के लिए प्रसिद्ध बीकानेर और सरदारशहर जैसे क्षेत्रों के लोग नजदीक होने के कारण डायमंड लेने के लिए नवलगढ़ आना अधिक पसंद करते हैं। सुखद एवं आश्चर्यजनक सत्य यह है कि इन सब में प्रोसेस होने वाले हीरों की मात्रा एवं ईकाइयों की संख्या रत्ननगरी जयपुर से भी अधिक है।

मदन पुरी कहते हैं कि `यहां सब कुछ इतनी सहजता से किया जाता है कि उद्यमीयों से एक जुड़ाव सा हो जाता है। वे इस पूरी प्रक्रिया को माइक्रोफाईनेंस के जमीनी माध्यम के तौर पर देखते हैं। आगामी 5 सालों में फांउडेशन की योजना नवलगढ़ के हीरों को सोने मेंं जड़कर अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने की है। कौशल आधारित लघु एवं ग्रामीण उद्योग कभी भारतीय ग्राम्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते थे और गांव स्वयं आत्मनिर्भर आर्थिक सत्ता हुआ करते थे, जिसे कंपनी कल्चर ने धराशायी कर दिया। लेकिन शेखावाटी के लोगों ने साबित कर दिया है कि हो सकता है आसमां में भी सुराख, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

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anil kant on 29 January, 2009 16:59;37
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बहुत अच्छा लेख लिखा है ....संजय जैसों के बारे में जानने को मिला ....आजकल जिस दौर से देश गुजर रहा है वो सचमुच समस्या है
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Vijay Deep Singh on 31 January, 2009 18:57;13
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It is fantastic Umashankar je!!!
I do appriciate this, your work and research along with the way of writing is -----!!!
Thanks for this cool story.
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ummed singh baid sadhak on 01 February, 2009 00:07;40
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मिट्टी से सोना बने, लें लें शुभ संकल्प.
इसी मार्ग से संभव है, देश का काया कल्प.
देश का काया कल्प, उमाशंकर और संजय.
करते हैं विस्फ़ोट, जगाते सबके ह्रदय.
कह साधक कवि, रोशन हुआ है अंधा कोना.
करलें सब संकल्प, बने मिट्टी से सोना.
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rajkumar sharma on 03 February, 2009 19:57;12
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sir ji very good article. agar aise hi desh ke har pradesh or har pradesh main kuch NGO's kuch aesa hi jajba lekar kaam karen to berojgari or great depression jaisi problem ko hum jad se ukhad phenkge or India ko Develop Countries main no 1 bana denge
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