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कचरे के ढेर में गुम होती बेटियाँ

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प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, मीरा कुमार, सुषमा स्वराज कुछ ऐसे नाम हैं जो भारत में महिलाओं को सम्मान के शिखर पर पहुंचाते हैं. लेकिन जिस देश के शीर्ष पर महिलाओं का वर्चस्व इस कदर स्थापित हो रहा हो उस देश में 9 साल की दुर्गा भी है जो रोज सबेरे कचरा बीनने का थैला लेकर निकल पड़ती है. भोपाल के अरेरा कालोनी की गलियों में वह रोज कचरा इकट्ठा करती है. पूछने पर दुर्गा कहती है कि वह डाक्टर बनना चाहती है और अपना क्लिनिक बनाना चाहती है. लेकिन बड़े सपनों के साथ बड़ी होती दुर्गा अगले दिन सुबह फिर अरेरा कालोनी की गलियों में निकल पड़ती है. बात साफ है. अगर कूड़ा न बीने तो भूखा सोना पड़ेगा.

यहाँ दुर्गा के साथ ज्योति, आरती, लक्ष्मी जैसी तमाम बेटियाँ हैं जिनके मन के कोने में कहीं बेहतर कैरियर का सपना है लेकिन वे करें क्या? और कैसें? माँ खो चुकी लक्ष्मी  नानी के पास रह रही है किन्तु नानी के पास भी कोई सहारा नहीं जो परिवार चला सके। सो 8 साल की लक्ष्मी अब स्कूल छोडकर नानी के साथ -साथ कचरे के ढ़ेर में भटकती रहती है। दिनभर कचरे के ढ़ेर में भटकने तथा पिन्नयाँ कबाड़ी को बेचने से महज 20-30 रूपये मिल जाते हैं। यही आज लक्ष्मी जैसी हजारों वंचित बेटियों के परिवारों में आजीविका का मुख्य माध्यम है। शहरी गरीबी और उसका प्रभाव विषय पर कार्यरत `नागरिक आधिकार मंच` भोपाल के कार्यकर्ता जयभीम बताते है कि पन्नी बीनकर जीवन यापन करने वाले परिवारों खासकर बेटियों की हालत मैला ढोने वाले समुदाय की तरह ही है। सिर पर मैला ढ़ोने और पीठ पर कचरा (गंदी, जूठी पिन्नियां) ढ़ोने वाले बच्चों को लगभग एक जैसी सामाजिक उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। यह समस्या केवल शैक्षणिक विकल्प देने से खत्म नहीं होगी वरन् ऐसे बच्चों व परिवारों को विशेष सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की योजनाओं से जोड़ना होगा। अकेले भोपाल में ही लगभग 2000 बेटियाँ रोजाना पन्नी बीनती हैं। मीरा नगर, अरेरा कॉलनी, गौतम नगर, नया बसेरा, न्यू जाटखेड़ी, बाग मुगलिया, करोद, भानपुर, सरगम टॉकीज बाणगंगा, राहुल नगर इत्यादी राजधानी के स्थानों पर कचरा बीनने वाली बेटियों के बड़े समूह दिखाई पड़ते हैं। आवासीय कॉलोनियों से निकलने वाले दूध के खाली पैकेट इनकी कमाई के मुख्य स्त्रोत होते हैं जो आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। मध्यप्रदेश के इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में पन्नी बीनने वाले समुदाय की बड़ी संख्या है। असंगठित, दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों से जुड़ी ये बेटियाँ अपने घर की रोजी-रोटी चलाने में विशेष सहायक बनी हुई हैं।

7 से 18 वर्ष के बीच की इन लड़कियों को कचरे के ढ़ेर से बाहर निकालने और उन्हे टॉप करने वाली बेटियों के बराबरी तक लाने के लिए सरकारी तौर पर जो काम किया जाना चाहिये उसकी पूरी तरह से कमी बनी हुई है। सबसे बड़ी कमजोरी तो नीतियों के स्तर पर है। हाल ही बंगले पर काम करने वाली लड़कियों को बालश्रम के दायरे में लिया गया किन्तु कचरा या पन्नी बीनना बालश्रम नहीं है। कामकाजी बच्चों को लेकर श्रम विभाग के पास कोई ठोस अध्ययन, सर्वे न होने के कारण ही आज तक विकास योजनाओं से इन बच्चों को नहीं जोड़ा जा सका है। मध्यप्रदेश श्रम विभाग का आंकड़ा कहता है कि प्रदेश में मात्र 495 बालश्रमिक ही हैं। हालांकि लंबे समय से यह डाटा दुरूस्त नहीं किया गया है। नीतियों की बात करें तो श्रम कानूनों व अंतर्राष्ट्रीय करार की बातों में टकराव दिखाई पड़ता है। गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार समझौता (सी.आर.सी.) के तहत 0 से 18 वर्ष को बच्चा माना गया है वही बालश्रम कानून के तहत खतरनाक धंधों से जुड़े 14 वर्ष तक के बच्चों को ही बालश्रमिक बताया गया है। इस तरह 14 से 18 वर्ष  के बच्चो का एक बड़ा वर्ग अपने आधिकारों से वंचित किया जा रहा है। मध्यप्रदेश की तरह ही छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, में भी राज्य स्तर पर बालश्रम की कोई स्पष्ट रणनीति नही बनी है। गत वर्षों में इन राज्यों के शहरों की झुग्गी बस्तियों में बड़ी संख्या में ग्रामीण गरीब परिवार पलायन कर बसे है। ऐसे परिवारों के पास कोई पहचान पत्र व राशनकार्ड नहीं हैं। सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत मिलने वाले हक से वंचित ऐसे परिवारों के सभी सदस्य कचरे के भरोसे जीवन यापन करने को विवश हैं।
   
सर्व शिक्षा अभिययान के बहुप्रचारित लक्ष्यों व शिक्षा विभाग द्वारा ब्रिज कोर्स के तहत चलाये जा रहे शैक्षणिक कार्यक्रमों से इन बच्चों का पक्का जुड़ाव नहीं बन पा रहा हैं। इसका प्रमुख कारण हैं बच्चों का पन्नी व कचरे की तलाश में दर-दर भटकना। स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रयास से कुछ बेटियों को स्कूली शिक्षा से जोड़ा तो गया किन्तु इन बच्चों के प्रति सहपाठी बच्चों के मन में बनी `गंदे बच्चे´ की धारणा के कारण पन्नी बीनने वाली लड़कियों को उपेक्षा व मानसिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है। लक्ष्मी बताती है कि उसने 2 वर्ष पूर्व जब सरकारी स्कूल में जाना शुरू किया तो शिक्षक बार-बार कहते थे कि अच्छे से नहाधोकर आया करो जबकि वह रोज नहाकर जाया करती थी। बच्चे भी उसे गंदी लड़की कहकर चिढ़ाते, उससे अलग बैठते और उससे कोई बात नहीं करता था। लक्ष्मी को इसका बुरा लगा और उसने स्कूल जाना छोड़ दिया। उसे अब पन्नी बीनना ही अच्छा लगता है, हालांकि वह पढ़ लिखकर शिक्षिका बनना चाहती है। पन्नी बीनने वाली बेटियों को लेकर बनी हमारी नाक भौं सिकोड़ने वाली सोच के कारण ही इन बच्चियों का शिक्षा की मुख्याधारा से जुड़ाव नही बन सका है। जबकि हम सब तथाकथित सभ्य समुदाय के ही फैलाये गए कचरों ने बाल असंरक्षण व सामाजिक उपेक्षा की समस्या पैदा कर दी है।

बालरोग विशेषज्ञ डॉ. वी. आर. वर्मा बताते है कि, चूंकि कचरा ढोने वाली लड़कियाँ लम्बे समय तक खुली गंदगी में कचरे के स्पर्श में रहती है इससे उनमें शारीरिक अल्पता व स्वच्छता की बड़ी समस्या दिखाई पड़ती है। वे इन बच्चों के बीच नियमित स्वास्थ्य परीक्षण व स्वास्थ्य सुरक्षा की आवश्यक्ता पर जोर देते है। आवासीय ब्रिज कोर्स स्थलों पर भी इस तरह के कार्य के लिए अतिथि डॉक्टरों की प्रक्रिया अभी न के बराबर है। बालपंचायत की सक्रियता को लेकर कार्यरत् समाजिक कार्यकर्ता पन्ना मसानी बताते है कि श्रमविभाग, महिला बाल विकास विभाग व शिक्षा विभाग को चाहिये कि वे पन्नी बीनने वाली बेटियों के विशेष संरक्षण की जरूरत के आधार पर स्वैच्छिक संस्थाओं के साथ मिलकर ठोस कदम उठायें। कचरा ढ़ोने वाली बेटियों को लेकर बालश्रम पर रोक के साथ ही उनके व परिवारों की आर्थिक सामाजिक सुरक्षा के विषय पर ठोस काम खड़ा किये बगैर इस समस्या से निपटना संभव नहीं जान पड़ता। कचरे के ढ़ेर में लगातार गुम होती जा रही बेटियों को लेकर बेहतर पहल किये जाने की जरूरत है।

(ramkumarvidyarthi@gmail.com)

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dpmishra on 20 September, 2009 20:02;20
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lekh bahut he achachha lga.
jo aapne bhart ke asloe tsveer dikhaye
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