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श्रीअमरनाथ श्राईन बोर्ड और विवाद

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अमरनाथ यात्रा का सारा प्रबंधन सरकार द्वारा होता था लेकिन उसके कुप्रबंधन तथा अव्यवस्था के चलते 1996 में आए बर्फानी तूफान में सैकड़ों श्रद्धालु मारे गये थे. यात्रा आतंकवादियों के आक्रमण का भी निशाना बनी. तब केन्द्र सरकार ने अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा-व्यवस्था, प्रबंधन आदि के लिए ´नितीश सेन कमेटी´ का गठन किया। कमेटी ने सुझाव देते हुए कहा कि

यात्रा पथ को और चौड़ा किया जाए, यात्रा की समयावधि बढ़ाई जाए, यात्रियों की निर्धारित संख्या प्रतिदिन निश्चित की जाए तथा यात्रा मार्ग में स्थान-स्थान पर अस्थायी आवासों का निर्माण हो। इन्हीं सुझावों को ध्यान में रखते हुये यात्रा सुचारू रूप से चले और तीर्थ यात्रियों को समुचित सुरक्षा एवं सुविधा मिले और वह ठीक ढंग से पावन अमरनाथ गुफा में दर्शन, पूजन, अर्चन कर सकें इसके लिए सन 2000 में जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने प्रस्ताव पारित करके जम्मू एवं कश्मीर श्री अमरनाथ जी श्राईन एक्ट, 2000 के तहत ´श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड´ का गठन किया गया। राज्यपाल अगर हिन्दू हैं तो वह इस बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होंगे और अगर राज्यपाल हिन्दू नहीं हैं तो उनके द्वारा नामांकित हिन्दू व्यक्ति बोर्ड का अध्यक्ष होगा। राज्यपाल समेत इस बोर्ड के सदस्य दस से ज्यादा नहीं हो सकते। नौ सदस्यों की घोशणा राज्यपाल अपनी इच्छा से करते हैं जिनमें दो सदस्य हिन्दू धर्म और संस्कृति से जुड़े हुए होते हैं। दो महिला सदस्य भी हिन्दू धर्म और संस्कृति से जुड़ी हुई और महिला उत्थान के कार्य में लगी हुई, तीन सदस्य जो प्रषासन, कानूनी और वित्तीय स्थिति को देखने वाले और दो सदस्य जम्मू कश्मीर राज्य से प्रमुख हिन्दू के नाते से बोर्ड के सदस्य होते हैं।

श्रीअमरनाथ श्राईन बोर्ड अपने गठन से ही यात्रा को सुचारू और व्यवस्थित रूप से चला रहा था और प्रति वर्ष यात्रियों की संख्या भी बढ़ रही थी। साल 2004 में यात्रा की अवधि भी एक महीने से बढ़ाकर दो महीने की कर दी गई थी। हालांकि इस विषय पर राज्य सरकार से बोर्ड की भी कुछ टकराहट भी हुई थी। लेकिन यात्रा ठीक ढंग से चलती रही। यात्रियों को ठीक ढंग से सुविधा मिले, उनके ठहरने के लिए शेड, शौचालयों की व्यवस्था बनें इसके लिए बोर्ड ने 2002 में राज्य सरकार से जमीन मांगी थी। यह मांग सन् 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की आंख की किरकिरी बन गई। कट्टरपंथी मुख्यमंत्री कभी भी यह जमीन अमरनाथ श्राईन बोर्ड को देने के हक में नहीं थे। कभी पर्यावरण तो कभी वन विभाग की मजबूरियों का वास्ता दिया गया। सरकार बदली। प्रक्रिया चलती रही। साल 2007 के अंत में बोर्ड ने दोबारा एक प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा जिसमें बालटाल में 800 कनाल जमीन देने का आग्रह किया गया।

मई 2008 में राज्य सरकार ने मंत्रीमण्डल में यह प्रस्ताव रखा जिसमें कांग्रेस, पीडीपी एवं पीपुल्स डेमोक्रेटिक फंट के मंत्री शामिल थे। पीडीपी के मंत्रियों ने ही यह जमीन श्राईन बोर्ड को देने का प्रस्ताव पारित किया। मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और श्राईन बोर्ड को 800 कनाल जमीन बालटाल में दी। परन्तु कुछ शर्ते भी इसके साथ जोड़ दी गईं -

1.   श्राईन बोर्ड इस भूमि के बदले 2 करोड़ 31 लाख, 30 हजार 4 सौ रूपये  अदा करे।
2.   श्राईन बोर्ड को भूमि अस्थाई तौर पर दी गई है और यात्रा समाप्ति के बाद यह जमीन स्वत: वन विभाग के अधीन आ जायेगी।
3.   श्राईन बोर्ड इस भूमि पर अस्थाई निर्माण ही कर सकता है।
4.   श्राईन बोर्ड इस भूमि पर से कोई पेड़ नहीं काट सकता तथा जितने पेड़ है उसमें नये पेड़ और लगायेगा। 

श्राईन बोर्ड ने इन सब शर्तों को स्वीकार कर लिया। सभी विभागों ने जिनमें पर्यावरण तथा वन विभाग भी अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिये।

सरकार ने गर्वनमेंट आर्डर नम्बर 184  दिनांक 26-5-2008 को एक आदेश जारी किया जिसमें मंत्रिमण्डल निर्णय 947 दिनांक 20-5-2008 का जिक्र करते हुये लिखा कि´सिंध फारेस्ट डिवीजन´ की 39.88 हैक्टेयर जमीन श्रीअमरनाथ श्राईन बोर्ड को बालटाल और दोमेल में भवन और ढांचा बनाने के लिए दी जाती है। रांगा से बालटाल के लिए 9 हैक्टेयर तथा बालटाल में शिविर बनाने के लिए 30.88 हैक्टेयर जमीन दी गई। इसमें एक शब्द diversion का प्रयोग किया गया कहीं भी sale & transfer शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। इससे सरकार की नियत पर शक होना लाजमी था।

पीडीपी के नेता यह सहमति देने के बाद कुछ सोचने पर मजबूर हुये। उन्हें लगा कि शायद कहीं कोई गलती हो गई है। लेकिन बोर्ड को जमीन देने के बारे में स्वीकृति तो इन लोगों ने स्वयं ही दी थी। अब क्या किया जाये? उन्होंने इसके लिए कांग्रेस और अलगाववादियों को आगे कर दिया। और शुरू हो गया श्रीनगर में आतंकियों और अलगाववादियों का प्रदर्शन। जगह-जगह नारे बाजी होने लगी, भीड़ का संचालन अलीशाह गिलानी जैसे अलगाववादी नेता करने लगे। मीरबाईज फारूख साथ देने लगे। कश्मीर में पाकिस्तानी झण्डे सरेआम पुलिस की नाक के नीचे लाल चौक और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर फहराये जाने लगे। पाकिस्तान जिन्दाबाद - पाकिस्तान जिन्दाबाद हर तरफ गूंजने लगा। मस्जिदों में भड़काउ भाशण जलती आग पर तेल की तरह काम करने लगे। साम्प्रदायिकता और मुस्लिम कट्टरवाद की आग को भड़काया जाने लगा क्योंकि यात्रा शुरू होने के दिन नजदीक आने लगे थे। अलगाववादी नहीं चाहते थे कि यात्रा ठीक से सम्पन्न हो।

इस बीच पीडीपी और कांग्रेस की सरकार ने अलगाववादी और कट्टरवादियों को खुश करने के लिए नेशनल कांफ्रेंस को भी अपना भागीदार बनाने की चाल चली। सरकार ने 6 मई को नेशनल कांफ्रेंस के नेता मुस्तफा कमाल की अध्यक्षता में जो कमेटी बनाई थी उसने 11 जून को पर्यावरण का वास्ता देकर यात्रा की अवधि को कम करने की सिफारिश की। इस कमेटी ने यह भी कहा कि इस यात्रा से स्थानीय व्यापारियों को कोई लाभ नहीं होता तथा सिन्धु और लिददर नदियां प्रदूषित होती हैं। इस कमेटी की सिफारिषों से कश्मीरियों के प्रदर्शन बढ़ने लगे। कांग्रेस, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस तीनों ने अलगाववादी और आतंकवादियों का सहारा लेते हुये इस प्रदर्शन को उग्र रूप देना शुरू कर दिया। अत्यंत खतरनाक साजिष रची गई। अलगाववादी नेता मीरवाईज उमर फारूख, तहरीके हुर्रियत के नेता सईद गिलानी, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासिन मलिक, डेमोक्रेटिक पार्टी के शब्बीर शाह सरीखे नेता कांग्रेस और पीडीपी की शह पर आपसी मतभेद भुला कर खुलेआम देशद्रोह की बाते करते हुये यह जमीन सरकार को वापिस लेने के लिए दबाव बनाने लगे।

सरकार इनके साथ थी। इन्हें खुली छूट दी गई। सरकारी सम्पति निशाना बनने लगी। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगने लगे। पाकिस्तानी झण्डे सरेआम लाल चौक और अन्य स्थानों पर फहराये जाने लगे। लेकिन पुलिस तो प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा के लिए तैनात की जाती थी न कि उनको रोकने या खदेड़ने के लिए। ऐसा कांग्रेस और पीडीपी की महबूबा की शह पर किया जा रहा था।

25 जून को राज्य के नये राज्यपाल एन.एन. वोहरा ने जम्मू-कष्मीर में कदम रखा। श्री वोहरा वह व्यक्ति हैं जो भारत के गृह सचिव रहते हुये कईं बार तथाकथित ‘शांति व्रार्ता'  में भाग ले चुके हैं। इसलिए उनके अलगाववादी नेताओं से काफी निकट के संबंध हैं। उनके आते ही एन.सी., पीडीपी व कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें घेर लिया। उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफती ने कश्मीर की तथाकथित खतरनाक परिस्थितियों का हवाला देते हुये स्वयं होकर उन्हें जमीन वापिस करने का सुझाव दिया। राज्यपाल ने उनके सुझाव को मानते हुये यात्रा की सुरक्षा और व्यवस्था सरकार को सौंप दी और केवल पवित्र गुफा में पूजा-पाठ का ही कार्य बोर्ड के पास रखा। जब सुरक्षा और व्यवस्था बोर्ड के पास नहीं रहीं तो जमीन की भी आवश्यकता नहीं रही और सरकार ने बोर्ड को दी जमीन का आबंटन रद्द कर दिया। बोर्ड का गठन विधानसभा में विशेष एक्ट के द्वारा हुआ था जिसमें स्पष्ट प्रावधान था कि यात्रा की सारी व्यवस्था बोर्ड करेगा। राज्यपाल ने वह सारी व्यवस्था सरकार को सौंप दी। और मंत्रीमण्डल ने प्रस्ताव पारित कर यात्रा  पर्यटन विभाग को सौंप दी।

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कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ विवादों के लिए ही पैदा होते हैं।
दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है। यही कारण है कि हर अच्छा कदम इसकी भेंट चढ जाता है।
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आशीष कुमार 'अंशु' on 02 August, 2008 22:48;58
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हुर्रियत कांफ्रेस के कथित उदारवादी अध्यक्ष मीरवायज उमर फारुख ने कहा है कि 'श्राइन बोर्ड को जमीन देकर भारत सरकार कश्मीर में हिन्दू कालोनी बनाकर जनसंख्या अनुपात को बदलना चाहती है।'
यासीन मलिक ने चेतावनी दी कि यदि भूमि हस्तांतरण आदेश वापस नहीं लिया गया तो वह आमरण अनशन शुरू करेंगे।
अलगाववादी नेता अली शाह गीलानी का कहना है कि बोर्ड को ज़मीन देना ग़ैर-कश्मीरी हिंदुओं को घाटी में बसाने की एक साज़िश है ताकि मुस्लिम समुदाय घाटी में अल्पसंख्यक हो जाए।
मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पुत्री पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के अनुसार अमरनाथ यात्रा से कश्मीर में प्रदूषण फैलता है।
पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि उनकी हुकूमत आई तो बोर्ड को दी जाने वाली जमीन वापस ले ली जाएगी।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर स्थित प्रसिध्द तीर्थस्थल श्री अमरनाथ मंदिर को 40 हेक्टेयर ज़मीन हस्तांतरित करने पर विवाद गहरा रहा है। राज्य सरकार ने कैबिनेट बैठक करके यह जमीन श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी, ताकि वह यात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाओं की स्थायी व्यवस्था कर सके। इसके विरोध में अलगाववादी संगठनों द्वारा कश्मीर में हिंसक प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। अंतत: अलगाववादियों की धमकी के आगे गुलाब नबी सरकार ने घुटने टेक दिए। गौरतलब है कि पीडीपी के समर्थन वापस ले लेने से राज्य की कांग्रेस-नीत सरकार भी अल्पमत में आ गई है। हालांकि आवंटित भूमि को राज्य सरकार ने वापस ले लिया है। बोर्ड को दिए गए भूमि आवंटन को रद्द किया जाना अलगाववादियों के सामने सरकार का समर्पण है।
(यहाँ तक की बात मैंने जिन लोगों को श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड का मामला ना पता हो उन्हें विषय वस्तु से अवगत कराने के लिए संजीव भाई के ब्लॉग 'हितचिन्तक' से उधार - साभार भी कह सकते हैं- लिया है।)
खैर विषय पर आते हैं।
हर तरफ़ बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। लेकिन इस मामले में जिसकी राय सबसे अहम मानी जाती वे हैं डा कर्ण सिंह। लेकिन वे खामोश रहे। कुछ भी नहीं बोले। क्या जम्मू में जो चल रहा, उनसे उन्हें तकलीफ नहीं। फ़िर कौन सी मजबूरी है, जिसने उन्हें खामोश रहने पर मजबूर किया है।
कल एक अखबार के प्रतिनिधि के तौर पर उनसे बात करने की कोशिश की थी। उनके सहयोगी मोहन सिंह और गंगाधर शर्मा के संपर्क में सुबह से शाम तक रहा। श्री शर्मा ने थोडी कोशिश भी की, मेरी बात इस मुद्दे पर डा सिंह से हो जाए मगर वे असफल रहे।
इस देश में डा सिंह उन चंद नेताओं में से हैं जिन्हें पार्टी और राजनीति से ऊपर देखा जाता है। लेकिन श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मामले में वे पार्टी लाइन से ऊपर नहीं उठ पाए इसीलिए शायद उन्हें खामोशी अख्तियार करनी पड़ी।
याद कीजिए अपनीइसी बेलाग टिप्पणियों की वजह से वे राष्ट्रपति पद की दावेदारी में वामपंथियों की पसंद नहीं बन सके थे।
उन्हें इस विषय पर अपनी बात जरूर जनता के सामने रखनी चाहिए। भारत की आवाम उनका पक्ष जानना चाहती है।
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pramendraps on 03 August, 2008 06:53;14
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एक भ्रष्‍ट सरकार की शह पर खेली जा रही गन्‍दी राजनीति का एक चेहरा है।
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MP Sinha on 03 August, 2008 20:56;08
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If government and these leaders are secular why they comment that hindu colony is being made in kasmir. Environment polution can not be projected as excuse as the man eternal quest is exploration, even tourism is part of that, then why, prohibit hindus for this pilgrimage. every year, people die while doing haz in karbala no body objects on that, even goverment of saudi arabia tries to bring more people. In this great country where after 600 years of muslim rule and 300 years of western rule, majority of the population is still hindu unlike other countries where all these religion ha cleased every other religion. People should learn from this great relgion and follow its tenets in other religion.
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j on 04 August, 2008 01:25;55
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bhaisahab,1757 apne ko dohra kar 22 july ko chla gaya to kya gazni aur auregjeb khud ko nahi dohraenge .
dosto jinhe azadi aur samprabhuta ki aawsykta hai unhe bhi khud me maharana pratap aur shivaji ko dohrana padaga
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mehta on 13 October, 2009 19:08;17
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koi is desh me safai mange inn logo se nazane kitane rajya ase hai jha muslman 10% se bhi kam hai kya vha hinduo dawara asa virodh dekhne ko mila hai kisi bhi gav yakasbe me jha muslamano ke 10 ghar ho vha bhi masjid surakshit hai or surakshit hi rhengi aaj kahi bhi chale jaiye muslim dharm parivartan karwa rhe hai kya hinduo ne kisi muslim ka dharm parivartan kiya rhi bat jameen ki to kya hinduo ne aap logo ko jameen nhi di ? hindu jiski saskariti hai jeeyo or jeene do par ye bhi kha tak uchhit hai ki ye log jha inka bhumat ho ye jameen nhi hindu sabhi dharmo ka samman karte hai inhe bhi hamare dharm ka samman karna hoga
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on 14 October, 2009 12:19;49
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yah mehta kya paagal hai.
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