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अबूझमाड़ में लोकतंत्र जिन्दा है

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"वोट डालने के कारण हमारे गांव में कई लोग मारे जा चुके हैं. नक्सली उन्हें उठाकर बाहर ले जाते हैं और गोली मार देते हैं. नक्सलियों ने कई लोगों की अंगुलियां काट दी. हम फिर भी छुप-छुपकर वोट डालने जाते हैं." छत्तीसगढ़ के दक्षिण में नारायणपुर जिले ताडनार गांव के ४० वर्षीय आईतु राम की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.

जिन लोगों को आजादी के बाद से कुछ नहीं मिला आखिर वे अपनी जान जोखिम में डालकर चुनाव में वोट डालने क्यों जाते हैं? जबकि हमारे दो प्रतिष्ठित महानगरों दिल्ली और मुंबई के दक्षिणी हिस्सों पंद्रह से बीस फीसदी वोट भी मुश्किल से पड़ता है. दिल्ली और मुंबई के लोगों को जो सुविधाएं मुहैया हैं वे छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को सौ साल बाद भी नसीब नहीं हो सकती. 

 

दक्षिणी दिल्ली में जब बीआरटी कारीडोर बनने से कार चालकों को तकलीफ होने लगी तो मीडिया ने बीआरटी को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था. देश के सबसे अच्छे अस्पताल यहीं पर हैं ताकि यहां रहनेवाले या फिर जनप्रतिनिधियों को बीमार होने पर इलाज के लिए दूर न जाना पड़े. नेताओं और अफसरों के बच्चों के पढ़ने के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ स्कूल यहीं पर हैं. पानी है, बिजली है, अगर नहीं है तो सिर्फ वोट डालने का जज्बा. दिल्ली की सबसे पाश कालोनियों में से एक वसंत कुंज में महज १५ फीसदी मतदान होता है. यहां के १२ हजार फ्लैटों में रहनेवाले अड़तालीस हजार मतदाताओं में से पिछले विधानसभा चुनाव में १८ फीसदी लोगों ने ही मतदान किया था. शायद उन्हें पता है कि विधायक और सांसद चाहे जो भी हों, उनकी सहूलियतों में कमी नहीं होनेवाली. आखिर अखबारों के मालिक और संपादक भी तो यहीं कहीं रहते होंगे. वे अखबारों में, टेलीवीजन चैनलों में सरकार का कचूमर निकाल देंगे. 

 

ताडनार का आईतुराज भी राज करनेवालों तक अपनी आवाज पहुंचाना चाहता है. उसका तो भरोसा भी प्रजातंत्र से नहीं उठा है. वह अबूझमाड़ इलाके में रहता है, जहां सरकार का नहीं नक्सलियों की जनता सरकार का राज है. अबूझमाड़ यानी ऐसे पहाड़, जिन्हें कोई समझ नहीं पाया. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा से घिरे छत्तीसगढ़ के इस महज चार हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके का कभी सर्वे ही नहीं हो पाया. अंग्रेजों ने कोशिश की तो आदिवासियों ने तीर कमान से उन्हें खदेड़ डाला. आजाद भारत में कोशिश ही नहीं की गयी. इस इलाके के तैंतालीस गावों में रहनेवाले तेईस हजार लोग पहले नमक, तेल जैसी रोजमर्रा की चीजें लेने नारायणपुर ओरछा आया करते थे. लेकिन नक्सलियों ने जबसे यहां के पहाड़ों के जंगलों को अपना ठिकाना बनाया है, इस पूरे इलाके को सीआरपीएफ ने घेर रखा है. अंदर वाले अंदर और बाहर वाले बाहर. विधानसभा चुनाव कराने के लिए पोलिंग पार्टियों को मतदान केन्द्रों पर हेलीकाप्टर से उतारा गया. सड़कें हैं नहीं और कच्चे रास्तों में नक्सलियों की लगाई हुई बारूदी सुरंग का डर अलग. चुनाव आयोग को लगता था कि सुरक्षा बल और पोलिंग पार्टियों को एयर ड्राप करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. 

 

आखिर क्यों अबूझमाड़ के निवासी जान जोखिम में डालकर वोट डालने पर उतारू थे? आखिर प्रजातंत्र ने उन्हें दिया क्या है? खेती से अपने खाने की व्यवस्था करते हैं. कभी कभार तो सांप को भी मारकर अपने बच्चों के लिए खाने का इंतजाम करना पड़ता है. बिजली कभी देखी नहीं. पानी कुएं से निकालकर आता है. गांवों से बाहर कस्बों में प्राईमरी स्कूल बने, जिनमें से अस्सी प्रतिशत नक्सलियों ने जमींदोज कर दिये, क्योंकि उन्हीं स्कूलों में सुरक्षाबल अपना ठिकाना बनाते हैं. अस्पताल और चिकित्सा सुविधा का नामोनिशान नहीं है. कोई बीमार पड़े तो कोसों दूर ओरछा और नारायणपुर लाते-जाते ही जान निकल जाए. इस पूरे इलाके में कुल मिलाकर स्वामी विवेकानंद आश्रम पांच स्कूल चला रहा है. गांववालों की छोटी-मोटी बीमारियों को ठीक करने के लिए उनके अध्यापक ही दवाईयां भी रखते हैं. फिर कौन सी ताकत है जो इन गांववालों को प्रजातंत्र पर्व तक खींच लायी और ५५ फीसदी मतदान हुआ. दक्षिण दिल्ली और दक्षिण मुंबई के मतदान औसत से दोगुने से भी ज्यादा. 

 

पिछले चुनावों में भी अबूझमांड़ में २५ फीसदी से अधिक मतदान हुआ था. सांप मारने के लिए जंगल जाने से पहले आईतुराम ने मुझसे कहा कि वे वोट जरूर डालेंगे. इस बार दिल्ली के विधानसभा चुनावों में हमारी नजर दक्षिण दिल्ली पर अधिक होगी क्योंकि वहां के लोगों का प्रजातंत्र से विश्वास उठ गया है. अबूझमाड़ में तो प्रजातंत्र जिन्दा है. दोबारा जब मैं अबूझमाड़ जाऊंगा तो यह उम्मीद लेकर जाऊंगा कि आईतुराम को भी लोकतंत्र में अपनी इस दुस्साहसिक हिस्सेदारी का कुछ परिणाम प्राप्त हो चुका होगा. 

 

(लेखक NDTV इंडिया के कार्यकारी संपादक हैं)

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दीपक on 16 November, 2008 13:39;42
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सवाल यह भी है कि किसके लिये वोट डाले दो दुष्टो मे किसी को भी चुन कर हमारा क्या भला होने वाला है !! ऐसे मे कोई भी प्रत्याशी जीते हारता मतदाता ही है !!

बेलेट पेपर के नीचे विकल्प दिया जाना चाहिये कि उपरोक्त प्रत्याशीयो मे से कोई नही तब यह चुनाव सर्वथा लोकतांत्रीक होगा और यकिन मानीये आधे से ज्यादा लोग यही विकल्प चुनेंगे !!अभी ये आलम है कि हम एक को रिजेक्ट करते है इसलिये दुसरा अपने आप सलेक्ट हो जाता है !!

व्क्त हो तो कभी <a href="http://deepakviplaw.blogspot.com/2008/10/blog-post_14.html">यह भी पढे</a>
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