अगस्त क्रांति का पहला दिन
कुछ तिथियां ऐसी होती है जिन पर समय के थपेड़े असर नहीं डाल पाते. अगस्त क्रांति का पहला दिन (9 अगस्त 1942: भारत छोड़ो) आज भी वैसा ही तरोताजा हो जाता है जैसा छाछठ साल पहले था. इस रोमांचक वाकये के विषय में हर दौर में काफी लिखा और कहा गया.
लेकिन सबसे सजीव विवरण घटनास्थल के समीपस्थ एक पुरानी किताब की दुकान के एक वृद्ध मराठी मालिक से तीन दशक पहले मैंने सुना था. उनका विवरण दिलदार था.....
बदली छायी हुई थी. मौसम नम था. शामियाने में बैठे 20 हजार लोगों में खद्दरधारी तो थे ही रंगीन और भड़कीले लिबास में महिलाएं काफी थीं. विजय नगर के महाराज, कुमार क्रिकेटर विज्जी और उद्योगपति जेआरडी टाटा भी शामिल थे. पैंतीस हजार वर्गफुट के मैदान में उपस्थित थे 350 पत्रकार जिसमें रूसी संवाद एजंसी तास के प्रतिनिधि और चीनी संवाददाता भी शामिल थे. मंच पर कार्यसमिति के लोगों के साथ एक गैर सदस्य भी था. वे दक्षिण के नेता सत्यमूर्ति थे जो जेल से छूटकर आये थे. उन्होंने राजगोपालाचारी के असहयोग की क्षतिपूर्ति कर दी थी. कार्यवाही की शुरूआत में वंदेमातरम हुआ जिसे सुनकर यूरोपीय अखबार के प्रतिनिधि भी खड़े हो गये.
प्रस्ताव पेश करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने पूछा 'दो सौ साल के विदेशी शासन के बाद आजादी मांगना क्या गुनाह है?' तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अनुमोदक सरदार वल्लभभाई पटेल ने अंग्रेजों से सीधी अपील की 'शासन मुस्लिम लीग को दो, चाहे डाकुओं को, पर हिन्दुस्तानियों को सौंपकर भारत से तो जाओ.' अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा 'सत्ता का हस्तांतरण इसी वक्त हो.' महात्मा जी सौम्य थे. शायद वक्त की गंभीरता के कारण. उनके शब्द संतुलित थे. 'मैं रहूं या चला जाऊं, भारत स्वाधीन होकर रहेगा.' बिजली कौंधी. पांडाल में गूंजा- करेंगे या मरेंगे.
दूसरे दिन गोधूलि के समय ढाई सौ प्रतिनिधियों में सिर्फ तेरह ने 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव का विरोध किया. बाहर कम्युनिस्ट थे और तेरहवें ने अपने कम्युनिस्ट बेटे के कहने पर ऐसा किया था. अधिवेशन के इस निर्णय से देश को दिशा मिली. जनता को कर्म करने का संदेश. बाजी अब सरकार की थी. जापान से करारी चोट खाकर बहादुरी से पीछे भागते अंग्रेजों ने निहत्थे कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर फतह पाने की पूरी तैयारी कर ली थी. सूरज निकलने के पहले ही गिरफ्तारियां इस तेजी से हुई कि कुछ लोगों की गुसल आघी रह गयी, कुछ अपना चश्मा भूल गये, कई अपनी किताबें और चश्मा छोड़ आये थे.
इतिहास ने इस घटना को भारत छोड़ो आंदोलन बताया. विंस्टन चर्चिल ने कहा- 'बगावत जो कुचल दी गयी.' क्रांतिकारी जनवाद के पुरोहित कम्युनिस्टों की नजर में यह हिटलरी षण्यंत्र था. विभाजन के पक्षधर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की राय में यह अविवेकी कदम था.अल्टामाउण्ट रोड स्थित मकान के दरवाजे पर दस्तक सुन कर अधूरी नींद से चौबीस वर्षीय इंदिरा प्रियदर्शिनी ने किवाड़ खोले. सामने कुछ गोरों को देखकर वे समझी कि अमरीकी टेलिविजन कंपनी के लोग पिताजी का पूर्व निर्धारित इंटरव्यू लेने आये हैं. जब ज्ञात हुआ कि सादे पोशाक में अंग्रेज पुलिसवाले हैं तो नेहरू ने ताली पीटते हुए खिलखिलाकर कहा 'अहा, आ गये. वे लोग आ गये.' मौलाना आजाद सिर में भारीपन महसूस कर रहे थे इसलिए एस्प्रीन की दो टिकिया लेकर पिछले दिन के भाषण की अपनी थकान उतार रहे थे. घड़ी ने भोर के चार बजाए. किसी ने उनका पांव छुआ. चौंककर देखा तो सामने मेजबान भूलाभाई देसाई का बेटा वारंट का कागज लिये खड़ा है. डेढ़ घण्टे बाद वे पुलिस की गाड़ी में थे.
महात्मा गांधी आदतन ब्रह्म मुहूर्त में उठ गये थे. महादेव देसाई ने सूचना दी कि बाहर खड़े पुलिसवाले कमिश्नर बटलर ने पूछा है कि चलने के लिए कितना समय चाहिए. पूरा बिड़ला हाउस घिर चुका था. पुलिस के साथ सैनिक अधिकारी भी थे.गांधी जी ने नियमित ढंग से बकरी का दूध और फल के रस का जलपान किया. सबने मिलकर 'वैष्णव जन' गाया. कुमारी अमतुल सलाम ने कुरान की कुछ आयतें पढ़ीं. कुमकुम लगने और हार पहनने के बाद गांधी जी मीरा बेन और देसाई के साथ चले. कस्तूरबा का शिवाजी पार्क में रविवार की शाम को शिवाजी पार्क में भाषण था. बिड़ला हाउस में दोपहर में पहुंचकर पुलिस ने पूछा कि क्या सार्वजनिक सभा स्थगित की जा सकती है? कस्तूरबा अविचल थीं. शांति भंग के अपराध में उनके नाम भी ताजा वारंट जारी हुआ. वे जेल से जीवित नहीं लौंटी.
सन 42 में रविवार को अखबार नहीं छपते थे. विशेषांक द्वारा नेताओं के कैद की खबर फैली. इन गिरफ्तारियों का प्रभाव हर जगह हुआ. विद्रोह फैल गया. 1857 की क्रांति के बाद पहली बार इतने विशाल पैमाने पर विप्लव हुआ. उधर सरकार ने भी कसर नहीं छोड़ी. अधिकारियों की सूचना अनुसार इस संघर्ष में 538 बार गोली चली, 1028 लोग मारे गये और 3200 लोग घायल हुए. कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि 10 हजार मरे हैं. भारत सचिव लार्ड एमरी ने बताया कि 34894 को सजा हुई है और 16623 कैद हुए हैं. इसके अतिरिक्त कई रेलवे स्टेशन, डाकखाने और तहसील दफ्तर राख हो गये. (जनसत्ता)
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