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प्रभाष जोशी का पार्थिव शरीर इंदौर पहुंचा, शनिवार को होगा अंतिम संस्कार
पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी का पार्थिव शरीर इंदौर पहुंच गया है. उनका पार्थिव शरीर इंदौर के उनके आवास पर रखा गया है जहां से शनिवार को सुबह आठ बजे उनके गांव बड़वाहा के लिए प्रस्थान करेगा जहां नर्मदा के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. प्रभाष जी का गुरुवार/शुक्रवार की मध्यरात्रि में हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया था. ...न हन्यते हन्यमाने शरीरे
हम प्रभाष जी के लिखे को विस्फोट पर प्रकाशित करते थे. अब हम ऐसा नहीं कर पायेंगे. 29 मई 1994 को प्रभाष जोशी ने यह कागद कारे लिखा था. अजल (मौत) के बारे में लिखते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा था- जिस बंबई अस्पताल में सिर्फ एक दिन के चेक अप के लिए भर्ती हुआ था उसमें 28 दिन लग गये. तुरत-फुरत बाईपास जैसा आपरेशन हो गया. और अपन ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे किसी गिल्टी का आपरेशन हुआ है या भांग के जहर का इलाज. यह लफ्फाजी नहीं है भाई साहब। आप चाहें तो बंबई अस्पताल की नयी विंग में ग्यारहवीं मंजिल के कमरा नंबर 64 में जाकर इस आदमी का दिलफेंक तमाशा देख सकते हैं. अपने एक शायर दोस्त ने कहा है- "अजल से वो डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं, यहां हम चार दिन की जिंदगी को क्या समझते हैं?" प्रभाष जी का ही लिखा हुआ कागद कारे उनके जाने के बाद-...जनसंगठनों की क्षति और जन सरोकार की पत्रकारिता में निर्वात
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी का निधन न सिर्फ पत्रकारिता बल्कि देश के जनसंगठनों के लिए भी अपूरणीय क्षति है। ऊनके निधन से दोनों ही स्थानों पर निर्वात महसूस किया जा रहा है। श्री जोशी देशभर के सामाजिक समूहों से न सिर्फ जुड़े रहे हैं बल्कि उन्होंने ने ऐसे समूहों ने सक्रिय भागीदारी भी की है। ऊन्होंने देश के किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के मुद्दे न सिर्फ अपनी लेखनी के माध्यम से उठाये बल्कि वे उनसे करीब से जुड़े भी रहें हैं। ऐसे ही समूहों में नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल है।...खुरदरे सच का खरा साथी
प्रभाष जी नि:संदेह हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष थे, लेकिन उससे भी कहीं बड़े वे इनसान और उसूलों के पक्के थे। आज की पत्रकारिता में सच कहने के पीछे भी सत्य छिपे होने लगे हैं – इसका असर सलीके से सच कहने में भी दिखने लगा है। आज हिंदी पत्रकारिता की कमान जिन हाथों में है- वह प्रभाष जी के बाद की पीढ़ी है। उसे भी अब सलीके से सच या कई बार अधूरा सच कहना ही अच्छा लग रहा है। इसका असर आज की पत्रकारिता पर साफ नजर आ रहा है।...देह गयी है रूह नहीं
जिस बैठक में कोई साल भर पहले उन्होंने कहा था कि मैं कम्प्यूटर पर सर्च सीखना चाहता हूं, आज उस बैठक में उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा हुआ था. कमरे के पूर्वी छोर पर खिड़कियों के पर्दे खिसका दिये गये थे जिनसे प्रकाश पूरी ताकत से अपने आप को अंदर झोक रहा था. बाहर के वातावरण से प्रकाश अंदर दाखिल होकर एक कोफीन को दिगंदित कर रहा था. अंदर उस कोफीन के इर्द-गिर्द कुछ लोग शोकातुर बैठे थे. सब सन्न. न सांत्वना देने की हिम्मत, न ढांढस बंधाने के लिए शब्द. मानो मन के मौन से सब यह स्वीकार लेने की कोशिश कर रहे थे कि प्रभाष जोशी हमारे बीच नहीं रहे. ...- आलोक तोमर की आपबीती
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बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...

