भारत के नये दुश्मन का नाम है नेपाल
वैसे तो पड़ोसी मुल्क नेपाल के साथ भारत के रिश्ते उसी दिन से खराब होने शुरू हो गये जिस दिन वहां माओवादी शक्तियां अस्तित्व में आयीं। इसकी नींव 1995 के आसपास पड़ी जो 2000 आते-आते सतह पर दिखाई देने लगी। माओवादी पार्टी के सरकार में शामिल होने के बाद इसमें क्रांतिकारी तेजी आयी। लेकिन हाल-फिलहाल तक माओवादियों के तमाम प्रयास के बावजूद आम नेपाली नागरिक के मन में भारत के प्रति नफरत की भावना न के बराबर थी। परंतु पिछले कुछ दिनों यह भावना अप्रत्याशित रूप से बदली है। वहां भारत विरोधी शक्तियां तेजी से आकार ले रही हैं जिनका एक ही मकसद है कि दोनों देशों के सदियों पुराने रिश्ते में किसी न किसी तरह नफरत का जहर घोलना।
इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले पंद्रह-बीस दिनों में नेपाल के विभिन्न हिस्सों में एक दर्जन से ज्यादा भारत विरोधी रैलियां निकाली गयी हैं। इन रैलियों में भारत को विस्तारवादी से लेकर आक्रांता तक की संज्ञा दी जा रही है। नेपाल-भारत की सीमा पर तैनात भारतीय अर्धसैनिक बल, एसएसबी को रेपिस्ट तक कहा जा रहा है। और सबसे अचरज की बात यह है कि भारत विरोधी शक्तियों की इस मुहिम में नेपाल के मुख्यधारा के कुछ मीडिया और पत्रकार भी शामिल हो गये हैं। लेकिन प्रतिपराकाष्ठा देखिये कि भारतीय मीडिया में इस बात की कहीं कोई चर्चा तक नहीं है। यहां तक कि सीमाई इलाकों में पढ़े जाने वाले अखबारों में भी इस आशय की कोई खबर प्रकाशित नहीं हुई है।
भारत विरोधी शक्तियों का आरोप है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से सटे नेपाल के डांग जिले में भारतीय अर्धसैनिक बल एसएसबी ने बड़े पैमाने पर नेपाली जमीन का अतिक्रमण किया है । उनका कहना है कि एसएसबी ने जिले के करीब छह हजार एकड़ नेपाली जमीन पर कब्जा जमा लिया है और वहां के लोगों को अपने घरों से बेघर कर दिया है। उनका यह भी आरोप है कि एसएसबी ने इलाके में कई नेपाली महिलाओं के साथ बलात्कार किया है। मामला यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल के उच्चतम न्यायालय में इसे मुद्दा बनाकर एक जनहित याचिका भी दायर की गयी, जिस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह अविलंब मामले की उच्च स्तरीय जांच करें और भारत सरकार से बात करे। ये सब खबरें पिछले एक महीने से नेपाल के तमाम अखबारों और टेलीविजन चैनलों में चल रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि नेपाली लोगों के मन में भारत के प्रति कटुता फैल गयी है और वे भारत को संदेह की नजर से देखने लगे हैं।
मसले का सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि किसी भी नेपाली पत्रकार ने आजतक उन क्षेत्रों की न तो कोई तस्वीर छापी है और न ही किन्हीं भुक्तभोगी महिलाओं का बयान प्रसारित किया है। जब मैंने सच्चाई जानने के लिए बीरगंज और विरॉटनगर के अपने कुछ नेपाली पत्रकार मित्रों से बात की तो उनका कहना था कि सभी सुनी-सुनाई बातों के आधार पर खबर चला रहे हैं। बीरगंज के मित्र पत्रकार ने कहा, " मुझे नहीं लगता कि किसी पत्रकार ने डांग जिले तक पहुंचने का कष्ट किया है, वे काठमांडू में बैठकर खबर लिख-पढ़ रहे हैं और बड़े शहरों में हो रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों की तस्वीर उतारकर जनता को परोस रहे हैं।'' दूसरी ओर नेपाल सरकार ने मामले की जांच के लिए जिस उच्च स्तरीय कमेटी को डांग जिले के प्रभावित स्थलों में भेजा था उन्होंने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि बलात्कार की कोई शिकायत अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इलाके में सबकुछ ठीक नहीं है। हाल के दिनों में वहां के लोगों ने पलायन किया है। यह सच बात है। कुछ जगहों से सीमाई पोस्ट (अधिकृत पिलर) गायब हो गये हैं। यह समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट कुछ ही दिनों में सरकार को सौंपेगी। लेकिन इन्होंने जो प्राथमिक रिपोर्ट दी है उसे नेपाली मीडिया अंडरप्ले कर रहे हैं ।
पूरे प्रकरण पर अगर तटस्थ दृष्टि डालें, तो जो निष्कर्ष निकलते हैं वे काफी चिंताजनक है। दरअसल, एसएसबी को कुछ साल पहले भारत सरकार ने नेपाल-भारत सीमा की निगरानी के लिए तैनात किया था। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, वहीं हुआ। इस बल ने भी तैनाती के शुरुआती वर्षों में तो काफी मुस्तैदी दिखाई, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गये वे निष्क्रिय होते गये। आज अगर नेपाल-भारत के बोर्डर एरिया में आप घूमें तो आपको हजारों ऐसे स्पाॅर्ट मिलेंगे जहां से हर दिन भारी मात्रा में तस्करी होती है। एसएसबी तस्करों से खुलेआम कमीशन ले रहे हैं। वे सीमापार आने-जाने वाले लोगों के लिए तरह-तरह के गैरकानूनी संहिता बनाते हैं। मसलन कभी कहा जाता है कि आप चावल तो इधर से उधर ले जा सकते हैं मगर नमक नहीं। कभी कहा जाता है कि दो बैग लेकर जा सकते हैं तो कभी कहा जाता है कि आप कोई भी समान लेकर इधर-उधर नहीं जा-आ सकते। शादी-विवाह के मौके पर वह बेवजह बारात-गाड़ियों को रोक देते हैं और भारी रकम वसूल कर उन्हें आने-जाने की इजाजत दे देते हैं। जबकि वे अपने मूल कर्त्तव्य को निभाने में असफल हैं।
सभी जानते हैं कि नेपाल सीमा से होकर भारत में बड़ी तादाद में हथियार आ रहे हैं। गांजा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी हो रही है। आइएसआइ और माओवादी इसमें लिप्त हैं। लेकिन एसएसबी इन्हें रोकने में नाकाम है। ऐसे में कहावत है न कि "खाली मन सैतान का', तो वे इन दिनों यही कर रहे हैं। बैरक और चेक पोस्ट से ज्यादा समय सीविलियन एरिया में व्यतीत करने में एसएसबी के जवान ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि उन्हें साफ-साफ ऐसी गतिविधियों में शामिल होने से मना किया गया है। सुपौल और अररिया जिले में तो मैंने एसएसबी को जिला प्रशासन के कार्य में बेवजह पैर अड़ाते देखा है। एक बार नहीं दर्जनों बार। उनकी इन कारगुजारिओं में जो कोई आड़े आता है उन्हें वे प्रताड़ित करने से नहीं चूकते। डांग में भी ऐसा ही कुछ हुआ है, जिसे भारत विरोधी शक्तियों ने तील से ताड़ बना दिया है, लेकिन एसएसबी के आला अधिकारी चुप हैं। वे कोई बयान नहीं दे रहे।
(रंजीत हिन्दी ब्लागर हैं. उनका संपर्क है ranjitkoshi1@gmail.com)
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kintu bharat me bhi to bharat virodiyon ki srkar baithi hai
kuchh nahi ho skta
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