जड़ से जहां तक, कहां से कहां तक?
हिन्दी के प्रतिष्ठित समाचार चैनल जी न्यूज ने चुनाव के दौरान ही जी न्यूज (उत्तर प्रदेश) लांच किया था. चुनाव के दौरान समाचार माध्यमों में अचानक बाढ़ क्यों आ जाती है वह इस चैनल की गतिविधियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है. चैनल ने ऐसा बहुत कुछ किया जो उसे नहीं करना चाहिए था. जी न्यूज समूह के एक पत्रकार द्वारा अपने सीनियर एचआर अधिकारी को लिखा गया पत्र विस्फोट न्यूज नेटवर्क के हाथ लगा है, जो बहुत सारी अनकही कहानी कहता है. इस पत्र से यह भी खुलासा होता है कि कैसे चुनाव के दौरान चैनल के शीर्ष पर बैठे लोगों के अपनी पसंद की पार्टियों का पूरा पक्ष लिया. क्यों? इसे समझना क्या बहुत मुश्किल है?
पिछले आम चुनाव के दौरान हिंदी के कुछ बड़े अखबारों ने जिस निर्लज्जता से चुनावी मैदान में पैसे का खेल खेला, उसके खिलाफ हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष प्रभाष जोशी मशाल लेकर निकल पड़े हैं। उनके इस अभियान को समर्थन भी मिलना शुरू हो गया है। जोशी जी के अभियान के अलावा मैगासेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडे, सामाजिक कार्यकर्ता अफलातून और पत्रकार अनिल चमड़िया भी अखबारों के इस कृत्य के खिलाफ मोर्चा संभाल चुके हैं। लेकिन ये सारा अभियान सिर्फ अखबारों के ही खिलाफ चल रहा है। मीडिया का बड़े हिस्से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर किसी की निगाह ही नहीं है। ऐसा नहीं कि आम चुनाव के दौरान इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यमों ने पत्रकारिता और खबरों के साथ न्याय ही न्याय किया है। खबरिया चैनलों ने सीधे बड़ी पार्टियों से केंद्रीय स्तर पर सौदा किया। बीजेपी सांसद और वरिष्ठ पत्रकार चंदन मित्रा ने जो खुलासा किया, वह आंख खोलने वाला है। चंदन मित्रा के मुताबिक खबरिया चैनलों ने ग्रुप बनाकर अपने पूरे ग्रुप के लिए खुलेआम करोड़ों में विज्ञापन बटोरे। इससे भी बड़ा खुलासा कांग्रेस के सचिव और महाराष्ट्र मामलों के प्रभारी मोहन प्रकाश ने किया है। उनका कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया घरानों ने तो विज्ञापनों के अलावा अंदरखाने में बिना खाता-बही के भी पार्टियों से वसूली की है। और मजे की बात ये है कि भ्रष्टाचार और साफ प्रशासन का दावा करने वाली अधिकांश पार्टियों को इस मांग के सामने झुकना पड़ा।
बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी। टेलीविजन चैनलों के कई संपादकों ने सीधे-सीधे किसी खास पार्टी को फायदा पहुंचाया। हाल ही में शुरू हुए जी ग्रुप के चैनल जी न्यूज यूपी के संपादक वासिंद्र मिश्र ने तो खुलेआम बहुजन समाज पार्टी को फायदा पहुंचाया। भरोसेमंद जानकारों के मुताबिक 29 मार्च 2009 को जी यूपी एक बड़ी खबर ब्रेक कर सकता था। उसके मेरठ रिपोर्टर के पास जबर्दस्त विजुअल था। उस दिन वरूण गांधी की मेरठ के त्यागी हॉस्टल मैदान में सभा थी तो बीएसपी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की जिमखाना में रैली थी। इस मौके पर वरूण का हेलीकॉप्टर विक्टोरिया पार्क में उतरना था, जबकि सतीश मिश्र का हेलीकॉप्टर पुलिस लाइन में। लेकिन सतीश मिश्रा जानबूझकर अपना हेलीकॉप्टर लेकर विक्टोरिया पार्क लेकर चले गए और दिलचस्प ये है कि उसी वक्त वरूण का हेलीकॉप्टर वहां उतर रहा था। चूंकि वरूण के पायलट को इसकी जानकारी नहीं थी, लिहाजा हादसा होते-होते बचा। ये विजुअल जब जी यूपी के दफ्तर में आया तो इसे सनसनीखेज खबर मानकर जी यूपी आउटपुट की टीम ने इस खबर को चलाया। लेकिन दूसरे ही पल जी यूपी के संपादक वासिंद्र मिश्र ने इसे रोक दिया। उनके मुताबिक ये खबर रिपोर्टर मिसलीड कर रहा था। जाहिर है ये खबर लोगों के सामने आने से रह गई। इसी तरह एक मई को भी ऐसा ही हुआ, जब बीएसपी के खिलाफ जाती खबर को जी यूपी में रोका गया। दरअसल उस दिन मायावती की एटा में सभा थी। उस दिन भयानक गर्मी पड़ रही थी। लिहाजा मंच एयरकंडीशंड बनाया गया था। जहां से नेताओं ने भाषण दिया। लेकिन भीषण गर्मी से जनता के बचाव के लिए कोई इंतजाम नहीं था। इसके चलते कई महिलाएं बेहोश हो गईं। ये खबर जी न्यूज समेत देश के सभी खबरिया चैनलों पर हेडलाइन के तौर पर प्रसारित की गई, लेकिन जी यूपी के प्रमुख की नजर में ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं। इस धत्कर्म का विरोध करना वहां के इनपुट इनचार्ज को उमेश चतुर्वेदी को महंगा पड़ा और उन्हें इनपुट से आउटपुट में डाल दिया गया। इतना ही नहीं, उन्हें अपने से बेहद जूनियर एक शख्स को रिपोर्ट करने को कहा गया, ऐसे में उनके सामने लंबी छुट्टी पर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा।
वैसे वासिंद्र मिश्र का भी इतिहास कम से कम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के लोग जानते हैं। आज जो वासिंद्र मुलायम सिंह का विरोध कर रहे हैं, कभी वे मुलायम सिंह यादव के करीबी हुआ करते थे। सितंबर 1995 में छपे इंडिया टुडे का अंक गवाह है। 1993 से 1995 की अवधि में जब मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री रहते जिन पत्रकारों को मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोश से फायदा पहुंचाया था, उसमें वासिंद्र मिश्र भी शामिल थे। पिछली बार मुख्यमंत्री रहते गैरकानूनी तरीके से लखनऊ के विकास प्राधिकरण के जरिए जमीन आवंटन का जो खुलासा मुलायम सिंह ने किया था, उसमें कई पत्रकारों के साथ ही उनका भी नाम था। एक ही ग्रुप के दो चैनलों में एक ही पार्टी और प्रत्याशी को लेकर दो तरह की नीति नजर आई। एक चैनल किसी नेता या पार्टी का समर्थन कर रहा था तो दूसरा चैनल उसका विरोध। जी न्यूज ग्रुप में तो ये साफ नजर आया। वहां एक ही खबर को लेकर जी न्यूज और जी यूपी में अलग-अलग ट्रीटमेंट साफ नजर आया। एक ही दिन लोगों का ध्यान एक ही ग्रुप के दोनों चैनलों पर चल रही एक ही खबर पर गया।
ऐसा नहीं कि सिर्फ इसी ग्रुप में ही ऐसा नजर आया। कई दूसरे ग्रुपों में भी ये नजर आया। इंडिया टीवी में तो एनडीए को आगे दिखाने की खबरों की होड़ तो मतगणना शुरू होने के दिन यूपीए को शुरूआती बढ़त मिलने की खबरें आने के बाद भी दिखीं। बहरहाल जी न्यूज में ये साफ नजर आया। इससे साफ है कि या तो जी न्यूज में चल रही थी, वह खबर सही थी या जी यूपी। बहरहाल कौन सही है और कौन गलत ..ये देखना ग्रुप के नीति नियंताओं का काम है। लेकिन एक चीज शीशे की तरह साफ है कि अपनी पसंदीदा पार्टी की खराब खबरों को दबाने और अच्छी खबरों को प्रचारित करने का खेल इस बार टीवी संपादकों ने जमकर खेला है। मोहन प्रकाश के दावे से साफ है कि इनमें से कई ने इसकी कीमत अपनी पसंदीदा पार्टियों से वसूली है। प्रभाष जी जैसे लोग चुनाव में मीडिया के दुरूपयोग पर सवाल उठा रहे हैं...उसमें टीवी चैनलों की भी भूमिका पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए और उनके भी धत्कर्म को नंगा किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये बेहद जरूरी है।
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प्रभाष जी कितनों को नंगा करेंगे ? छिनालों , वेश्याओं से यह मीडिया बाज़ार
उपाय यह है की अब सीधे जनता ही इन पर जूते बरसाए .
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