माओवादियों पर प्रतिबंध तो सज्जन जिंदल पर क्यों नहीं?
लालगढ़ की लड़ाई ने अचानक ही भारत में माओवादियों को फिर चर्चा में ला दिया है. लालगढ़ के संग्राम को आधार बनाकर आनन-फानन में सरकार ने माओवादियों पर प्रतिबंध लगा दिया और ना-नुकुर का नाटक करते हुए आखिर सीपीएम ने भी पश्चिम बंगाल में माओवादियों को प्रतिबंधित मान लिया. लालगढ़ में हिंसा पर उतारू माओवादियों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार अपने आप को सफल मान रही है तो फिर सज्जन जिंदल पर क्यों प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए? आखिर लालगढ़ की समस्या के मूल में तो सज्जन जिंदल ही है.
यह बात दीगर है कि माओवादियों को इस प्रतिबंध से कुछ खास फर्क पड़ेगा ऐसा लगता नहीं है. प्रतिबंध उनपर कारगर होते हैं जो सरकार के दस्तावेज में दर्ज होते हैं या फिर कहीं न कहीं सरकार से किसी न किसी रूप में जुड़े रहते हैं. माओवादी किसी भी रूप में सरकार के इस नेट में दर्ज नहीं है. वे सत्ता प्रतिष्ठान के समानांतर सत्ता प्रतिष्ठान बनने की कोशिश में हैं और उनके भविष्य की योजना भी कुछ वैसी ही है जैसे पाकिस्तान में बैठे जेहादियों की है. वे भारत के अंदर अपनी सोच समझ का एक गलियारा बनाना चाहते हैं. काठमाण्डू में मिली "लोकतांत्रिक" सफलता के बाद उनके हौसले और बुलंद हुए और वे अब अपना विस्तार तिरुपतिनाथ तक करना चाहते हैं.
सरकार लंबे समय से इस बात को महसूस कर रही है. पिछली सरकार के गृहमंत्री शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमें नक्सलवाद, माओवाद से निपटने के लिए जो कार्ययोजना तैयार की गयी थी उसमें एक महत्वपूर्ण बात कही गयी थी. सभी राज्यों को भेजी गयी इस रिपोर्ट में एक उल्लेखनीय बात यह कही गयी थी कि जिन इलाकों में माओवादियों या नक्सलवादियों का प्रभाव ज्यादा है वहां विकास की गति को धीमा कर दिया जाए. उन जगहों पर स्कूल, अस्पताल और दूसरी बुनियादी जरूरतों के विकास पर ध्यान दिया जाए ताकि माओवादियों और नक्सलवादियों को विस्तार करने का मौका न मिले. अगर नक्सलवाद और माओवाद के फैलते विस्तार को समझना है तो इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता.
लालगढ़ की लड़ाई क्या है? लालगढ़ में लंबे समय से लड़ाई चल रही है. वहां भी सरकार विकास करना चाहती है. सरकार ने 500 एकड़ जमीन जिंदल स्टील को दे दिया है. ये वही वाले जिंदल हैं जिनके बिजली कारखाने पर राजस्थान में विवाद चला लेकिन हिंसक प्रदर्शन न होने के कारण विरोध हुआ और चुपचाप खत्म भी हो गया. इनका नाम है सज्जन जिंदल. सालबोनी प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने जिस 5000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है वह वनक्षेत्र है. इसी वन क्षेत्र में से 500 एकड़ जमीन सज्जन जिंदल को दी गयी है. नंदीग्राम और सिंगूर में असफल होने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार भी सालबोनी प्रोजेक्ट को असफल होते हुए नहीं देखना चाहती है. सज्जन जिंदल ने वादा किया है कि वे यहां 35,000 करोड़ रूपये का निवेश करेंगे. स्टील फैक्टरी कई चरणों में तैयार होगी और 2020 में पूरा होने पर एक करोड़ टन सालाना स्टील का उत्पादन करेगी.
लालगढ़ में सरकार किसी आदिवासी के लिए नहीं लड़ रही है. वह सज्जन जिंदल के लिए लड़ रही है. भारत में कंपनियों और कारपोरेट घरानों का प्रभुत्व कितना बढ़ गया है यह लालगढ़ की लड़ाई से साफ समझ में आता है. अब इस देश की सरकारें अपने ही नागरिकों के खिलाफ हथियार का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि उसे किसी कंपनी को फायदा पहुंचाना होता है और बहाना बनाया जाता है कि वह देश की आंतरिक हिंसा को समाप्त कर रही है. क्या कभी सरकार यह विचार करेगी कि जिस सज्जन जिंदल के लिए चिदबंरम साहब लालगढ़ में लड़ रहे हैं असल समस्या के मूल में ऐसे ही कारपोरेट घराने हैं जो साजिश के तहत देश की भूसंपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहते है.
सज्जन जिंदल के साथ पिछले साल 2 नवंबर 2008 को केन्द्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान और प्रदेश के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य शिलान्यास करने गये थे. शिलान्यास करके वापस लौट रहे थे तो आदिवासियों ने उनके ऊपर हमला बोल दिया. इसके बाद लगातार वहां आदिवासियों का उत्पीड़न किया गया और नंदीग्राम तथा सिंगूर में परास्त हुई मार्क्सवादी सरकार ने हर संभव कोशिश की कि लालगढ़ को किसी भी सूरत में हाथ से बाहर न जाने दें. सिंगूर और नंदीग्राम में विजेता बनकर उभरे माओवादियों ने एक बार फिर लालगढ़ को अपना अड्डा बना लिया. लेकिन यहां माओवादी थोड़ा सा चूक गये. वे वहां भले ही बुद्धदेव भट्टाचार्य से लड़ रहे हो लेकिन दिल्ली में वे सज्जन जिंदल से नहीं लड़ सकते. सज्जन जिंदल के एक भाई नवीन जिंदल कांग्रेस के चर्चित नेताओं में हैं और खुद सज्जन जिंदल पहुंच वाले व्यापारी हैं. उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि राज्य सरकार के भरोसे माओवादियों से नहीं निपटा जा सकता इसलिए हो सकता है उन्होंने अपनी सारी पहुंच और क्षमता का इस्तेमाल किया और पहले माओवादियों के खिलाफ केन्द्र सरकार की ओर से अर्धसैनिक बल वहां पहुंचे और आखिर में माओवादियों को प्रतिबंधित ही कर दिया गया. ऐसा करना सज्जन जिंदल और केन्द्र सरकार दोनों के लिए ही फायदेमंद सौदा था.
लालगढ़ के जिस जिन्दल स्टील वर्क्स को लेकर सारा विवाद पैदा हुआ है वह भी गुपचुप रची गयी साजिश जैसा लगता है. जिंदल स्टील वर्क्स के सालबोनी प्रोजेक्ट को एसईजेड घोषित होने से पहले दो साल लगातार जिंदल स्टील और अचानक ही 24 अगस्त 2008 को जिंदल स्टील के इस प्रोजेक्ट को एसईजेड का दर्जा दे दिया. इसके बाद जिंदल स्टील की ओर से सरकार ने जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. सिंगूर और नंदीग्राम की तर्ज पर यहां भी कॉडर ने सरकार के लिए लड़ने का जिम्मा संभाला. जमीन अधिग्रहण के लिए आदिवासियों को प्रति एकड़ तीन लाख रूपये देने का वचन दिया गया. डेढ़ लाख रूपये कैश में बाकी कंपनी के शेयर के रूप. इससे बड़ा मजाक कुछ हो सकता है कि जो आदिवासी 10 और हजार रूपये के नोट में फर्क भी न कर पाते हों उन्हें मुंबई स्टाक एक्चेन्ज में लिस्टेड किसी कंपनी का शेयर जारी किया जाए? साफ है इरादा बाकी के डेढ़ लाख डकार जाने का ही है.
लालगढ़ की लड़ाई से साफ है कि सरकार माओवादियों से लोगों के लिए नहीं बल्कि सज्जन जिंदल के लड़ रही है. खबरें भी वहीं आ रही हैं जो कारपोरेट घरानों के पैरोकार मीडिया लाना चाहते हैं. लालगढ़ उस तरह से आतंकग्रस्त भी नहीं जैसा मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है. एक एक गांव मुक्त कराने की खबर ऐसे प्रचारित की जा रही है मानों पड़ोसी देश से युद्ध चल रहा है. लेकिन हकीकत यह है कि लालगढ़ से जो हिंसा की खबरें आयी हैं वे सीपीएम और माओवादियों के बीच हुई हिंसा की खबरें हैं. सीपीएम काडर एक बार फिर राज्य सरकार के इशारे पर माओवादियों से लड़ रहा है. विदेशी न्यूज एजंसियों का दावा है कि लालगढ़ में कोई 2000 माओवादी सक्रिय हैं जिनमें से अधिकांश झारखण्ड के चाईबासा से प्रशिक्षण लेकर लड़ने के लिए आये हैं. माओवादियों का विस्तार, उनके हथियार और उनकी हिंसा दूसरी तरफ लेकिन असल सवाल तो यही है कि केन्द्रीय गृहमंत्री वहां किसके लिए लड़ रहे हैं? आदिवासियों के लिए या फिर सज्जन जिंदल के लिए? और अगर आदिवासियों की हक की लड़ाई हिंसा है तो सज्जन जिंदल द्वारा आदिवासियों के हक पर डाका कौन सी अहिंसा है? अगर माओवादियों पर प्रतिबंध लगाना तर्कसंगत है तो फिर सज्जन जिंदल पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगना चाहिए जो असल में इस समस्या के मूल में हैं.
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