लिब्राहन आयोग पर ही सवाल उठाने की जरूरत
6 दिसंबर 1992 को विवादित बाबरी ढांचे के विध्वंस के दस दिन बाद 16 दिसंबर को लिब्राहन आयोग का गठन हुआ था. भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके आयोग के गठन की घोषणा की थी जिसका काम यह पता लगाना था कि बाबरी ढांचे के विध्वंस के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं. वे कौन लोग हैं जिन्होंने ढांचा गिराने की साजिस रची. आयोग को काम करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया.
लेकिन आयोग ने एक दो बार नहीं पूरे 48 बार एक्सटेंशन लिया. तीन महीने की जांच-पड़ताल का काम 17 साल में फैल गया और अब जस्टिस लिब्राहन ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी है. जस्टिस लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है इसलिए अभी उनके किसी निष्कर्ष को सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता लेकिन जस्टिस लिब्राहन के काम काज की समीक्षा जरूर होनी चाहिए.
जो लोग निजी तौर पर लिब्राहन को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि वे एक ईमानदार व्यक्ति हैं. उन्हें जानने वाले लोग यह भी जानते होंगे कि उन्हें आयोग का कामकाज किसकी सिफारिश पर सौंपा गया था. उन दिनों नरेश चंद्रा पीवी नरसिंहराव के सलाहकार थे. जस्टिस लिब्राहन के नाम की सिफारिश नरेश चंद्रा ने ही किया था. जस्टिस लिब्राहन की आयोग के कामकाज में कितनी दिलचस्पी रही होगी इसका अंदाज इसी से लग जाता है कि तीन महीने के आयोग के काम को पूरा करने में उन्होंने सत्रह साल लगा दिये. इस दौरान उन्होंने कोई 100 लोगों के बयान दर्ज किये. आज लिब्राहन कह रहे हैं कि गवाहों ने सहयोग नहीं किया इसलिए रिपोर्ट तैयार होने में देर हुई लेकिन सरकारी काम काज का कखग भी जाननेवाला इस बात से इत्तेफाक नहीं रखेगा. ऐसे किसी भी आयोग के पास इतने अधिकार होते हैं कि जिनका उपयोग करके वह किसी को भी गवाही के लिए बुला सकता है. 8 बी के तहत नोटिस देकर वह जब जिसे चाहे गवाही के लिए कटघरे में खड़ा कर सकता है. इसलिए लिब्राहन के इस बहाने का कोई मतलब नहीं है कि गवाहों ने उनके साथ सहयोग नहीं किया इसलिए रिपोर्ट आने में देर हो गयी.
लिब्राहन जिस घटना की जांच कर रहे थे वह कोई छोटी मोटी घटना नहीं थी. भारतीय राजनीति में यह घटना एक घुमाव साबित हुई है. इसलिए लिब्राहन की रिपोर्ट का बहुत मतलब था. लेकिन तब जब यह समय रहते आ जाती. सत्रह साल बाद जब उस घटना से जुड़े अधिकांश पहलू बंद हो चुके हैं लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का कोई बहुत मतलब नहीं रह जाता. आज अपनी रिपोर्ट में अगर लिब्राहन किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस घटना के लिए षण्यंत्र का दोषी मानते भी हैं तो क्या होगा? जितने लोगों की गवाही इस आयोग के सामने हुई है उनमें से अधिकांश लोगों पर रायबरेली की कोर्ट में मुकदमा पहले से ही चल रहा है. सरकार किसी एक घटना में एक ही व्यक्ति पर दो मुकदमें नहीं चला सकती. रायबरेली की अदालत से कोई फैसला आने के बाद ही उस पर आगे की कार्रवाई तय होगी. इसलिए एक आयोग का गठन हुआ था और उसने अपनी रिपोर्ट दे दी यहां तक तो इसका मतलब है लेकिन इससे अधिक इस रिपोर्ट का कोई कानूनी मतलब नहीं रह गया है जिसका न्याय प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सके, हां लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट को अदालत सुझाव के तौर पर जरूर इस्तेमाल कर सकती है.
जैन आयोग राजीव गांधी हत्याकाण्ड की जांच कर रहा था. उसने भी इसी तरह से काम किया. पड़ताल करने में उसने आठ साल लगा दिये लेकिन जब रिपोर्ट आयी तो नतीजा क्या निकला? ठीक यही इस रिपोर्ट का भी हश्र होगा. सिर्फ राजनीतिक हो हल्ला से अधिक लिब्राहन आयोग की रपट का कोई मतलब नहीं रह गया है. अगर यह आयोग तय समय पर अपना काम करके रिपोर्ट सौंप देता तो शायद इसका बहुत व्यापक और दूरगामी असर होता. अब इस रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं रह गया है. राजनीति बदल गयी है और अब बाबरी ढांचे का गिराया जाना भी कोई रहस्य नहीं बचा है, जिसके लिए इस रिपोर्ट की कोई प्रासंगिकता हो.
हां, यह जरूर है कि इस रिपोर्ट के राजनीतिक निहितार्थ जरूर निकाले जाएंगे. राजनीतिक बयानबाजियां और भाषण होंगे तथा कांग्रेस इस रिपोर्ट का भरपूर राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती है. सबसे पहली संभावना तो यही है कि इस रिपोर्ट में कम से कम दो लोग दोषी करार दिये जा सकते हैं. एक हैं कल्याण सिंह और दूसरे विनय कटियार. कल्याण सिंह आज अगर भाजपा में होते तो शायद उनके ऊपर भी दोषारोपण न किया जाता लेकिन वे सपा में हैं. और सपा में जाने के बाद से ही वे सपा के परंपरागत वोट बैंक के लिए संकट बन गये हैं. मुसलमान सपा से दूर भाग रहा है. ऐसे में अगर लिब्राहन आयोग कल्याण सिंह को दोषी ठहराती है तो इसका सीधा नुकसान सपा को और सीधा फायदा कांग्रेस को होगा. जबकि विनय कटियार ने आयोग के कामकाज का ही मजाक उड़ाया था. अपनी गवाही के दौरान उन्होंने लिब्राहन आयोग को कोई भाव नहीं दिया था. जाहिर है, लिब्राहन जिस तरह के व्यक्ति हैं उसका सीधा असर रिपोर्ट पर दिखाई देगा. इस बात की पूरी संभावना है कि ठोस सबूत के अभाव में आयोग भाजपा के शीर्ष नेताओं को पूरी तरह से बरी कर दे. क्योंकि अपनी गवाही के दौरान लालकृष्ण आडवाणी ने आयोग के सामने माना था कि जिस दिन ढांचा गिरा वह उनके जीवन का सबसे काला दिन था. इसलिए इतना तो तय है कि ढांचा गिराने की साजिश से कम से आडवाणी को मुक्त किया जा सकता है.
आयोग की इस देर से आयी रिपोर्ट का जहां कांग्रेस को सीधा राजनीतिक फायदा मिलेगा वहीं भाजपा को इस रिपोर्ट से अब न कोई नुकसान होगा और न फायदा. रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण एक जो शक्ति बनी थी वह पूरी तरह से बिखर चुकी है. अब वह वर्ग ही नहीं बचा जो किसी के दोषी या निर्दोष ठहराये जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा. 1992 के बाद से राजनीति की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है. लिब्राहन अगर समय रहते यह रिपोर्ट सौंप देते तो भारतीय राजनीति पर इसका व्यापक असर होता. सत्रह साल बाद यह रिपोर्ट एक गैर जरूरी कवायद से अधिक कुछ नहीं है. अगर सरकार ईमानदार है तो वह एक और जांच आयोग बैठाये जो सिर्फ लिब्राहन आयोग की जांच करे और पता लगाये कि आखिर इतने संवेदनशील मुद्दे पर बने आयोग ने काम काज में इतनी ढिलाई क्यों की? जब सारी गवाही 3 जून 2005 को ही पूरी हो गयी थी तो जस्टिस लिब्राहन किस दिन का इंतजार कर रहे थे? फिर अगर आयोग का गठन गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन से हुआ था तो रिपोर्ट उन्होने प्रधानमंत्री को क्यों सौंपी? क्या अब कांग्रेस इसका राजनीतिक उपयोग करना चाहती है? संकट यह है कि 'मजबूत विपक्ष' भी अपने आप में इतना उलझा हुआ है कि उसे इन सवालों को उठाने की फुर्सत नहीं है.
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- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
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यही नहीं करीब हर आयोग सवाल के घेरे में ही रहा है . उसके राजनैतिक निहितार्थ रहे हैं .
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