अंग्रेजों के इस कानून को मत हटाइये
समलैंगिकता का समर्थन करने वालों के लिए यह एक बड़ी एवं सुखद घटना है कि भारत की न्याययिक व्यवस्था ने अप्राकृतिक यौन संबधों पर कानून की मोहर लगा दी है। अब शायद भारत सरकार को भी इसके आड़े आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करने में कुछ राहत मिल सकती है। अंग्रेजी शासन के दौरान 1860 में धारा 377 को लागू कर ऐसे किसी भी संबध को अनैतिक एवं गैर कानूनी घोषित कर दिया था। आश्चर्य देखिए कि अंग्रेजों के बनाये बहुत सारे कानूनों से हम आज भी पीछा नहीं छुड़ाना चाहते लेकिन जिस एक कानून की वजह से भारत में यौन भ्रष्टाचार पर कानूनी रोक लगी हुई थी उसे दबाव डालकर खत्म करवाने की कोशिश हो रही है.
हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आने से पूर्व ही केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने धारा 377 को समाप्त करने के संकेत दिये थे। यह धारा एक ही लिंग के दो व्यक्तियों के बीच यौन सबंध बनाये जाने को अप्राकृतिक मानती है। भारतीय समाज आज तक ऐसे सबंधों को नकारता आया है। समलैंगिता से संतान उत्पति नही हो सकती इसलिए इसे अप्राकृतिक और विकृत सेक्स कहा गया है।
दुनियॉ की उत्पति से लेकर आज तक समलैंगिता को सामाजिक मान्यता नही मिल पायी है। दुनिया के तमाम बड़े धर्मों में इस तरह के अप्राकृतिक संबधों को गलत ठहराया गया है। ईसाइयत एवं इस्लाम इसके घोर विरोधी है। (परन्तु आजकल चर्च के स्वर इसके विरोध में धीमे पड़ते जा रहे है) हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति इसे पारिवारिक व्यवस्था के विरुद्ध मानते है। उन्हें डर है कि इसको बढ़ावा देने से मजबूत सामाजिक ढांचा बिखर सकता है। फ्रांस, इटली, रुस, इंग्लैड, जर्मनी और डैनमार्क में इसे कानूनी मान्यता हासिल है। पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारत सरकार इसे कानूनी मान्यता देने के लिए ताना-बाना बुन रही है। इसके पहले महाराष्ट्र सरकार ने लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी दी थी लेकिन भारतीय समाज आज भी इसे स्वीकार नही करता क्योंकि हमारे यहा `विवाह´ जैसी पवित्र संस्था हजारों सालों से सुचारु रुप से अपना काम कर रही है।
भारत में सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने, सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने, पश्चिमी संस्कृति को थोपने की रणनीति बेहद योजनाबद्ध तरीके से की जा रही है। दीपा मेहता की `फायर´ फिल्म को याद करें, औरतों से जुड़ी समास्याओं के नाम पर यौन विकृति का भौडा प्रदर्शन किया गया। पब संस्कृति एवं वेलेंटाइन डे को जिस तरह महिमा-मंडित किया जा रहा है। उसके पीछे छिपे एजेंडे को समझने की जरुरत है। वेलेंटाइन जैसे त्यौहार की जड़े यूरोप और अमरीका के बाहर किसी भी पूर्वी या मध्य एशियाई समाज में कभी भी नही रही है। पब संस्कृति एवं वेलेंटाइन से भारतीय संस्कृति को कोई नुकसान नही होगा ऐसा सोचना अपने आप को धोखा देने के समान है। हमारे युवा वर्ग को आने वाले समय में इसका घातक परिणाम झेलना पड़ सकता है। इस तरह की संस्कृति को अपनाने से पारिवारिक संरचना कमजोर पड़ने लगी है इसी का परिणाम है कि युवा वर्ग अपराधिक प्रवति की और बड़ रहा है। जिनके पास इस संस्कृति को अपनाने के लिए संसाधन नही है वह इसे पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है और जिनके पास संसाधन है वह इसके बल पर नाईट क्लब और फाइव स्टार संस्कृति में बह जाने को तैयार है।
लेकिन आज चरित्रहीनता के खुले प्रदर्शन को एक वर्ग व्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहराने में लगा है। पश्चिम के कचरे को भी वह अपने घर में सजा कर अपने को धन्य मानता है। समलैंगिता पर भी यही तर्क दिया जा रहा है कि जब वह पश्चिम में जायज है तो अपने यहा नाजायज क्यों हो। हो सकता है कि कल को इसे वेश्यावृति का दर्जा देने की भी मांग उठ खड़ी हो क्योंकि पश्चिम के कई देशों में यहा धंधा करोड़ों डालर का है। भारत में गोवा जैसे राज्य में विदेशी सैलानियों के अप्राकृतिक यौन शोषण का शिकार बच्चे होते रहे है और इस तरह की खबरे समाचारपत्रों एवं समाचार चैनलों पर प्रसारित होती रही है।
पर हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय समाज में आज भी कुछ शर्म बाकी है हमारे यहा पारिवारिक ईकाई इतनी मजबूत है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने से बड़ों एवं छोटों के रिश्तों का पूरा ख्याल रखता है। इस पारिवारिक ईकाई को बचाये रखने के लिए हमें पश्चिम से आने वाले कचरे का विरोध करने में शर्म नही करनी चाहिए। लेकिन यह विरोध जनमानस को इसके खतरों से अवगत करा कर किया जाना चाहिए।
जहां तक समलैंगिकों के अधिकारों का सवाल है तो उसके बारे में जरूर विचार किया जाना चाहिए. लेकिन यह विचार किसी अनैतिक कर्म को कानूनी जामा पहनाकर नहीं किया जा सकता. असल में मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि समलैंगिक संबंध एक प्रकार का मनोरोग है और ऐसे संबंध रखनेवाले लोगों का मानसिक उपचार करके उन्हें जीवन की मुख्यधारा में ले आना चाहिए न कि ऐसे लोगों को कानूनी संरक्षण देने एक या रोग को और बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए.
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- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
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