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फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!

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चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है।

क्योंकि इससे मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की उन शक्तियों का भी हुआ है जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित भी किया है। प्रमोद रंजन का यह भी निष्कर्ष है कि काले धन से खबरों के पैकेज बेचने-खरीदने से कुछ नहीं होता क्योंकि वोट देने वाली जनता समझ गयी है कि इन अखबारों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। काले धन से इन अखबारों में खबरें छपवाने वाले अक्सर हार जाते हैं। लेकिन जो लोग जाति धर्म और मित्र धर्म निबाहते हुए विश्वास का धंधा कर रहे हैं वे ज्यादा बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि वे दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों को अपमानित, उपेक्षित और दिग्भ्रमित करते हैं। अब पैकेज के काले धंधे को इनने बुरा मान लिया है, इसलिए इसे अपना समर्थन मान कर मुझे संतोष कर लेना चाहिए। लेकिन इससे भी बुरा इनने पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म को बताया है। और उदाहरण के नाम पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश और पत्रकार-लेखक सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी को उद्धृत किया है। हरिवंश कोई पैंतीस साल से मेरे मित्र हैं और सुरेंद्र किशोर ने जनसत्ता की शुरुआत से रिटायर होने तक एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार की तरह काम किया है। इसलिए आइए पहले पत्रकारिता में जाति और मित्र धर्म और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद को लें।

हरिवंश जेपी आंदोलन से कुछ पहले से मेरे मित्र हैं। बांका उनका मेरे साथ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। बीसियों सभाओं-सम्मेलनों, आंदोलनों और संघर्षों में वे मेरे साथ गये हैं। उनकी सोहबत मुझे प्रिय और महत्त्वपूर्ण लगती है। जो वरिष्ठ पत्रकार दिग्विजय सिंह का मीडिया प्रबंधन कर रहे थे, वे हम दोनों के मित्र हैं। उनने डायरी भी लिखी है, यह मुझे दिल्ली में पता चला जब मैं अपने अभियान के लिए सामग्री और सबूत जुटा रहा था। बांका अकेली जगह नहीं थी, जहां मैं इस चुनाव के दौरान गया। हिंदी इलाके के हर राज्य में पत्रकारों से बात करके मैंने सामग्री ली। हरिवंश अपना लेख खबरों का धंधा पहले छब्बीस मार्च को ही लिख चुके थे, जिसकी आखिरी लाइन थी – विज्ञापन और खबरें दो चीजें हैं। जिन चीजों के साथ स्पांसर्ड, प्रायोजित, पीके मार्केटिंग मीडिया इनिशियेटिव लिखा होगा वे विज्ञापन होंगे। हम खबर की शकल में विज्ञापन नहीं छापेंगे। हरिवंश ने यह एक लेख ही नहीं, दो और लेख, एक पाठक का पत्र भी पहले पेज पर छापा। उनने चुनाव कवरेज की अपनी आचार संहिता भी खूब बड़ी छापी। इसमें नाम-पता देकर पाठकों से कहा कि इसका उल्लंघन हो रहा हो तो तत्काल शिकायत कीजिए। चुनाव के बाद 11 मई को उनने फिर खबरों का धंधा-2 फिर पाठकों के द्वार शीर्षक से लेख लिखा, जिसमें एक पाठक की शिकायत को अपने पूरे कवरेज और आचरण से जांचा। किसी भी हिंदी अखबार ने न ऐसा अभियान चलाया न पाठकों के सामने ऐसी जवाबदेही दिखायी।

लेकिन नयनसुख प्रमोद रंजन को न यह दिखा और न इस पर उनने विश्वास किया। क्यों? (यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी) अभी यही कि प्रथम प्रवक्ता के सोलह जुलाई के अंक में उस पत्रिका के झारखंड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है प्रभात खबर में भी खबरें उसी की ज्यादा छपीं जिसने विज्ञापन ज्यादा दिया। वहां अघोषित नियम बनाया गया कि जो पैसा देगा उसको कवरेज मिलेगा। प्रमोद रंजन को ये दो लाइनें प्रभात खबर के तीन महीने के कवरेज अभियान और पाठकों से खुली जवाबदेही को सिरे से खारिज करती क्यों लगती हैं। इसका भी जवाब दूंगा तो दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की बड़ी क्षति होगी। इसलिए फिलहाल सिर्फ मित्र धर्म पर।

प्रथम प्रवक्ता का वह अंक जिसे प्रमोद रंजन ने मेरे निर्देशन में निकला कहा है उसकी पैकेज वाली सारी सामग्री राम बहादुर राय ने मेरे पास भेजी। उसी के आधार पर इस पत्रिका में मैंने लेख लिखा और उस पूरी सामग्री को मैंने संपादित किया। झारखंड ब्यूरो की रपट की वे दो लाइनें मेरी जानकारी और लिखे के विरुद्ध थीं। उनको न तो सबूत और पदार्थ के साथ पुष्ट किया गया था, न उनका विश्लेषण। मैं जो प्रमोद रंजन के कहे मित्र धर्म निबाहता हूं – मैंने ही वे लाइनें संपादित करके बाहर क्यों नहीं कीं? क्योंकि मैं स्वभाव से संवाददाता पर भरोसा और अपने से भिन्न राय की कदर करता हूं। और मेरा मित्र धर्म तो ठीक है, प्रथम प्रवक्ता के संपादक राम बहादुर राय तो हरिवंश के और भी गहरे और पुराने मित्र हैं। अपनी पत्रिका में उनने ये दो लाइनें क्यों जाने दीं? मित्र धर्म क्यों नहीं निभाया?

यह तो खुली प्रमोद रंजन के मित्र धर्म के आरोप से तात्कालिक संदर्भ की पोल। यह भी झूठ है कि सभी अखबार मीडिया इनिशिएटिव लिख रहे थे। मैंने इन अखबारों की जो प्रतियां प्रेस परिषद को जांच के लिए दी हैं उनमें कुछ भी नहीं लिखा है। और ऐसे इनिशिएटिव के बारे में क्या सोचता हूं, वह भी एक लेख में लिख चुका हूं। मैंने एक नहीं चार लेख लिखे हैं। पर छोड़िए तात्कालिक संदर्भ। मैं लगभग पचास साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। कम से कम पांच प्रधानमंत्री मेरे बड़े मित्र थे। चंद्रशेखर सबसे बड़े और पुराने, फिर अटल बिहारी वाजपेयी, फिर नरसिंह राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनके खिलाफ मैंने क्या-क्या और क्या नहीं लिखा है। दर्जन भर मुख्यमंत्रियों से मेरी बड़ी मित्रता रही। उन पर जो लिखा, वह भी सब छपा है। अपनी रतौंध दूर करना चाहें तो पच्चीस साल की जनसत्ता की फाइलें दफ्तर में मौजूद हैं। और यह भी ख्याल रखें कि अखबार मित्र की प्रशंसा और आलोचना के लिए ही नहीं होते। उनका एक व्यापक सामाजिक धर्म भी होता है। वह दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों का भी आकलन मांगता है और जिसकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। लेकिन वह भी बाद में।

अभी अपन ब्राह्मणवाद देख लें। जनसत्ता की पहली टीम में एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे क्योंकि अच्छेलाल प्रजापति भी उसी प्रक्रिया से जनसत्ता में आये थे, जिससे बाकी थे।
जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया। सिवाय बनवारी के मैं किसी को भी पहले से जानता नहीं था। बहुत सी अर्जियां आयी थीं। उनमें सैकड़ों छांटी गयीं। कई दिनों तक लिखित परीक्षाएं चलीं – घंटों लंबी। वे बाहर के जानकारों से जंचवायी गयीं। उसके अनुसार बनी मेरिट लिस्ट के प्रत्याशियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।

हम चुनाव नहीं लड़ रहे थे, जो जाति के वोटों का ख्याल रखते। मंत्रिमंडल नहीं बना रहे थे जो सबको प्रतिनिधित्व देते। हम नया अखबार निकालने की ऐसी टीम बना रहे थे – जो हलकी हो, फुर्ती से लग और बदल सकती हो और अपने भविष्य के साथ अखबार बना सकती हो। कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।

जिस भाषा में से जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे वैसे ही तो रखे जाएंगे। महिला है इसलिए रख लो तो अखबार की टीम कैसे बनेगी? एक्सप्रेस की सब महिलाओं में राधिका राय खास थीं। उन्हें रात की शिफ्ट और अखबार निकालना पसंद था। मैंने संपादक और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन हैं। उनके यहां भी हिंदी में कम और अंग्रेजी में ज्यादा महिलाएं हैं।

मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारवाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है। चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं। और नंदीग्राम और सिंगूर के बाद वामपंथी किस नैतिक और वैचारिक समर्थन के हकदार हैं?

दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों के सरोकारों की दुहाई देकर खबरों के बेचने के काले धंधे को माफ करना चाहते हो? देखते नहीं कि यह बनिये की ब्राह्मण पर जातिवादी विजय भर नहीं है जिस पर प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं। यह भ्रष्ट राजनेताओं और पत्रकारिता को काली कमाई का धंधा बनाने वाले मीडिया मालिकों की मिलीभगत है। सबसे ज्यादा यह भ्रष्ट राजनेताओं के हित में है कि मीडिया अपनी तटस्थता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता के बजाय दो नंबर की कमाई की रक्षा करे। पैसा फेंक खबर छपवा। ऐसा मीडिया लोकतंत्र को बचा नहीं सकेगा। दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की जरखरीद लोकतंत्र में कोई पूछ होगी? यह समझ न आता हो तो अब आओ! कहो कि यह ब्राह्मणवादी प्रभाष जोशी – सती समर्थक, दलित, पिछड़ा, महिला और मुसलमान विरोधी है। अपन इसका भी जवाब देंगे। लेकिन खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!

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शेष नारायण सिंह on 06 September, 2009 14:29;09
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प्रभाष जी ने बहस को फिर लाइन पर लाने की चुनौती अखाडे में फ़ेंक दी है.उन्हें ब्राहमण वादी कह देने से मुख्य मुद्दे दाबेंगें नहीं.भाइयों को चाहिए की गाली की भाषा छोड़ कर उनके तर्कों का जवाब दें. लगता है झुंड बना कर अपने ऊपर हमला करने वालों के हाहाकार को वे एक सियाह रात मानते हैं जसके बाद सचाई का उजाला होगा.एक शेर है..........सुतूने-दार पर रखते चलो सरों के चिराग , जहां तक ये सितम की सियाह रात चले...

प्रभाष जी के बारे में एक दूसरा शेर भी है गोलबंद भाइयो ,


तूफ़ान कर रहा था मेरे अज्म का तवाफ़, दुनिया समझ रही थी कश्ती भंवर में है.


यह उनके अज्म का तवाफ़ है . आप भी इसे सलाम करो
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संजय तिवारी on 06 September, 2009 14:42;53
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प्रभाष जी का यह लेख पढ़कर बड़ा दुख हो रहा है.

थोड़े दिनों पहले वसुंधरा (गाजियाबाद) में उनसे मुलाकात हुई थी. उन्होंने पूछा कि तुम लोगों का अभियान कैसा चल रहा है? मैंने पूछा कौन सा अभियान? उन्होंने मीडिया में पैसे के लेन देन से जुड़ी जिन खबरों को तुम लोग लोगों तक पहुंचा रहे हो उसको रोकना मत. फिर उन्होंने कहा कि हो सके तो एक पीआईएल की तैयारी करो. मैंने संबंधित लोगों से बात की लेकिन अभी तक तो बात नहीं बनी है.

कहने का मतलब प्रभाष जोशी मीडिया को मंडी बनते हुए देखकर दुखी नहीं पीड़ित हैं. लेकिन प्रभाष जोशी की इस पीड़ा में किसी ने हाथ बंटाने की जहमत नहीं उठाई न उठा रहा है.

प्रभाष जोशी ने इस लेख में अपने बारे में सफाई दी है कि वे ऐसे नहीं है जैसे आप लोग समझते हैं. पत्रकारिता की पूरी पौध रोपने वाले प्रभाष जोशी को 73 साल की उम्र में आकर यह सब लिखना पड़े तो उस पौध को अपने होने पर शर्मिंदा होना चाहिए कि वे बाप की पीड़ा से अपने आप को नहीं जोड़ पा रहे हैं जिसकी कि वे पैदाइश हैं.
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Arjun Sharma on 06 September, 2009 19:30;51
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Ek pramod ranjan ko main bhi janta hoon. ve Bihar se hain va 2004 main divya himachal main hua karte the. us waqt we bhi kisi samasya main fanse the. tab unhe mitron ke sambandhon samparkon se koi hichkichahat na thi.ve mere sath kuch din rahe the.humne ek sath aasan lagaya tha,ek hi thali main bhojan kiya.tab to unhone mujhe nahin bataya ki dalit aur brahmin main kya anter hai. yadi ye wahi parmod ranjan hain to mujhe unke is naye naqab ki bahut hairat hai. yadi ve wahi nahin to apan mafi ke talabgaar hain
Arjun Sharma, Jalandhar
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अवधेश आकोदिया on 07 September, 2009 12:34;35
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मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि प्रभाष जी कहना क्‍या चाह रहे हैं। ऐसा क्‍या हो गया कि नौबत सफाई देने तक आ गई। प्रभाष जी खरे नहीं होते तो मीडिया को मंडी में तब्‍दील करने वालों की इतनी मिर्ची नहीं लगती। इतिहास गवाह है, हर अच्‍छा काम आसानी से नहीं होता। यहां तो करने वाले भी गिने-चुने लोग हैं। प्रभाष जी 'प्रथम प्रवक्‍ता' के जिस अंक की बात कर रहे हैं, उसमें मैंने भी एक स्‍टोरी लिखी थी, खुशी है कि उस अंक का संपादन प्रभाष जी ने किया था।
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अमलेन्दु उपाध्याय on 07 September, 2009 14:57;14
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प्रमोद रंजन की पुस्तक मुझे मिल तो गयी है पर मैंने पढी नहीं है.

जहाँ तक प्रभाष जी के मित्र धर्म का सवाल है तो मैं सिर्फ एक उदाहरण देना चाहूँगा हालाँकि यह पत्रकारिता के सिद्धांतो का उल्लंघन है लेकिन वक़्त का तकाजा है कहना ही पड़ेगा. प्रथम प्रवक्ता का जब मीडिया पर अंक निकला तब तक मैं प्रथम प्रवक्ता में ही था .सम्पादक रामबहादुर राय जी ने मुझे ही उस अंक का संयोजन करने की जिम्मेदारी सौपी.

मैंने प्रमोद रंजन से भी फ़ोन पर बात करके जानकारी मांगी थी की क्या उनके पास बिहार से ऐसी कोई जानकारी है की किन किन अख़बारों ने पैसे लेकर खबरें छापी हैं? तब उन्होंने एक दो उदाहरण दिए थे. लेकिन जब हमारे झारखण्ड के संवाददाता ने खबर भेजी की प्रभात खबर ने भी इस तरह की खबरें कुछ बचाकर छापी तो मैंने राय साहब से कहा की ' प्रभात खबर ने भी इस तरह का काम किया है और हमारे रिपोर्टर ने ऐसी खबर भेजी है क्या हमें इसे दे देना चाहिए?'

राय साहब ने बिना हिचके तुंरत कहा 'जब उन्होंने ऐसा किया है तो हम उसे छापेंगे वो चाहे प्रभात खबर हो या जागरण' इत्तेफाक से मैंने २४ जून को प्रवक्ता छोड़ दिया और प्रवक्ता का अंक १ जुलाइ को छपकर आया. लेकिन उसमे न तो हरिवंश जी को बख्शा गया और न प्रभात खबर को. झारखण्ड की खबर भी हूँ-बा हूँ वैसी ही लगी जैसी मैंने संपादित की थी. मैंने राय साहब से सवाल किया ही इसलिए था की मुझे मालूम था की हरिवंश जी उनके अभिन्न मित्र हैं. इसलिए मुझे नहीं लगता है की प्रमोद रंजन ने प्रभाष जी को नज़दीक से समझा है. ऐसा सिर्फ इस बिना पर कह देना की राय साहब प्रभाष जी के नज़दीकी हैं इसलिए प्रवक्ता का मीडिया पर अंक प्रभाष जी के निर्देशन में निकला सरासर गलत आरोप है अगर ऐसा है तो ज़रा पिछले एक वर्ष के प्रथम प्रवक्ता के अंक उठा के देख लें मालूम पद जाएगा की राय साहब के कालम 'यथाकाल' और प्रभाष जी के कालम 'लाग लपेट' में विचारों का कितना टकराव है. फिर राय साहब वो क्यों नहीं लिखते जो प्रभाष जी चाहते हैं मेरी नज़र में हर बात का सरलीकरण कर के यह आरोप जड़ देना की अमुक व्यक्ति ब्राह्मणवादी है गलत है.

प्रमोद रंजन अभी युवा हैं और सरोकारों की पत्रकारिता भी करते हैं लेकिन ब्रह्मण विरोध की आग में जलना उनकी दिशा को भ्रमित कर देता है. हाँ जातिवाद का विरोध करना सही है और करना भी चाहिए लेकिन आप दलितों और पिछडों का रोना रोते रहें और ब्राह्मणों को कोसते रहें दोनों साथ साथ नहीं चल सकता. मैं तमाम ब्राहमण विरोधी और दलितों पिछडों की बातें करने वालों को नज़दीक से जानता हूँ की उन्होंने किस तरह अपनी कौमों को ब्रह्मण विरोध के नाम पर बेचा है.

रही बात वाम आन्दोलन की तो मैंने भी थोडा बहुत मार्क्स को पढा मार्क्स ने किस जगह पर लिखा है की ब्राह्मणों को गाली देना साम्यवाद है? या कहाँ लिखा है की वर्ग ही वर्ण है? हिन्दुस्तान में साम्यवाद का सबसे ज़्यादा नुकसान इन दलित पिछडों की दुहाई देने वालों ने ही किया है
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prem on 07 September, 2009 21:00;26
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खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!

दिग्विजय सिंह की ओर से अनुराग चतुर्वेदी अपने इलाके में अखबारों और पत्रकारों के लिए पैकेज का डील कर रहे थे। उसी अनुराग चतुर्वेदी की डायरी प्रभाष जोशी की मौजूदा तथाकथित क्रांति का सूत्रधार बनी है।
अब जरा फच्चर मत फंसाओ, टिकोगे नहीं,जैसी भाषा में बात करने वाले प्रभाष जोशी से कोई पूछे कि खबरों के काले धंधे में लगे और उसे अंजाम देने वाले इन्हीं भ्रष्ट डीलरों के साथ मिल कर बंबई, नहीं मुंबई में उन्होंने लोक मोर्चा का गठन किया है क्या अपनी उसी क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए।
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
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अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
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सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
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मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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