वह गुजरात जिसे आप नहीं जानते
गुजरात उपचुनाव का फल देख भाजपा का मुरझाया फूल जरा सा फूला नहीं कि नरेन्द्र भाई ने एक बार फिर अपने विरोधियों को विरोध न करने के लिए चेता दिया। भाई बोले हैं कि जो लोग विरोध करते रहते हैं वो जान लें कि राज्य के लोग किनके साथ हैं। भाई और उनके जो साथी इनदिनों एक-दूजे की पीठ ठोंक रहे हैं, उनसे गुजारिश है कि भाजपा, गांधीनगर की कुण्डली भी झांके। देखें इसमें भाजपा, दिल्ली की कुंडली की तरह कहीं शनि महाराज तो नहीं विराजे हैं। दशाओं का आपसी गठजोड़ और कालचक्र के हिसाब से एक-दूजे की पीठ की जगह छाती पीटने का योग बन बैठा है।
तो राज्य के लोग किनके साथ हैं आइए बात करते हैं पहले उनकी। याने गुजरात में आबादी के ढ़ाचे और उसके भीतर सत्ता के प्रतिनिधित्व की। यहां अनुसचित जनजातियां- 7 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियां- 15 प्रतिशत, मुसलमान- 11 प्रतिशत, पिछड़े 52 प्रतिशत हैं। इसके बावजूद आबादी का इतना बड़ा हिस्सा ‘पटेल-ब्राहमण-महाजनों’ की सत्ता के सामने कहीं नहीं दिखता है। कुण्डली की पहली दशा बीते दशक से ही गृह-नक्षत्र सुधारने के संकेत दे रही है। हाल के लोकसभा चुनाव में तो इस दशा ने बीजेपी की गृह-दिशा भी बिगाड़ दी। ऐसे में साम्प्रदायिक धुव्रीकरण से पनपी अंतर विरोधों की रेल भी अब पटरी से उतरने को है।
नरेन्द्र मोदी सत्ता में ऐसे ही नहीं हैं, उनकी जड़ों में हिन्दुत्व का प्रयोग, खाद, पसीना मिला है। चलिए बात बीते तीन दशक से शुरू करते हैं, 1980 में जब आरक्षण विरोधी आंदोलन हुआ तो गुजरात के मुसलमानों ने दलितों का साथ दिया। क्योंकि 80 के दशक में यहां करीब 50 कपड़ा मिलें बंद हुई थीं। इनमें दोनों समुदायों के लोग साथ-साथ काम करते थे और छंटनी के चलते दोनों के ही दुख एक जैसे थे। लेकिन 80 के बाद से दलित-मुसलमानों की बीच न केवल दूरियां बढ़ी बल्कि यह दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने भी आ खड़े हुए। 1980, 85 में जो दंगे हुए उसमें संघ ने हिन्दू पहचान को आगे रखा और दलितों की हिन्दू पहचान को प्रचारित किया। इससे दलितों को ऐसा लगा कि उन्हें अचानक ऊपर आने का मौका मिला है। उन्हें यह भी लगा कि देर-सबेर ऐसे संबंधों का फायदा भी मिलेगा। इसी के सामानान्तर यह भी प्रचारित किया कि आदिवासी तो हिन्दू ही होते हैं। आदिवासियों को भी सांस्कृतिक तौर से मुख्यधारा के हिन्दूओं में मिलाने का प्रयास हुआ। अंतत: 2002 के दंगों में हिन्दुत्व की तोप से दलित-आदिवासियों को गोले की तरह छोड़ने का प्रयोग सफल रहा। बहरहाल बहुत समय से हिन्दुत्व के प्रयोग ढ़ीले पड़े हैं, हिन्दुत्ववादियों के तो खुद ही पसीने छूटे हुए हैं, इससे देश की तरह राज्य की राशियां प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकतीं। नरेन्द्र भाई के क्रोध से राशियों के भटकने का संयोग बलवान होगा।
नृवंश शास्त्रीय सर्वे कहता है भारत में 4,599 समुदाय हैं, 12 भाषा परिवारों की 3,25 भाषाएं और 24 लिपियां हैं। यह सच है ‘भारत विविधताओं का देश है’। यह भी सच है कि ‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य’ है। लेकिन संविधान के पार हमारा समाज उतना ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘एक’ नहीं है, जितना कि दावा किया जाता है। हकीकत यह है कि आजादी के पहले 150 सालों में इतने साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए जितने आजादी के 62 सालों में हुए। 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद से मुसलमानों ने महसूस किया कि उन्हें न्याय नहीं मिला। उसके बाद 2002 के गुजरात दंगों ने तो जैसे जता दिया कि अब उन्हें सुरक्षा ही मिल जाए तो बहुत है।
गुजरात में 1969 को जब दंगे हुए तो ‘रेड्डी जांच आयोग’ ने हिंदू महासभा और जनसंघ की भूमिका उजागर की। 1974 को नवनिर्माण आंदोलन के जरिए हिन्दुत्व को ऐतहासिक मौका दिया गया। 1975 में जनता मोर्चा सरकार में जनसंघ हिस्सेदार बना। उस समय जनसंघ ने 18 सीटें निकाली। आरक्षण विरोधी आंदोलन का समय आते-आते भाजपा लांच हुई। इस समय तक हिंदूवादी संगठनों ने दूरदराज के इलाकों तक अपनी जड़े जमा ली थीं। गुजरात में हिन्दुत्व को मजबूत बनाने के लिए 1983 में ‘गंगाजल एकात्मता यात्रा’ और 1990 में लालकृष्ण आडवानी की ‘अयोध्या रथयात्रा’ सोमनाथ से शुरू हुई। इसी के साथ मुसलमानों को लेकर समान नागरिक संहिता, कुरान पर रोक, तिरंगा फहराने, वंदे मातरम गाने, हज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी, पाकिस्तान की वफादारी, हिन्दुस्तान के साथ गद्दारी, मदरसों की पढ़ाई जैसे मुद्दे में छोड़े गए।
लेकिन 2002 के दंगों में जैसा हुआ वैसा कभी नहीं हुआ। इसमें राज्य की व्यवस्था सीधे तौर से शामिल हुई। मुख्यमंत्री साहब ने तो अधिकारियों की बैठक में साफ-साफ कह डाला था कि गुजरात के लोगों को उनकी भावनाएं व्यक्त करने दीं जाए। इसके बाद कोई रिपोर्ट बोलीं 2,000 मुसलमान मारे गए, कोई बोलीं 2,000 से ज्यादा मारे गए। किसी रिपोर्ट ने 4,00 तो किसी ने इससे भी ज्यादा मुस्लिम महिलाओं से बालात्कार की बात मानी। ज्यादातर रिपोर्ट में कम से कम 6,00 के ऊपर धार्मिक स्थान ढ़हाये गए, करोड़ों की संपत्ति लूटी, लाखों मुसलमान विस्थापित हुए। आज भी अहमदाबाद, सूरत के हिस्सों में ‘हिन्दू राष्ट्र में आपका स्वागत है’ जैसे बोर्ड को लगा देखकर हेरत होती है। उससे भी खतरनाक तो वह संदेश होता है जो बोर्ड में नहीं होता है कि ‘हमें दंगे के बाद कोई पछतावा नहीं’। गुजरात में ‘मोदी की जीत’ से लंबी सूची तो ‘मुसलमानों के फर्जी मुठभेड़’ की है। उन्होंने इतना अंधेर किया कि देर से ही सही अब उन्हें भरने का समय नजदीक है। केसों की तादाद, उनकी गति और दिशाओं से लगता है कि मोदी के सितारे कभी भी डूब सकते हैं। जानकार जानते है कि उपचुनाव का नतीजा तो दीपक की बुझती लौ है। ऐसी दशा में राजनीति का मामूली पण्डित भी यह भविष्यवाणी कर सकता है कि भाजपा का ढ़लता सूरज कहीं और से नहीं गांधीनगर से ही ढ़लने वाला है।
और अब थोड़ा राजकाज की बातें, 2002 के दंगों के बाद सत्ता में नरेन्द्र मोदी तो मजबूत हुए मगर महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में जैसे महत्वपूर्ण जनांदोलन हुए वैसे आंदोलन गुजरात में नहीं देखें गए। देश के बाकी हिस्सों में जो प्रयास हुए वो यहां के आदिवासियों के हिस्से में नहीं आए। दक्षिण गुजरात के उकाई बांध से विस्थापितों को कुछ हासिल न हो सका। यहां के आदिवासी सूरत पहुंचे तो यहां की झोपड़पट्टी वाले कहलाए। फिलहाल इन्हें यहां से भी उजाड़ा जा रहा है। पहले की सरकारें भूमिहीनों को प्राकृतिक संसाधन देती थीं, घर और सहकारी मंडलों के लिए जमीन देती थीं। मोदी के राज में सब बंद है। दूसरे राज्यों में तो लड़-लड़कर जंगल पर आक्रमण और वन-विभाग के शोषण से मुक्ति मिली मगर मुक्ति की ऐसे लहरों से गुजरात बेदखल रहा। झारखंड, पूर्वी राज्यों की तरह यहां अभी तक आदिवासियों को अपनी पहचान का राजकीय मौका नहीं मिला। बिहार और यूपी में जातिवाद का विरोध होने से लगता है वहां जातिवाद ज्यादा है, असल जातिवाद तो गुजरात में हैं। यहां तो दलित विरोध करने की हालत में भी नहीं हैं। यहां के अनेक हिस्सों में सिर पर मैला ढ़ोने का रिवाज आजतक बरकरार है। यही नहीं कला और साहित्य की प्रगतिशील धारा के रूकने से सांस्कृतिक शून्य भी समय के साथ बढ़ता गया है। रूकी हुई चीजों का फूटने की हद तक जाना मोदी के राजयोग का अंत दर्शाता है।
किसी भी राज्य के विकास को आबादी के कमजोर तबके की हालात के हिसाब से मापना चाहिए। गुजरात में मानव विकास बहुत पीछे है। मोदी सरकार का मकसद तो किसी भी कीमत पर बहुराष्ट्रीय और इन्फोटेक कंपनियों का विकास ही रहा, वह दिखता भी है। यहां मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था और राजनीति से जो अर्थ निकले हैं उनके मुताबिक (असमान) विकास अब किसी भी प्रकार की रोक-टोक के बगैर कर सकते हैं, इसमें गरीबों की कोई बिसात नहीं। पहले की सरकारें गरीबों के लिए कर्ज और सब्सिडी देती थीं। क्योंकि अब बाजारवाद में गरीबों को कर्ज या सब्सिडी देना फायदेमंद नहीं माना जाता, सो बैंकों ने हाथ ऊपर कर लिए हैं। क्योंकि राज्य के विकास में चंद खास शहरों को केन्द्र बनाया गया है, सो गांव में बेहिसाब बेकारी बढ़ी है और उसी अनुपात में पलायन भी। गुजरात में महिलाओं की पतली हालत पर खास तौर से रोशनी डालने की जरूरत है। यहां 0 से 6 साल की उम्र के बालकों में लिंग अनुपात 883:1000 है। पूरे देश में 927:1000 है। अहमदाबाद जिले का हाल यह है कि यहां मात्र 813 लड़कियां हैं।
महिलाओं की साक्षरता की दर देखें तो डांग, दाहोद, नर्मदा जैसे जिले में ही यह 35 प्रतिशत से भी कम है। जबकि यहां बालकों का लिंग अनुपात 950 है। यहां 99 प्रतिशत गर्भपात स्त्री भू्रण हत्या के कारण होते हैं। गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मजदूर काम करते हैं। इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बनासकंथा जिलों में बाल मजदूरी के मामले सबसे ज्यादा सामने आए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बाल मजदूर हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर सरकारी आंकडों को देखे तो यह संख्या 50,000 को पार कर जाती है। शहर में जो 262 प्राइमरी स्कूल हैं उनमें महापालिका के स्कूलों की संख्या 2 है। दूसरे हेरतअंगेज आकड़े के मुताबिक महापालिका के सेकेण्डरी स्कूलों की संख्या है 4। 112.27 वर्ग किलोमीटर में फैले सूरत की 29 लाख आबादी में से 6 लाख गरीब हैं। एक तो प्राइमरी स्कूलों और गरीबों के बच्चों के बीच का फासला बेहद ज्यादा है, ऐसे में जो थोड़े से बच्चे किसी तरह स्कूल जाते हैं, उनमें से भी 10 प्रतिशत बच्चे सेकेण्डरी स्कूलों तक नहीं पहुंच पाते। हालातों को मद्देनजर रखते हुए आखिरी भविष्यवाणी यह है कि गुजरात ‘गोधरा’ से ‘साबरमती’ लौटने वाला है, राज्य की पहचान ‘मोदी’ की बजाय ‘महात्मा’ बरकरार रहेगी।
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"लेकिन 2002 के दंगों में जैसा हुआ वैसा कभी नहीं हुआ। इसमें राज्य की व्यवस्था सीधे तौर से शामिल हुई। "
Kya aap 1984 ke sikh dange bhual gaye janab? Lagat hai aap ko bhi electronic medai me jaldi se jadli Naukrai ki Chahat hai.
वैसे अपने आदर्श राज्य के बारे में लिखें, हम भी देखें.
Madhya pradesh se le kar Bhihar Aur dilli me me jab Congress Power ya oppostion me thi thab unhone pachao dange karwaye.. But In most of the roits Muslims were DOMINAT and \so they were SECULAR roits so as to say. For first time in Roits Hindu became dominant thats the problem secular people like you have with Gujrat 2002
हीरे की मंडी में हारती जिंदगी
http://raviwar.com/news/200_surat-diamond-slowdown-sirish-khare.shtml
एक बस्ती का नाम था वटवा
crykedost.blogspot.com/.../blog-post_26.html
सूरत जाकर देखें, 50,000 बच्चे काम पर है..
http://www.visfot.com/index.php/jan_jeevan/1331.html
बच्चो का बड़ा बाजार गुजरात
http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=1047&Title=बच्चो%20का%20बड़ा%20बाज़ार
कोई सूरत नजर नहीं आती
http://www.mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=115&tid=975
माफिया के सामने नतमस्तक महापालिका
http://www.deshkaal.com/Details.aspx?nid=128200923258412
भू-माफिया को हराने के बावजूद हार गये विठ्ठल भाई
http://www.visfot.com/index.php/jan_jeevan/1301.html
ऐसे सूरत की कैसी सूरत ?
http://www.visfot.com/index.php/story_of_india/1265.html
मिलेनियम की चकाचौंध में 800 घर ओझल
http://newswing.com/?p=3115
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