अंतिम संस्कार के मामले में जड़ता में फंसा चर्च
2 नवम्बर को ईसाई समाज `ऑल सोल्स डे´ मना रहा है। चर्चो के पदाधिकारी इस की तैयारियों में लगे हुए है। इस दिन ईसाई समाज के लोग कब्रिस्तानों में जाकर अपने बिछड़े परिजनों की आत्मा की शांति के लिए प्रर्थाना करते है। हिन्दू समुदाय भी श्राद्व के दिनों में अपने पित्तरों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ आदि का आयोजन करता है। यह अच्छी बात है कि हम अपने पित्तरों का सम्मान करे।
भारत में ईसाई समाज के लिए अपने प्रियजनों के पार्थिव शरीरों का अंतिम संसकार करने की समस्या विकट रुप लेती जा रही है। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों के कब्रिस्तानों में मृत्कों को दफनाने के लिए जगह ही नही है। दिल्ली की सबसे बड़ी इण्डियन क्रिश्चियन सेमेट्री - पहाड़गंज, में अब जगह ही नही है हालांकि इसके बाद भी पार्थिव शरीरों को दफनाया जा रहा है। पृथ्वीराज रोड स्थित कब्रिस्तान में आम ईसाइयों के लिए जगह नही है वहां केवल उन्हीं लोगो को दफनाया जा सकता है जिन्होंने खुद या उनके अपनों ने उनके जीते जी जगह खरीद ली थी। निकल्सन कब्रिस्तान - कश्मीरी गेट को तो बंद करना पड़ा है। दिल्ली कैंट, राजपुरा रोड, बुराड़ी आदि कब्रिस्तानों में थोड़ी बहुत जगह बची है। दिल्ली ही नही देश के कई राज्यों के ईसाई अपने प्रियजनों के पार्थिव शरीरों के अंतिम संस्कार को लेकर गहन चिन्तन में है।
ईसाई कब्रिस्तानों में जगह के साथ साथ अवैध कब्जे एक बड़ी समास्या है। कहीं-कही तो चर्च पदाधिकारी ही अवैध लेन-देन करके भूमाफिया का कब्जा करवा देते है। क्योंकि अधिक्तर ईसाई कब्रिस्तान शहरों में पॉश इलाको में है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पास स्थित एक कब्रिस्तान पर पूरी कलोनी ही बस गई है। वहां मृत्कों के साथ जिंदा लोग भी रह रहे है। चर्च पदाधिकारी कब्रिस्तानों को भूमाफिया से बचाने में असहाय दिखाई देते है। और सरकार से दूसरे कब्रिस्तान की मांग करने लगते है।
ईसाई समाज के कई वर्गो के अंदर अब इस बात पर भी चर्चा होने लगी है कि दफन की जगह दाह संस्कार को धार्मिक मान्यता मिलनी चाहिए। क्योंकि एक तो दफनाने की प्रक्रिया में खर्च बहुत आता है दूसरा दिल्ली, मुंबई एवं केरल जैसे राज्यों में तो एक कब्र अलॉट करने के पचास हजार रुपयों से लेकर पॉच लाख तक वसूले जा रहे है। कब्रिस्तानों में एक ही कब्र को कई-कई बार इस्तेमाल करने से प्रदूषण फैलने का खतरा भी बढता जा रहा है। हालाकि कब्रो को दोबारा सगे-संम्बधियों के लिए ही खोला जाता है। फिर भी एक कब्र को हटाकर दूसरी कब्र बनाने के लिए बारह वर्ष का समय चाहिए क्योंकि दस से बारह वर्षों के भीतर ही शव डिस्पोज हो पाता है। सिर्फ कपाल ही अटूट रहता है। कुल मिलाकर यह समास्या गंभीर रुप लेती जा रही है। इसाइयत में पार्थिव शरीरों को दफनाने की प्रक्रिया ने एक उद्योग का रुप ले लिया है। जिससे प्रति वर्ष हजारों करोड़ रुपये कमाये जा रहे है। दफन क्रिया में आज दस हजार से लेकर पाच लाख तक का खर्च आ रहा है वही दूसरी और दाह संस्कार हजार-प्रन्द्रह सौ में ही हो जाता है। शायद इसी कारण चर्चो के पदाधिकारी लोगो को अन्य विकल्प देने को तैयार नही है। हालाकि ईसाइयत इस बारे में कुछ नही कहती कि हम अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करे या उन्हें दफनाये।
चर्च ऑफ नार्थ इंडिया, इवैंजोलिक, मैथोडिस्ट, साल्वेशन आर्मी, आर्थोडोक्स, बपटिस्ट चर्च आदि इस मुद्दे पर विचार करने के लिए थोड़ी न नुकर के बाद तैयार भी हुए लेकिन वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च इस मुद्दे पर कुछ सुनने को ही तैयार नही है। हालाकि कैथोलिक चर्च में भी इस मुद्दे पर कुछ विभाजन है उसकी कुछ शाखाए मधुमा चर्च, सीरियन और आर्थोडॉक्स की अलग-अलग राय है। फिलहाल केरल का मार्थोमाइट ही एक ऐसा चर्च है जो अपने अनुयायियों को दाह संस्कार की छूट देता है। लेकिन उसके अनुयायियों की संख्या काफी कम है।
पवित्र बाइबल में अंतिम संस्कार की मनाही नही है। इस्राएल के पहले शासक शाऊल और उसके पुत्रों का युद्व में मारे जाने पर अंतिम संस्कार ही किया गया था। इस्राएल का नेतृत्व करने और उसे मिस्र की गुलामी से अजादी दिलाने वाले `मूसा´ की कब्र का आज तक पता नही है। वर्ष 2002 में दलित ईसाई संगठन `पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट´ ने चर्च पदाधिकारियों से पार्थिव शरीरों के अंतिम संस्कार की अनुमति देने की मांग करके इस मुद्दे पर व्यापक बहस की शुरुआत की थी। लेकिन कैथोलिक चर्च के असहयोगत्मक रवैये के कारण बहस बीच में ही बंद हो गई। चर्च का तर्क है कि `ईश्वर ने मानव से कहा कि तू धूल है और तुझे धूल में मिल जाना है।´ लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो चर्च की यह थ्यौरी फिट नही है। विज्ञान कहता है कि पदार्थ न तो नश्ट होता है और न ही उसका निर्माण होता है, बस उसका रुपाकार बदलता है। इसलिए यह विचार बेमानी हो जाता है कि मानव धूल में मिले या राख बन जाए।
आज विदेशी मसीही भी अंतिम संस्कार का विकल्प चुन रहे है। अमेरिका और इंग्लैड में इसका काफी चलन है। प्रोटेस्टेंट चर्च वहा अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरित कर रहे है। परन्तु भारत में उल्टी गंगा बह रही है। जो वर्ग इस पर आम सहमति बनाने की कोशिश में है उन्हें चर्च के मठाधीशों का कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है। हालाकि यह मामला आम ईसाइयों की आस्था से जुड़ा हुआ है और इस पर आम सहमति बनाये जाने की जरुरत है और इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारो को आगे आना होगा। `पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट´ ने सरकार से अनुरोध किया था कि वह ईसाई कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कार का विकल्प लोगो को मुहैया करवाये। क्योंकि अधिक्तर कब्रिस्तान सरकारी भूमि पर ही बने हुए है। वहा विकल्प होने पर लोगो का नजरिया बदलने में मदद मिलेगी। और लगातार कब्रिस्तानों के लिए अलॉट की जाने वाली जमीन का भी सही इस्तेमाल हो सकेगा।
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