देह गयी है रूह नहीं
जिस बैठक में कोई साल भर पहले उन्होंने कहा था कि मैं कम्प्यूटर पर सर्च सीखना चाहता हूं, आज उस बैठक में उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा हुआ था. कमरे के पूर्वी छोर पर खिड़कियों के पर्दे खिसका दिये गये थे जिनसे प्रकाश पूरी ताकत से अपने आप को अंदर झोक रहा था. बाहर के वातावरण से प्रकाश अंदर दाखिल होकर एक कोफीन को दिगंदित कर रहा था. अंदर उस कोफीन के इर्द-गिर्द कुछ लोग शोकातुर बैठे थे. सब सन्न. न सांत्वना देने की हिम्मत, न ढांढस बंधाने के लिए शब्द. मानो मन के मौन से सब यह स्वीकार लेने की कोशिश कर रहे थे कि प्रभाष जोशी हमारे बीच नहीं रहे.
पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी ऐसे नहीं जाना चाहते थे. अपने भाषण में तो वे अक्सर यह बोलते ही थे कि मालवा में मरे तो सबसे अच्छा. लेकिन कागद कारे में 19 दिसंबर 1993 को उन्होंने लिखा था "मैं चाहता हूं, हरि भजन करते करते यह चादर मेरा कफन हो जाए. लेकिन दिल्ली की इस सराय में नहीं. मालवा के अपने घर में।" प्रभाष जी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. उन्होंने सराय से ही सदा सर्वदा के लिए संसार को अलविदा कह दिया. कहते हैं उनके सबसे पसंदीदा क्रिकेट के खेल ने ही उनकी जान ले ली. घर वाले रो रहे हैं और कह रहे हैं कि आखिरी वक्त तक वे स्कोर ही पूछते रहे. लेकिन प्रभाष जी की तबियत कई दिनों से खराब दी. 1992 में उनकी बाईपास सर्जरी हो चुकी थी. उसके बाद से उनके और उनके स्वास्थ्य के बीच हमेशा एक नूरा कुश्ती चलती रही. प्रभाष जी देह मर्यादा को भूलते न थे लेकिन देह के चक्रब्यूह में बंधना उन्हें स्वीकार भी नहीं था. इसलिए स्वास्थ्य को उन्होंने सदैव किनारे सरका कर रखा. कल भी यही हुआ. वे बनारस और लखनऊ की यात्रा से वापस आये तो असहज महसूस कर रहे थे. अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने गोविन्दाचार्य को बताया भी कि कुछ अच्छा नहीं लग रहा है. कायदे से दिल्ली पहुंचते ही उन्हें अपनी नियमित जांच के लिए जाना था. लेकिन वे नहीं गये. बोले- आज क्रिकेट का मैच हो जाए, कल जांच करवा लेंगे.
लेकिन वह कल कभी आया नहीं. रात के 12 बजे तेज दिल का दौरा पड़ा. अस्पताल पहुंचे तो डाक्टरों ने कहा कि प्राण पखेरू उड़ चुके हैं. इसके बाद जो कुछ हुआ वह औपचारिकता और पीछे छूट गये लोगों का अनिवार्य कर्मकाण्ड है. घर में आनेवालों का तांता लगा हुआ था. फिर थोड़ी देर के लिए उनके पार्थिव देह को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में रखा गया. जो लोग प्रभाष जी को नजदीक से जानते हैं वे जानते हैं कि गांधी शांति प्रतिष्ठान से उन्हें अतिशय लगाव था. अपना जन्मदिन भी वे उसी गांधी शांति प्रतिष्ठान में ही मनाते थे. दूसरी किसी भी जगह के लिए वे कभी तैयार नहीं होते थे. गांधी शांति प्रतिष्ठान से आगे की यात्रा मालवा के लिए शुरू हुई. मालवा के अपने घर में अपनी इच्छा के अनुसार वे देह त्याग तो नहीं कर सके लेकिन पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार मालवा के उनके गांव में ही होगा. थोड़े वक्त के बाद उनकी देह भले ही हमारे बीच से सदा सर्वदा के लिए विदा हो जाए लेकिन उनकी रूह हमेशा मौजूद रहेगी. अनहद में उनके शब्दों के नाद हमेशा गूंजते रहेंगे.
प्रभाष जी 1983 में एक कविता लिखी थी. उस कविता में उन्होंने लिखा था- चले थे जहां से हम / लौटकर वहीं / जाना तो है नहीं / घर कहां है?/ कहीं नहीं...
उनकी इसी कविता के साथ हमारा प्रभाष जी को शत् शत् नमन.
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