न हन्यते हन्यमाने शरीरे
हम प्रभाष जी के लिखे को विस्फोट पर प्रकाशित करते थे. अब हम ऐसा नहीं कर पायेंगे. 29 मई 1994 को प्रभाष जोशी ने यह कागद कारे लिखा था. अजल (मौत) के बारे में लिखते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा था- जिस बंबई अस्पताल में सिर्फ एक दिन के चेक अप के लिए भर्ती हुआ था उसमें 28 दिन लग गये. तुरत-फुरत बाईपास जैसा आपरेशन हो गया. और अपन ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे किसी गिल्टी का आपरेशन हुआ है या भांग के जहर का इलाज. यह लफ्फाजी नहीं है भाई साहब। आप चाहें तो बंबई अस्पताल की नयी विंग में ग्यारहवीं मंजिल के कमरा नंबर 64 में जाकर इस आदमी का दिलफेंक तमाशा देख सकते हैं. अपने एक शायर दोस्त ने कहा है- "अजल से वो डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं, यहां हम चार दिन की जिंदगी को क्या समझते हैं?" प्रभाष जी का ही लिखा हुआ कागद कारे उनके जाने के बाद-
छप्पन साल की उम्र हो गई लेकिन इस बन्दे को छप्पन दिन भी अस्पताल में गुजारने नहीं पड़े। पहली बार किसी अस्पताल में भरती हुआ तो पीठ में रीढ़ की हड्डी के बीचोबीच एक गांठ थी जिसमें से कभी-कभी पानी या पीब जैसी कोई चीज निकला करती थी। जब ज्यादा तकलीफ होती तो राजपाल से मरहम-पट्टी करवा लेता। बाकी कोई झंझट नहीं। लेकिन मई 85 में भगवानदास गोयनका का पुरस्कार दिल्ली में दिए गए। रामनाथजी पुरस्कार के मामले में कभी दखलन्दाजी नहीं करते थे। लेकिन उस साल जब वह पुरस्कार निर्णायकों के केसवानी को दिया तो वे बहुत खुश थे। उन्हें गर्व था कि दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसे की चेतावनी उनके हिन्दी अखबार के स्टि्रंगर ने दी थी। पुरस्कार समारोह के बाद रामनाथजी अपने इष्ट मित्रों को पकड़कर एक्सप्रैस गेस्ट हाउस ले गए। वहां एक-एक को मनुहार करके खाना खिलाया। उसी चपेट में हमारी भेनजी आ गई। पूछा कि जोशन! तेरी तबीयत क्यों गिरी-गिरी है? तो जैसा कि उनका भवानी बाबू और रामनाथजी के सामने होता था, भेनजी फूट पड़ीं।
रामनाथजी मारवाड़ी में लगातार पूछते रहे। आखिर भेनजी ने कहा कि उनकी पीठ में एक गांठ है। पस भी निकलता है। लाख कह चुकी हूं। ऑपरेशन नहीं करवाते। रामनाथजी मुझे हाल से पकड़कर लाए और अगर इतने लोग नहीं होते तो शायद पिटाई हो जाती। पूछा, क्यों भाई तुमसे छोटा-सा ऑपरेशन नहीं करवाया जाता! बड़े सम्पादक हो गए हो कि तुमसे दो दिन नहीं निकाले जाते! दूसरे दिन उन्होंने पी.सी. जैन को बुलाया और कहा, जोशन से पूछो वह अपने आदमी का ऑपरेशन कहां करवाएगी। उसने कहा - इन्दौर। रामनाथजी के निर्देश पर हम दोनों के हवाई टिकट बुक हो गए। जोशन को जाकर उन्होंने पांच हजार रुपये दिए और कहा कि कोई बात की जरूरत हो, सीधे मेरे को फोन करना। इन्दौर पहुंचे तो नरेन्द्र तिवारी नाराज। तुम लोग दिल्ली से सत्रह साल से भाड़ झोंक रहे हो। ऑपरेशन के लिए तुम्हें इन्दौर ही जगह मिली। दिल्ली-बम्बई में डॉक्टर रहते हैं कि हिजडे़? बहरहाल, सुभाष के एक सर्जन मित्र डॉक्टर वाघमारे ने देखते-देखते अपना ऑपरेशन कर दिया। दो दिन बाद अपन घर आ गए। अभी जब यहां खून की आखिरी बोतल जे.जे. अस्पताल के डॉक्टर वाघमारे की चढ़ी तो मुझे इन्दौर के डॉक्टर वाघमरे याद आ गए। लेकिन गिल्टी के उस ऑपरेशन में कुल जमा चार दिन अस्पताल में रहे। और चारों दिन हाजिरी में बैठे रहे नरेन्द्र तिवारी।
बचपन में जब पढ़ते थे तो एक मित्र हुआ करते थे जो डॉक्टरी पढ़ते थे। वे एक बार आइक्रीम खिलाने ले गए। न उन्हें मालूम न मुझे कि आइसक्रीम में क्या था। घर पहुंचे तो ऐसा लगे कि जीवन की हरी, लचीली टहनी को जिन्दगी के पेड़ से कोई कुल्हाड़ी मारकर काट रहा है। बहुत कोशिश की कि होश बनाए रखूं। जब नहीं बना तो पड़ोस की फायद ब्रिगेड की गाड़ी में एम.वाई हािस्पटल गया। उन्होंने उलटी करा-कराके एक घंटे तबीयत ठीक कर दी। और जैसा कि सरकारी अस्पतालों में होता है, वार्ड में भिजवाकर जमीन पर सुलवा दिया। दूसरे दिन कहा, आपकी छुट्टी है। `हुआ क्या था - भांग पाइजन।´ ऐसे ही छोटे-मोटे हादसे में कभी और यह सब भी तब जब शरद बाबू के उपन्यास पढ़ते हुए हम अपने आपको इन्दौर और महू के बीच अंग्रेजों के बनाए टी.बी. सेनिटोरियम में किसी के विफल प्यार में पल-पल गलते हुए देखा करते थे। देवदासों की कम-से-कम दो-तीन पीढ़ियां हुई हैं जो विफल प्रेम में अपने को नश्ट करते हुए जवानी के कर्मठ दौर से रिरियाते हुए निकल गई। जब भागलपुर पहली बार गया तो शरद बाबू की तलाश में गंगा के कछार में और बाड़ियों-बासों के चक्कर काटता रूमानियत के दिन गुजारें। पता नहीं जिस आत्मध्वंसी रूमानियत ने अपने मित्र रमेश बक्षी को नष्ट किया वह अपने को कभी पकड़ नहीं पाई। अस्पताल में होने के गंभीर वास्तविक और रूमानी अवसर अपन को कभी नसीब नहीं हुए।
इसलिए यह पिछले दस दिन से लगातार सोच रहा हूं कि जिस बम्बई अस्पताल में सिर्फ एक दिन के चैकअप के लिए भरती हुआ था उसमें 28 दिन लग गए। तुरत-फुरत बाईपास जैसा ऑपरेशन हो गया। और अपन ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे किसी गिल्टी का ऑपरेशन हुआ हो या भांग के जहर का इलाज। यह लफ्फाजी नहीं है भाई साहब! आप चाहें तो बम्बई अस्पताल की नई विंग में ग्यारहवीं मंजिल के 64 नम्बर कमरे में आकर इस आदमी का दिलफेंक तमाशा देख सकते हैं। अपने एक शायर दोस्त ने कहा है ``अजल से वो डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं। यहां हम चार दिन की जिन्दगी को क्या समझते हैं!´´ अजल के लिए, डिक्शनरी न देखनी पड़े, इसलिए हुजूर की शान में अर्ज है कि अजल मौत को कहते हैं।
इन अट्ठाइस दिनों में कितनी बार इस शर्म का अहसास हुआ कि बीमारी में भी हमारे देश में बराबरी नहीं है। सीताराम केसरी, प्रभाष जोशी और घीसाबा पटेल सबकी धमनियों में अवरोध हो जाए तो एक पहुंचेगा ह्यूस्टन, दूसरा बम्बई और तीसरा सुनवानी महाकाल की पगडंडियों से होता हुआ क्षिप्रा के किनारे अंतिम संस्कार के लिए पहुंचेगा। यह दुनिया बनाने वाले की दुनिया नहीं है। यह हमारी दुनिया है। अट्ठाइस दिनों में बार-बार यह भी सोचता हूं कि यही चिकित्सा, चिन्ता और सेवा राजेन्द्र माथुर को मिली होती तो आज वे अपना सम्पादकीय लिख रहे होते। मेरी तरह वे भी अपनी बीमारी को मामूली ऊल-चूल समझकर उसी शकरपुर के एक प्रावेट नर्सिंग हो में पहुच गए थे। उसके भी सबसे बड़े डॉक्टर ने काम्पोज की एक गोली देकर उन्हें सुला दिया था। उनके इस नर्सिंग होम में जाने के कोई दस साल पहले देर रात दफ्तर से लौटने के बाद मेरी छाती से चसक पड़ी थी। भेनजी जाकर उस डॉक्टर को ले आई थीं। मुझे देखने के बाद डॉक्टर साहब ने सबसे पहले सिगरेट सुलगाई। कश लेते हुए ब्लडप्रेशन लिया फिर ईसीजी। फिर भेनजी को घर का नाहक चिन्तित हो रही हैं, चलिए कॉफी पिलाइए। तब वे पांच रुपए की फीस पर घर आ जाते थे। लेकिन उस रात के बाद उन्हें बुलाना तो दूर उनके नर्सिंग होम भी घर के किसी आदमी को जाने नहीं देता था। तब मैंने भी सिगरेट नहीं छोडी थी। लेकिन मुझे यह बेहद गलत लगा था कि एक आदमी का ब्लडप्रेशर और उसका ईसीजी लेते हुए कोई डॉक्टर सिगरेट पिए।
जब राजेन्द्र माथुर को उसी क्लीनिक में जाते देखा तो मैंने पूछा कि उससे ज्यादा लापरवाह कोई और डॉक्टर आपको नहीं मिला? लेकिन जैसी कि रज्जू बाबू की आदत थी, उन्होंने कहा कि घर के इतने पास है, छोटी-मोटी हारी-बीमारी चलती रहती है, किसी क्लीनिक से संबंध रहे तो क्या बिगड़ता है? आप शायद जानते हों कि राजेन्द्र माथुर स्वास्थ्य विहार में रहते थे जो कि दिल्ली के नामवन्त रिटायर्ड डॉक्टरों की कालोनी है। लेकिन उस दिन सिवाय उस क्लीनिक और डॉक्टर के कोई नहीं मिला जो उनकी जांच कर लेता। दिल्ली में एस्कॉर्टस जैसे हृदय रोगों के विशेषज्ञ अस्पताल हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान है। और दिल्ली भले ही दिल्ली हो, यह हो नहीं सकता था कि रज्जू बाबू देश की सर्वश्रेष्ठ मेडिकल राय और सेवा के बिना उस क्लीनिक नाम की दुकान में पड़े मर जाते।
जिस देश में गंगूराम से लेकर राष्ट्रपति तक कहता है कि जिसकी आती है उसे कौन रोक सकता है( होनी को कौन टाल सकता है( जो जितने दिन लिखाकर लाया है उससे एक पल भी ज्यादा ठहर नहीं सकता, वहां किसी को अच्छी चिकित्सा सेवा मिलने और किसी को न मिलने से मृत्यु का क्या संबंध हैर्षोर्षो जीने की लपलपाती लौ को अपने सीने के टांकों के नीचे महसूस करते हुए मैं रज्जू बाबू और शरद जोशी के रास्ते निकलूंगा नहीं। हमारे कबीर साहब उम्र भर गुरुओं का बखान करते रहे। लेकिन आखिर में उन्होंने भी कहा - दास कबीर हरि के गुन जाए, वा हरि को कोई पार न पाए। गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला। उड़ जाएगा, हंस अकेला। हम सबको अकेले और अपने रास्ते जाना पडे़गा। शरद जोशी और राजेन्द्र माथुर अपने रास्ते गए। वे अपने गुरु नहीं थे। लेकिन कितनी इच्छा है कि उन्हें अपने रास्ते ले आता। न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
(कागद कारे, जनसत्ता 29-05-1994)
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