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सवालों के घेरे में मुख्यमंत्री का साहस

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खण्डवा में कथित तौर पर सिमी द्वारा एटीएस के एक जवान सहित तीन लोगों की हत्या के दो दिन बीतने के बावजूद अब तक आरोपी की गिरफ़्तारी नहीं हो सके है । साहस का अनूठा प्रदर्शन करने वालों को सरकार ने पुरस्कृत किया, यहाँ तक तो सब ठीक था मगर पूरे तथ्यों की जाँच- पड़ताल किये बगैर वारदात में मारे गये दो अन्य लोगों को शहीद का दर्ज़ा, परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति, राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि और उसमें मुख्यमंत्री तथा मंत्रिमंडल के सदस्यों का शामिल होना कई सवाल खड़े करता है।

आतंकी वारदतों से निपटने के लिए प्रदेश में एंटी टेरेरिस्ट स्क्वॉड के गठन से लेकर अब तक की यह पहली वारदात है, जिसमें एटीएस जवान श्री यादव ड्यूटी के दौरान शहीद हुए। पुलिस का कहना है कि प्रदेश के कई हिस्सों में पकड़े गए सिमी के गुर्गो के पीछे यादव का निजी नेटवर्क ही एटीएस के काम आया था। इंदौर तथा जबलपुर में सिमी गुर्गो की गिरफ्तारी के बाद एटीएस कुछ और लोगों की गिरफ्तारी की योजना बना रही थी। इस सूची में शहर के कुछ बड़े व्यापारी भी थे, जिन पर आर्थिक मदद देने की शंका की जा रही थी।
 
इन तीन लोगों की हत्या क्यों हुई , किसने की उसमें सिमी की क्या भूमिका है ऎसे तमाम सवालों के जवाब आना अभी बाकी हैं । ऎसे में पुलिस और प्रशासन के तमाम दावों और तर्कों के बीच यह बात समझ से परे है कि सरकार ने मामले की पूरी तरह छानबीन किये बगैर शक की बिना पर आनन - फ़ानन में तमाम घोषणाएँ करने की जल्दबाज़ी क्यों की? एटीएस आरक्षक यादव की कर्तव्यप्रायणता और उनकी बहादुरी पर कोई शक नहीं किया जा सकता ,लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक नफ़े-नुकसान के लिहाज़ से चालें चलने की कोशिश साफ़ नज़र आ रही है । प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव सिर पर हैं और हर मोर्चे पर नाकाम भाजपा सरकार चुनाव में जीत हासिल करने की गरज से कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती है ।
घोषणाओं का पिटारा खोलकर राजनीतिक माइलेज लेने में माहिर शिवराज सिंह जल्दबाज़ी में इस मर्तबा कुछ ज़्यादा ही बोल गये । हालाँकि प्रदेश में गैरज़िम्मेदार और नाकारा विपक्ष के रुप में आम लोगों को काँग्रेस ने भी निराश ही किया है । साहस को प्रोत्साहन देना कतई गलत नहीं है , लेकिन मुख्यमंत्री को ये जवाब देना ही होगा कि एटीएस जवान के अलावा घटना में मारे गये दो अन्य लोगों को किस आधार पर शहीद बताया गया? कल जाँच में यह मामला आपसी रंजिश या लेनदेन का निकले, तब सरकार का रुख क्या होगा? आमतौर पर ऎसी संगीन घटनाओं के बाद परिजनों को सांत्वना देने, भारी-भरकम सहायता राशि देने जैसे उपक्रम सरकारों की तरफ से किए जाते हैं। इनसे किसी को आपत्ति भी नहीं, लेकिन वास्तविक समस्या पर ध्यान देना क्या जरूरी नहीं है?
प्रदेश में सत्ता की कमान पिछले छह सालों से भाजपा के हाथों में है । दोबारा सत्ता में आने के बाद से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चुकी है । मुख्यमंत्री खुद स्वीकार चुके हैं कि प्रदेश में सात किस्म के माफ़ियाओं का बोलबाला है । अपराधों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है, जिससे साबित होता है असामाजिक तत्वों के हौसले कितने बुलंद हैं। दिनदहाड़े लूट , हत्या , फ़िरौती के मामले आम हो चुके हैं । आम आदमी की जानमाल की हिफ़ाज़त की बात कौन कहे , जब आला सरकारी अफ़सरों की जान भी सुरक्षित नहीं है । इस बीच प्रदेश में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) मालवा और निमाड़ इलाके में पैर पसार रहा है। महिदपुर, उज्जैन, इंदौर, धार, बुरहानपुर, खंडवा, खरगौन, बड़नगर, जबलपुर, नरसिंहपुर सहित कई शहरों, कस्बों और गाँवों में सिमी ने अपना नेटवर्क फिर से मजबूत किया है। ये हालात तब हैं जब पिछले साल पुलिस ने इंदौर में सिमी के प्रमुख सफदर नागौरी, आमिल परवेज, कमरूद्दीन सहित कई मुख्य पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था।

प्रदेश की राजधानी भी इससे अछूती नहीं है। भोपाल में सिमी के गुर्गो की आवाजाही नई नहीं है। पिछले महीने ही संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं ने पुराने शहर की एक होटल में बैठक की थी। सिमी के मास्टर माइंड मुनीर देशमुख को पुलिस अब तक तलाश नहीं पाई है। सिमी का खजांची मोहम्मद अली जबलपुर से पकड़ा गया था। इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े कयामुद्दीन कपाडि़या को बड़नगर से गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह कुछ माह पहले एक अन्य सिमी कार्यकर्ता को भोपाल के करोंद इलाके से पकड़ा गया था। हाल ही में एटीएस ने इंदौर से मो. शफीक, मो. युनूस, शेख साजिद, अरशद खां और फिरोज को दबोचा है। इनमें से शफीक और युनूस गुजरात के अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट में शामिल थे। दोनों फिलहाल गुजरात पुलिस की हिरासत में है। सूत्रों के मुताबिक सिमी के फरार कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने वहादत ए इस्लामी (डब्ल्यूईआई) नाम से एक नया संगठन खड़ा किया है। इस संगठन का बेस राजस्थान में बनाया गया है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक संगठन मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र सहित कई प्रदेशों में बैठक कर चुका है। इसी तरह सिमी ने हैदराबाद के एक संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत से भी तार जोड़ रखे हैं।

सत्ता को चेरी समझकर अपने हित में इस्तेमाल करने के कारण ही प्रदेश में अराजकता की स्थिति बन गई है । मुख्यमंत्री को बताना होगा किस नियम के तहत इस तरह की रेवड़ियाँ बाँटी गई हैं । मुम्बई में हुए 26/11 के आतंकी हमले में भी कई लोग मारे गये थे , लेकिन क्या उन सभी को महाराष्ट्र सरकार ने मुआवज़ा, नौकरी या राजकीय सम्मान दिवस था। सूबे की सरकार को समझना होगा कि इस तरह की शिगूफ़ेबाज़ी से भले ही तात्कालिक लाभ हासिल हो भी जाए , मूल मुद्दों से जनता का ध्यान ज़्यादा ल्म्बे समय तक भटकाया नहीं जा सकेगा । 

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विकी जी. on 01 December, 2009 13:23;36
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"हर मोर्चे पर नाकाम भाजपा सरकार चुनाव में जीत हासिल करने की गरज से कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती है।"
लेखिका की उक्त पंक्तियों से ही स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह का लेख लिखने के पीछे उनका मूल मन्तव्य क्या है. अगर कोई आम आदमी किसी आतंकवादी के हाथों बेमौत मारा जाता है, तो उसे शहीद क्यों न कहा जाये? अगर मुम्बई में सरकार ने ऐसा नहीं किया, तो क्या किसी भी सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए? आतंकवाद में अपनी जान गंवाने वाला हर भारतवासी शहीद कहलाएगा. दिक्कत यही है कि ऐसे हर कदम मे ऐसे कथित टुच्चे पत्रकारों को राजनीति ही नज़र आने लगती है. साफ़ है कि राजनीतिक चश्मा तो ऐसे स्वनामधन्य पत्रकारों की आंखों पर लगा है.
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image सरिता अरगरे संघर्ष को पत्रकारिता से जोड़नेवाली सरिता अरगरे भोपाल में रहती हैं और पारिवारिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी पत्रकारिता के प्रति पूरी तरह से समर्पित. विस्फोट के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन और दूरदर्शन में अंशकालिक पत्रकार के बतौर कार्यरत.
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