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प्रयाग से पटना के बीच बसे भारत की नयी सिलिकॉन वैली

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image इन्फोसिस का मीडिया सेन्टर, बंगलौर

विभोर श्रीवास्तव को फोन किया था. 24 साल के विभोर उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से एक साप्ताहिक अखबार निकालते हैं- मिशन नौकरी. खुद मैनेजमेन्ट के छात्र रहे हैं और नौकरी नहीं मिली तो नौकरी दिलाने के अभियान पर निकल पड़े हैं. अखबार की सात हजार प्रति छापते हैं और जहां कभी भी नौकरी हो उसकी सूचना निशुल्क बांटते हैं.

विभोर की हार्दिक तमन्ना है कि वे ऐसा दिन जरूर देखें जब उनके राज्य में हर आदमी के पास नौकरी हो. 24 साल की उम्र में ही उनको यह अहसास हो गया है कि अगर यहां लोगों को काम मिल जाएगा तो लोग अपना धाम छोड़कर दिल्ली बंबई नहीं जाएंगे और फिर शायद यहां के लोगों को वहां किसी शीला दीक्षित या बाल ठाकरे की गाली भी नहीं खाने पड़ेगी. लेकिन विभोर के सामने एक संकट है. वे कहते हैं कि लोगों को नौकरी मिलेगी कैसे? यह संकट केवल विभोर के सामने ही नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार के विकास के बारे में सोचनेवाले हर प्लानर के सामने पिछली आधी सदी से यही संकट खड़ा है कि इस इलाके का विकास कैसे किया जाए? क्योंकि पिछले दौर में जब भी इलाके में औद्योगीकरण करने की कोशिश की गयी बुरी तरह असफल हो गयी. किसी दौर में देश में सहकारिता भी फैशन था. उस दौर में आनंद का अमूल दुनिया का जाना माना ब्राण्ड बन गया लेकिन यह निगोड़ा इलाका उस दौर में भी गाय भैंस के नाम पर कर्ज लेकर खा गया. बात जहां की तहां रह गयी.

किसी इलाके के आर्थिक उत्थान के लिए उसकी सामाजिक परिस्थिति और वहां के व्यक्ति की मन:स्थिति को नहीं समझेंगे तो बात नहीं बनेगी. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के इस इलाके को, जो कि प्रयाग से पटना तक जाता है, कमोबेश परिस्थिति और मन:स्थिति दोनों ही समान हैं. यह गंगा-जमुना की उपजाऊ दोआब का इलाका है. यहां के लोगों का आईक्यू लेवल बहुत हाई है. धार्मिक और सांस्कृतिक आधार बहुत मजबूत है. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन सभी धर्मों की जड़े यहां मिलती हैं. अतीत की खुमारी इस इलाके के मानस पर आज भी तारी है लेकिन समय के साथ यह खुमारी एक बीमारी बन गयी है. मानों सद्गुण यहां के लिए समाधान नहीं बल्कि समस्या का रूप धारण कर चुका है और पिछले दो शताब्दियो से इस इलाके ने सिर्फ प्रतिगामी यात्रा ही की है. नतीजा यह कि दोयम दर्जे के इलाकों में जाकर शरणार्थी की तरह जीवन जीते हैं और उस इलाके के लिए सब सुख पैदा करने के बाद भी समस्या के रूप में ही चिन्हित किये जाते हैं. मुंबई, दिल्ली हो या फिर बैंगलौर, हैदराबाद हर जगह इन्हें सिर्फ तिरस्कार मिलता है. तो क्या अब वक्त आ गया है जब इन दो राज्यों की सरकारें बड़ा हस्तक्षेप करके भविष्य के भारत का रोडमैप तैयार कर सकती हैं?

प्रयाग से पटना के इस इलाके में भाषाई आउटसोर्सिंग की भीषण संभावना है. इसके साथ ही आईटी एजूकेशन, कन्टेन्ट डेवलपमेन्ट और कन्टेन्ट मैनेजमेन्ट, ग्रामीण डिजिटल लाइब्रेरी, इन्फार्मेशन एवेन्यूज, इंटरनेट कैफे जैसे स्थानीय प्रयासों से लेकर आईटी पार्क, डाटा मैनेजमेन्ट, साफ्टवेयर डेवलमेन्ट जैसे बड़े काम स्थापित किये जा सकते हैं. इन प्रयासों से इस इलाके को एक ऐसी अनूठी सिलिकान वैली के रूप में विकसित किया जा सकता है जहां सबसे कम कीमत में सबसे उन्नत सेवा देनेवाला दिमाग मौजूद होगा. जिस दिन ऐसा हो गया उस दिन आईटी के क्षेत्र में सचमुच नयी क्रांति होगी. बहुत कुछ ऐसा सामने आयेगा जिसकी आज कल्पना भी नहीं का जा सकती.

शायद हां. अब वक्त आ गया है. उत्तर प्रदेश और बिहार अगर आज ठीक से कदम उठा लें तो भविष्य के भारत का केन्द्र एक बार फिर यही प्रयाग से पटना का इलाका होगा. ऐसा कहने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं. आज हम जिसे आईटी कहकर परिभाषित कर रहे हैं वह ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था है. पिछले दौर का औद्योगिक विकास मशीन आधारित था. मशीन प्रभावी थी व्यक्ति की अपनी क्षमता और कौशल सिर्फ मशीन के लिए उपयोग की जाती थी. अब भविष्य में ऐसा नहीं होगा. हमारे भविष्य की दुनिया बिल्कुल ही वैसी नहीं होगी जैसी आज दिख रही है. टैक्नालाजी हमेशा सूक्ष्मता की ओर आगे बढ़ती है और किसी भी तकनीकि का चरम उसके सूक्ष्मतम स्वरूप में ही निहित होता है. हम जिस प्रकार की दुनिया में कदम रख रहे हैं उसमें आज जैसी जरूरतें तो बिल्कुल ही नहीं होगी. जब जरूरतें आज जैसी नहीं होगी तो हमारा प्रोडक्शन सिस्टम पूरी तरह से बदल जाएगा. प्रोडक्शन सिस्टम बदलने का मतलब है आज के कल कारखानों का खात्मा. यह सब होने में कुछ दशक का ही अंतर है. मसलन, 1991 में भारत में जब वीएसनएल ने 64 बिट ईमेल गेटवे की शुरूआत की थी तो कौन जानता था कि 17 साल बाद यह छोटी सी शुरूआत देश के जीडीपी में 7 प्रतिशत से अधिक का योगदान कर रही होगी. ठीक उसके पहले के दशक में (80 से 90 के बीच) भारत के इंजीनियर और वैज्ञानिक दुनिया के दूसरे देशों में नौकरी का ठौर खोजते थे. लेकिन 90 के दशक से आईटी में हस्तक्षेप की शुरूआत हुई वह आज 60 अरब डालर का विदेशी पूंजी लानेवाला कारोबार बन गयी है. उम्मीद है कि 2020 तक भारत 225 अरब डालर आउटसोर्सिंग के जरिए कमाने लगेगा.

इसी दौर में भारत में आईटी की बड़ी कंपनियां तो विकसित ही हुईं लेकिन आईटी पार्क भी विकसित हुए. वर्तमान में देश के हर राज्य के पास अपनी किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई आईटी नीति है. जिस बंगलौर को भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है उसकी सोच भी 80 के दशक में विकसित हुई और कर्नाटक स्टेट इलेक्ट्रानिक्स डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के अध्यक्ष आर के बलिगा बंगलौर को इलेक्ट्रानिक सिटी बनाना चाहते थे. लेकिन कोई दो दशक बाद ही बंगलौर दुनिया का दूसरा सिलिकॉन वैली बनकर उभर आया. बंगलौर के दक्षिण में 335 एकड़ पर शुरू किये गये इलेक्ट्रानिक सिटी के प्रोजेक्ट ने भरे पूरे शहर का रूप धारण कर लिया. बंगलौर ही अकेला विकसित नहीं हुआ. बंगलौर के बाद हैदराबाद सायबराबाद के रूप में विकसित हुआ. इसके बाद चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली-एनसीआर और पुणे ने आईटी क्षेत्र में उल्लेखनीय पहल करते हुए अपनी जगह सुनिश्चित की है. बिना किसी शक के इन आईटी पार्कों में काम करनेवाले लोग अच्छी खासी संख्या में उत्तर प्रदेश के उसी पूर्वी हिस्से और बिहार से आते हैं जिसके मजदूर इन्हीं शहरों में गालियां खाकर जिन्दा रहने के लिए मजबूर हैं. बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने हाल में ही स्वीकार किया था कि बंगलौर में अकेले सवा लाख से अधिक आईटी प्रोफेशनल बिहार से गये हैं. ऐसे ही हालात हैदराबाद, पुणे, दिल्ली में भी हैं. तो क्या अगर उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारें चाहें तो वे भविष्य में विकास के इस इंजिन को अपने प्रदेश में स्थापित कर सकते हैं? और अगर ऐसा हो सकता है तो फिर प्रयाग से पटना के बीच ही भविष्य की सिलिकान वैली क्यों बननी चाहिए?

मेरा ऐसा कहने के पीछे कुछ मूलभूत कारण है. यह इलाका बौद्धिक संपदा से संपन्न है. इसी बौद्धिक संपदा ने इसे पिछले दशकों में विकसित नहीं होने दिया क्योंकि यह समाज श्रमसाध्य नहीं है. लेकिन इस समाज में एक खासियत भी देखने को मिलेगी. यहां का समाज काम को सम्मान भले ही न करता हो लेकिन सम्मान वाले काम करने का अभ्यस्त है. यही वह सामाजिक सोच है जो इस इलाके को भविष्य के सिलिकान वैली के रूप में विकसित कर सकता है. अगर उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारें यह देख सकती हों तो देख लें कि भारत के आईटी सेक्टर में एक नया ट्रेण्ड चलनेवाला है जो सीधे तौर पर इंटरनेट से जुड़ा हुआ है. गूगल भी मानता है कि भारत में भाषाओं में इंटरनेट का बेहतर भविष्य है. इसलिए उसका सारा जोर भाषाओं में विकास करने पर लगा हुआ है. गूगल तो एक इंटरनेट सेवा प्रदाता है. लेकिन इंटरनेट पर स्थानीय भाषा में व्यापक मात्रा में कन्टेन्ट की गुंजाइश पैदा हो रही है. इसके अलावा भाषा में साफ्टवेयर विकास तथा अप्लीकेशन निर्माण की भी अनंत संभावनाएं दिख रही हैं. इसके साथ ही इंटरनेट कियोस्क, कैफे, डिजिटल लाइब्रेरी और आईटी एजूकेशन की अनंत संभावना है. यह वो काम है जिसमें सरकार सिर्फ नीति निर्धारक की भूमिका निभा सकती है. बाकी का सारा काम लोग खुद कर लेंगे.

2004 में उत्तर प्रदेश सरकार एक आईटी पालिसी की घोषणा कर चुकी है और 2008 में बिहार सरकार ने भी आईटी नीति की घोषणा कर दी है. उत्तर प्रदेश की आईटी पालिसी जहां नोएडा और ग्रेटर नोएडा तक सिमटी हुई है वहीं बिहार सरकार का प्रयास इस मामले में अधिक गंभीर दिखाई दे रहा है. अगर इन दोनों ही राज्यों की सरकारें और इस इलाके के लोग भविष्य के इस संभावित विकास के पहिये को अपनी गाड़ी में लगा लें तो आधी सदी बाद न केवल इस इलाके की दशा बदल जाएगी बल्कि हो सकता है कल महाराष्ट्र से लोग नौकरी की खोज में इस इलाके में आयें और यकीन मानिए इस इलाके के लोग इतने उदार हैं कि वे कभी भी बाल ठाकरे या शीला दीक्षित की तरह उन्हें अपमानित करके बाहर जाने के लिए नहीं कहेंगे. शायद विभोर श्रीवास्तव को भी तब संतोष मिले कि अब उनके लोग नौकरी करना चाहते हैं तो उनके अपने ही इलाके में नौकरियां भी मौजूद हैं.

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अभिषेक on 06 February, 2010 20:53;01
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अच्छा आलेख.
प्रयाग और पटना के बीच के लोगों की सामाजिक स्थिति और मनःस्थिति का अच्छा चित्रण. परन्तु किसी भी क्षेत्र में औद्योगिक विकास के लिए कुछ चीज़ों का होना एक अनिवार्य शर्त है. सस्ता और कुशल श्रम एक चीज़ है, किन्तु व्यापार करने की संभावना होना भी बहुत महत्वपूर्ण है. आधारभूत ढांचा, बिजली, सड़क, परिवहन, पानी, कुशल प्रशासन, कानून व्यवस्था का होना. कम से कम आज की स्थिति में यह अंचल (प्रयाग और पटना के बीच) इन सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता. जब तक ये सभी चीज़ें उपलब्ध नहीं होगी, आप कितना भी नगाड़ा पीटते रहें, आईटी ही क्या किसी भी उद्योंग के लगने और उसके फलने फूलने पर प्रश्न चिन्ह ही लगा रहेगा. इस अंचल के राजनीतिक नेतृत्व को सोचना चाहिए इन सभी आधारभूत सुविधायें कैसे प्रदान की जाएँ. तभी इस अंचल में आईटी सिलिकॉन वैली बनाने का सपना साकार हो पायेगा. आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को देखते हुए यह दूर की कौड़ी ही लगती है.
Anyway, एक अच्छा लेख, अच्छी प्रस्तुति.
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ravish kumar on 06 February, 2010 20:57;48
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बहुत ही अच्छा लेख। दो बार पढ़ा।
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Chinmay on 06 February, 2010 23:47;46
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इसमे कोई दो राय नहीं कि आई टी का देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है लेकिन सरकार की आई टी नीतियाँ दोषपूर्ण है. देश में कई बड़ी कंपनियाँ आई टी प्रोफेशनल्स का शोषण कर रहीं है , आई टी प्रोफेशनल्स के एंप्लाय्मेंट और एजुकेशन के वेरिफिकेशन लिए नेस्कौम ने डेटबेस तो बना रक्खा है इस रेकॉर्ड को वह एम एन सी के साथ शेयर भी करते हैं किंतु उन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नही करते जो इंटरनॅशनल लेबर लॉ को धता बतातीं है न ही ऐसी समुचित व्यवस्था है कि आई टी प्रोफेशनल्स अपनी कंपनी पर दावा कर सकें , कम से कम सरकार और नेस्काम तो इस सूरत में चुप ही बैठते
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Sanjeet Tripathi on 07 February, 2010 01:34;19
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bahut satik likha hai aapne.
comment me abhishek jee ne kaha vah is mudde par hakikat bayan karta hai.

dekhna yah hai ki ye sarkarein pahle in mool bato par kab dhyan deti hain aur inhe sudharti hai
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-आलोक श्रीवास्तव on 22 February, 2010 01:23;29
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मुझे उम्मीद है ईश्वर विभोर को बहुत आगे ले जायेगा और लोग इनसे बहुत कुछ सीखने को पाएंगे
-आलोक श्रीवास्तव
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देश के राजनेताओं का तो सिर्फ एक ही कार्य है....किसी भी प्रकार के मुद्दे को गर्म तवा बनाकर उस पर अपनी राजनितिक रोटियां सेंकना | वो चाहे भाजपा का राम मंदिर मुद्दा हो....या ठाकरे परिवार का दिखावटी मुंबई प्रेम......
जब तक लोग खुद आगे आकर समाज को बदलने का प्रयास नहीं करेंगे कुछ भी संभव नहीं हो सकेगा....
संजय जी को बढ़ियाँ देना चाहता हूँ तथा पूर्ण रूप से आपके साथ हूँ.......आपका यह सपना अवस्य सच होगा और एक दिन उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोग गर्व से अपने क्षेत्रों में ही रोजगार पा सकेंगे....
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