जनप्रतिनिधि गायब है अब तो गाड़ी लेकर ही लौटेगें
राजस्थान भर के लगभग 6 हजार जनप्रतिनिधि गायब है. लोगों की माने तो वो अब गाडी में सवार होकर ही वापिस लौटेगें. सूत्रों की माने तो प्रदेश भर में इन दिनों गाडियों की बुकिंग तेज हो गई है. हजारों जो एक साथ खरीदी जानी है. गाँव की सरकार जो उनके बलबूते बनेगी.
देश में पंचायतीराज की स्थापना का श्रेय राजस्थान को मिला. तो 2 अक्टूबर 2009 को स्थापना की स्वर्ण जयंती भी राजस्थान में ही मनाई गई. ठीक उस के बाद ही प्रदेश में पंचायतीराज के चुनावों की प्रक्रिया आरम्भ हो गई. प्रदेश के 33 जिलों सहित 237 पंचायत समितियों में जनता ने अपने मत का प्रयोग किया. 9189 ग्राम पंचायतों में पंच सरपंच का चुनाव तो सीधे ही हो गया. प्रधान और जिला प्रमुखों का चुना जाना अभी बाकी है. 10 फरवरी को इनका चुनाव होगा. इनके चुनाव करने वाले जन प्रतिनिधि इन दिनों गायब है. उन्हीं के बारे में कहा जा रहा है कि वो अब अपने मत के बदले मिलने वाली दहेज की गाडी में बैठकर ही वापिस आऐगें.
राजस्थान में पंचायतीराज के चुनाव हुये. 20,29 जनवरी और 2 फरवरी को इसके लिए तीन चरणों में मत डाले गये. पंचायत समिति प्रधान और जिला प्रमुखों का चुनाव ये ही लोग करेगें. अपने मतदान के दिन से ही संभावित जीतने योग्य लोग अपने घरों से गायब है. प्रत्येक क्षेत्र से दो तीन लोगों को उठा लिया गया है. इन लोगों को प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव लडने वालों ने अपने बाडों में कैद कर रखा है. इनमें भी सबसे अधिक मुसीबत गरीब और दलित वर्ग के लोगों की है. कुछ दबंग किस्म के लोग तो खुले आम घूम रहे है.
सूत्रों की माने तो प्रधान पद के लिए 5 से 15 लाख तक की बोली है तो जिला प्रमुख पद पर बोली 25 लाख तक पहुँच गई है. रोचक बात ये है कि सभी बोलियों के साथ एक गाडी तो अनिवार्य है. इतना ही नहीं पत्थर व्यवसाय से जुडे एक क्षेत्र में तो एक प्रत्याशी ने इस व्यवसाय में काम आने वाली 28 लाख रूपये कीमत की जेसीबी मशीन देने की घोषणा कर दी बताई. चुने जाने वाले प्रत्याशी इस आँफर को अच्छा मान रहे है.प्रदेश में दोनों ही प्रमुख दलों की ओर से प्रयास किये जा रहे है. सत्ताधारी कांग्रेस अभी तक की तैयारियों में आगे नजर आ रही है. उसने अपने सभी मंत्रियों,सांसद और विधायकों को जिलों में डेरा डालने के आदेश जारी कर दिये है. प्रदेश भर में होटल,फार्म हाउस और बडे नेताओं के ठिकाने इन दिनों आबाद है. चुने हुए कुछ जनप्रतिनिधियों को प्रदेश के बाहर भेज दिया गया है. जहाँ उनके ऐशों आराम के तमाम इंतजाम पहले से ही सुनिश्चित है. विशेष बात ये देखने में आ रही है कि सभी को अलग अलग ठिकानों में कैद कर रखा है.
कहने में तो ये आ रहा है कि ‘‘अब चुनेगी गाँव की सरकार’’. लेकिन गाँव का मतदान करने वाला मतदाता अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है. इस बात को लेकर जब हमने पहली बार मतदान में भाग लेने वाले एक युवा से की तो उसका कहना था कि ‘‘ वो अगली बार इन पदों के लिए मतदान ही नहीं करेगा. उसकी माने तो अब आगे से प्रधान और जिला प्रमुखों के लिए सीधें ही मतदान की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए. तभी कहीं पंचायतीराज की विश्वसनीयता बनी रह सकती है. सच भी है करोडों रूपये खर्च करके इन पदों तक पहॅचे लोग क्या,कैसे और कितना करेगें. इसे समझने में कोई भूल नहीं कर रहा है.
पंचायत समिति और जिला परिषद प्रतिनिधि चुने जाने के लिए चुनावों में ही लोगों ने लाखों रूपये पानी की तरह बहाये है. उसकी भरपाई करने का इन जनप्रतिनिधियों के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. अपना मत देने के बाद इन्हें पूछने वाला कोई नहीं है. कभी जभी बैठकों में मिलने वाले नाश्ते के अलावा इनकी दो कौडी की पूछ कोई नहीं करता है. लाखों रूप्ये और गाडी का इंतजार करने वाले कुछ चुने हुऐ जनप्रतिनिधि उदास है. कुछ स्थानों पर जहाँ बोली अधिक लगने की संभावना थी वहाँ पैसे वाले लोग चुनाव में हार गये है. ऐसे में कुछ जगहों पर कम पैसे में ही इन जनप्रगतिनिधियों को अपना कीमती वोट डालना पडेगा. ऐसे लोगों के चेहरे पर मायूसी छा रही है. तो मतदाताओं के बीच खुशी की लहर है.
प्रदेश की 33 जिला परिषदों के लिए 1013 सदस्य चुने गये है. तो 237 पंचायत समितियों के लिए के लिए 5237 सदस्यों का चुनाव हुआ है. सोमवार सुवह से मतगणना शुरू होते ही कांग्रेस खेमे में खुशी की लहर दौडने लग गई. अधिकाश स्थानों पर कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने जीत दर्ज की है. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है. ऐसे में सरकारी अमला भी कांग्रेस संगठन के साथ खडा नजर आ रहा है. तो विपक्षी भाजपा में तालमेल के अभाव के चलते सब कुछ बिखरा बिखरा सा नजर आ रहा है.
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- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
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