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सिलदा के नक्सली हमले से पैदा हुए सवाल

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देश में इस तरह का माहौल बनाया गया है मानों केन्द्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कृतसंकल्प है. लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? पश्चिम बंगाल में हाल में सुरक्षा बलों पर हुए नक्सली हमले में जिस तरह 24 जवान मारे गये वह नक्सलियों से लड़ने की सुरक्षा बलों की सारी पोल खोल देता है. टीवी पत्रकार दिनेश काण्डपाल का विश्लेषण-

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में नक्सलियों ने 15 फरवरी को जिस वक्त कैंप पर हमला किया उस वक्त ये जवान अपने हथियारों से दूर ट्रेक सूट पहन कर खाना बना रहे थै। आने वाले खतरे से अन्जान ये जवान इस तैयारी में थे कि कैसे जल्दी खाना बने और दिन भर की थकान मिटायी जाय। कैंप में केवल एक संतरी था। सामान्य तौर पर रेत के बोरे कैंप के आस पास रखे जाते हैं लेकिन सिलदा के कैंप में एसा कुछ नहीं था। कोई ऊंचा टावर भी नहीं था जिस पर चढ़ के देखा जा सके की कौई कैंप की तरफ आ रहा है। बड़ी लापरवाही से योजना बना कर इन जवानों को मौत के मुंह में धकेलने का इंतजाम किया गया। नक्सिलियों ने हमले के अपने परंपरागत तरीकों से हटकर जीप और मोटर साईकिलों का सहारा लिया। धड़धड़ाते हुये सौ से ज़्यादा नक्सली कैंप में धुसे और चूल्हे के पास रोटी सेक रहे जवानों पर अंधाधुध फायरिंग शुरू कर दी। एक संतरी था जाहिर है इस अतिसंवेदन शील इलाके में वो काफी नहीं था। नक्सिलयों ने कैंप को आग लगाई, नौ जवान तो उसी आग में जल कर मर गये। आग से बचने के लिये जो बाहर भागे उन्हें बाहर खड़े नक्सलियों ने भून डाला। बेबस जवान अपनी की मौत का तमाशा देखते देखते मर गये। नक्सलियों ने वो सारे हथियार लूट लिये जो कैंप में रखे थे।

ये हमारी तैयारी है नक्सिलियों से निपटने की। इस वक्त कोई 60 हज़ार जवान नक्सलियों से निपटने की स्पेशल ट्रेनिंग ले रहे हैं। सिलदा में  मारे गये जवानों के पास कोई स्पेशल ट्रेनिंग नहीं थी। उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि उनके इस कैंप में  इतना बड़ा हमला हो सकता है। नक्सलियों ने अचानक इस हमले को अंजाम नहीं दिया। आने जाने वाले रास्तों पर सुंरगे बिछा कर नक्सिलयों ने इस बात को सुनिश्चित किया की कोई इस कैंप में मदद के लिये न पंहुच पाये। बारूदी सुरंगे तकरीबन 24 घंटा पहले बिछायी गयी होंगी। इस काम के लिये भी सौ से ज़्यादा लोग लगे होंगे। लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से तनख्वाह उठा रहे खुफिया एजेंसी के बेखबर एजेंटों को इस पूरी कारवाई की कोई खबर नहीं लग पायी। नक्सलियों ने बड़े आराम से कैंप पर हमला किया 24 जवानों को गोलियों से भूना और विजयी मुद्रा में कैप से चलते बने।

सिलदा के हमले ने चुनौती को दोगुना कर दिया है। 24 जवानों को तो मौत के मुंह में धकेल दिया अब भी न जाने कितने कैंप इस लापरवाही की मार झेल रहे हैं। नक्सलियों  से निपटने की हमारी तैयारी की अगर ये तस्वीर है तो ये शर्मनाक है।प्रधानंमत्री ने नक्सिलियों को देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बताया। प्रधानमंत्री के बयान की गंभीरता तब दिखी जब देश के गृह मंत्री ने इस हमल के कुछ दिन पहले ही नक्सलियों से निपटने की रणनीति का खाका खींचा। कोलकाता में मुख्यमंत्रियों से बैठक कर छाती चौड़ी करते हुए टीवी कैमरों के सामने नक्सलियों को चुनौती दी। ऑपरेशन ग्रीन हंट को लेकर खूब बड़बोलापन किया। एक हमले ने इस बड़बोलेपन की हवा निकाल दी। सरे आम सारी योजनाओं की धज्जियां उड़ा दी। अब किसी की इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही कि को इन हमलों की निंदा तक कर सकें।

नक्सलियों से निपटने की हमारी क्या तैयारी है इस हमले ने उसकी पोल खोल  दी है। कैंप के पास जरूरी  तैयारी नहीं की गयीं। केवल एक संतरी ड्यूटी पर था।  रेत के बोरे रखे जाने चाहिये थे लेकिन वहां नहीं रखे गये। कैंप के आस पास नज़र रखने का कोई इंतजाम नहीं। ये जंग से कम हालात नहीं हैं। उस अफसर का नाम तक सामने नहीं आया जिसके ऊपर कैंप की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। कौन अफसर था तो इस कैंप में ये देखने गया कि वहां जवानों की सुरक्षा के इंतजाम हैं या नहीं। जंग भी ऐसी जहां दुश्मन की पहचान तक नहीं है। किसे मारें किसे नहीं, सब अपने ही हैं इसी दुविधा में हर सिपाही है। एक खास ऑपरेशन में संवेदनशील इलाके में किस तरह का कैंप लगना चाहिये ये ट्रेनिग पहले अफसरों को दी जानी चाहिये। बेहद गैरपेशेवराना रवैये ने जिन 24 बहादुरों को मौत के मुंह में धकेल दिया उन पर देश की अदालत में इरादतन हत्या का मामला चलाया जाना चाहिए। ये शर्मनाक लापरवही है उन लोगों की जो नक्सिलियों से लड़ने के लिये जनता का समर्थन मांगते हैं। जो अपने 50 हथियारबंद जवानों की रक्षा नहीं कर सकते वो किस मुंह से आम आदमी की सुरक्षा का भरोसा दिलाये घूम रहे हैं।

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veeru on 18 February, 2010 14:50;21
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very good post
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Vicky G on 18 February, 2010 16:21;58
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बहुत शानदार. विस्फ़ोट पर इसी तरह के लेखों की दरकार है, जो किसी विचारधारा का भोंपू बने बिना, सच का आईना दिखाएं. आभार दिनेश जी.
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harish on 18 February, 2010 18:21;01
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नक्स्ल वाद से निपटने के लिए कई तरह के तरिके अपनाने की आवश्कता हॆ। इसमे सबसे पहले नकस्ल प्रभावित इलाको मे राजनॆतिक, आर्थिक ऒर समाजिक समस्याओ का समाधन करना। पुलिस व सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना। ऒर नकस्लवाद के विरुध केन्द्र- राज्य सरकारो को मिलकर काम करने की आवश्कता हॆ।
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y on 19 February, 2010 01:25;43
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चाहिये। बेहद गैरपेशेवराना रवैये ने जिन 24 बहादुरों को मौत के मुंह में धकेल दिया उन पर देश की अदालत में इरादतन हत्या का मामला चलाया जाना चाहिए। ये शर्मनाक लापरवही है उन लोगों की जो नक्सिलियों से लड़ने के लिये जनता का समर्थन मांगते हैं। जो अपने 50 हथियारबंद जवानों की रक्षा नहीं कर सकते वो किस मुंह से आम आदमी की सुरक्षा का भरोसा दिलाये घूम रहे हैं।
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अविनाश वाचस्‍पति on 19 February, 2010 12:09;16
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रोंगटे खड़े कर देने वाली लोमहर्षक घटना बल्कि इसे दुर्घटना ही कहा जाना चाहिए और तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए लापरवाहों पर, पर करेगा कौन ?
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Kathika on 20 February, 2010 01:54;11
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It trembles you within when such eye opening incidents happen. Each such incident reminds you of the last one and puts you to deep thinking if anything has really changed or will anything change ever? And why is it that we don't take the warnings seriously? Be it natural calamities or terrorist/naxal attacks, we don't care! Lose lives, crib for a while, play the blame game and then sit and wait for the next shock to shatter us. Can't we as civilians do something about it? Something concrete... After all, it's our responsibility too.
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