इस्लामिक आतंकवाद बनाम आदिवासी नक्सलवाद का भेदभाव
आतंकवाद शब्द पर यह भेदभााव क्यों? आखिर यह धारणा कब खत्म होगी कि अगर किसी घटना में मुसलमान पकड़े जाएं तो वह आतंकवादी घटना होगी अन्यथा नक्सलवाद, उग्रवाद या फिर अतिवाद कहलाएगा। हालांकि आतंक का शाब्दिक अर्थ तो दहशत फैलाना ही है फिर वो काम कोई भी करे आतंकवादी ही कहलाया जाना चाहिए फिर देश में मुसलमानों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
बीते मंगलवार को केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि गंभीर प्रयासों के बावजूद माओवादी हिंसा का रास्ता नहीं त्याग रहे हैं। अर्थात सरकार मानती है कि नक्सलियों पर लगाम कसना उसके लिए मुश्किल चुनौती है। हालांकि गृहमन्त्री पी चिदम्बरम ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अगर नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ दें तो माओवादियों से सरकार बातचीत कर सकती है। गृहमन्त्री की अपील का जवाब माओवादियों ने सुरक्षाबलों के 24 जवानों को शहीद करके दे दिया है। वैसे नक्सली समस्या पर चिन्तित सुप्रीम कोर्ट का भी कहना है कि नक्सली समस्या विशुद्ध रूप से सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुयी है और इसका समाधान सामाजिक असामानता दूर करके ही निकाला जा सकता है। अदालत की चिन्ता से यही सार निकलता है कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक असमानता नौजवान पीढ़ी के भटकने का बड़ा सहारा बन रही है, इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का स्थायी हल ताकत सवे नहीं बल्कि भेदभाव समाप्त करके ही निकाला जा सकता है। लेकिन हमारी सरकारें सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रहती है और जब हालात अधिक खराब हो जाते है तो सरकार हाथ खड़े कर समस्या को ताकत के माध्यम से हल करने को विवश होती है लेकिन तब तक परिस्थितियां इतना विषम रूप ले लेती हैं कि सरकार असहाय हो जाती है और फिर उसे स्वीकरना पड़ता है कि हालात उसके काबू से बाहर हो चुके है। जैसा कि नक्सली समस्या के मामले में सरकार बेबस नज़र आती है।
बहरहाल बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, पं. बंगाल तक की पूरी पट्टी नकस्लवाद के जाल में बुरी तरह फंसी हुयी है जहां निरन्तर निर्मम हत्याएं व सरकारी संपत्तियों की लूटपाट चल रही है। बस्तर के चार जिलो में फेला अबुझमाड माओवादियों का सुरक्षित गढ़ कहलाता है, जहां ट्रेनिंग कैम्प भी है और गोला बारुद व हथियार बनाने के कारखाने भी। बताया जाता है कि पिछले तीन दशक में इस क्षेत्र में पुलिस का गुज़रना ही नहीं हुआ है। वहां सिर्फ नक्सलियों का ही राज चलता है, उनकी इजाजत के बगैर वहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता। 39 सौ वर्ग किलोमीटर में फैला यह दुर्गम पहाड़ी इलाका है, इसे नक्सलियों की सुरक्षित भूमि या पनाहगाह कहा जा सकता है। इसी प्रकार माओवादियों ने बिहार के जमुई को भी अपने आधार क्षेत्र में बदल दिया है जहां गुज़री 18 फरवरी को गांव के 12 लोगों को गोलियों से भूनकर उनके घरों में आग लगा दी गई थी। कहते हैं जमुई में भी नक्सलियों की समानान्तर सरकार चलती है, जंगलों और पहाडों के बीच बसे इस जिले में माओवादियों की ताकत विगत पांच वर्षों में तेजी से बढ़ी है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार इस जिले में उनके प्रशिक्षण शिविर भी चल रहे है, जमुई के चकाई, भौरा, सिकन्दरा, झाझा, सिमुलतला, लक्षमीपुर और सोनी को माआवादियों का गढ़ माना जाता है। यही पर आरपीएफ के दस्ते पर हमला करके नक्सलियों ने उनके हथियार छीन लिए थे। नक्सली संगठनों में महिलाओं की भी खासी तादाद है। बल्कि संगठनों में बाल नक्सली तक शामिल हैं। महिलाओं का चयन, उनका प्रशिक्षण तथा तैनाती बिल्कुल पुरुषों के समान ही होती है। पुलिस दस्तावेज के अनुसार केवल बिहार में ही 600 महिलाऐं व 200 बाल नक्सली इस संगठन में शामिल है। चयन का आधार यह है कि एक गांव या एक परिवार से दो से अधिक नक्सली भर्ती नहीं किए जाते। महिलाओं को भी बन्दूक, एसएलआर तथा अन्य आधुनिक हथियारों के कड़े प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है।
नक्सली चाहे कितने भी जनसंहार करें, सुरक्षा बलों को निर्मम तरीके से मारते रहें, निहत्थे लोगों को मार कर उनके घर जलाते रहें, सब ठीक है। उसे सिर्फ नक्सलवाद ही कहा जाएगा क्योंकि आतंकवादी तो बस मुसलमान ही होते है। हालांकि देश के अन्दर ही आतंकवाद के दूसरे चेहरे भी कई बार उजागर हो चुके है लेकिन एक खबर छपने के बाद फिर पता ही नहीं चलता कि उसका क्या हुआ?यह कहना गलत नहीं कि माओवादी निर्भीकता और स्वतन्त्रता के साथ अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं और देश के अधिकांश राज्य इसकी चपेट में आ चुके हैं वो सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों का अगवा करते है, बदले में अपनी मांगे मनवाते हैं अन्यथा समय सीमा समाप्त होने पर उनकी हत्या करके फेंक देते है, वो सुरक्षा बलों पर हमला करते है, जवानों को मारते है उनके हथियार छीन लेते है, वो ग्रामीणों की सामूहिक व निर्मम हत्या करते है, उनके घरों में आग लगा देते है, हत्याओं के लिए जघन्य व कु्ररतम तरीके अपनाते है। पुलिस जवानों की निर्मम हत्याओं के बावजूद सरकार व मीडिया की नज़र में यह आतंकवाद नहीं, बस नक्सलवाद ही है, इनके कृत्यों से सुरक्षाबलों का न मनोबल गिर रहा है और न समाज में अशान्ति उत्पन्न हो रही है। दरअसल देश के अन्दर हो रहे बम धमाकों और आत्मघाती हमलों में फर्क बस इतना है कि सीमा पार के आतंकवादियों के बम धमाके व आत्मघाती कार्रवाईयों शहरों तक सीमित है जबकि यही काम माओवादी ग्रामीण क्षेत्रों में कर रहे हैं। बल्कि शहरी क्षेत्र की घटनाओं से ज्यादा ही कर रहे है। इस बात को अगर इस तरह कहा जाए तो गलत नहीं कि निर्दोष ग्रामीणों के जीवन का सरकार और मीडिया में शायद उतना मूल्य नहीं जितना शहरी नागरिकों का है यही वजह है कि किसी शहर में बम फट जाए तो मीडिया कई दिन तक उसका पोस्टमार्टम करता रहता है जबकि माओवादियों द्वारा चाहे कितने भी मार दिए जाएं, एक दिन के बाद वो समाचार फिर न्यूज चैनलों पर दिखायी नहीं देता। यदि वर्ष 2007 से लेकर आज तक का आकलन किया जाए तो आत्मघाती घटनाओं में 436 लोग मारे गए जबकि माओवादी आतंक का शिकार 1524 लोग हुए है। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि कौन सी स्थिति अधिक भयावह है। और जहां तक क्रूरता का सवाल है तो माओवादी आतंक में भी वही सब देखने को मिला है जो अन्य प्रकार की आतंकवादी घटनाओं में सामने आया है।
यदि आतंकवाद का किसी भी रूप में संधि विच्छेद किया जाए तब भी कही से मुसलमान नहीं निकलता है तो फिर सरकार और न्यूज चैनल इस बात को क्यों नहीं मान रहे हैं कि आतंक की घटनाएं चाहे सीमा पार से हों या फिर देश के अन्दर नक्सलियों द्वारा या अलगाववादियों द्वारा अंजाम दी जाएं वो सब आतंकवाद ही है। हमें यह भी याद है कि जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था और मीडिया ने सिखों को आतंकवादी लिखना शुरु किया था लेकिन आतंकवादी समूह की "एक लिखित धमकी के बाद समाचार पत्रों को तुरन्त ही सिख खाड़कु लिखना पड़ा था, उसके बाद किसी समाचार पत्र की सिखों को आतंकवादी लिखने की हिम्मत नहीं हुई। जबकि देश भर के आम मुसलमान निरन्तर यह अपील कर रहे है कि आतंकवादी चाहे मुसलमान हो, हिन्दू हो या सिख, ईसाई या फिर नक्सली हो या तमिल या बोडो और असमी, वो बस आतंकवादी है। उसे जिहादी या इस्लामी लिखना, कहना इस्लाम का अनादर है। इस अपील की किसी को भी परवाह नहीं। मुसलमान मानते है कि सीमा पार से भारत में आतंकवाद फैलाया जा रहा है। इससे किसी को इंकार नहीं लेकिन उसे जिहाद या इस्लाम से जोड़ना पूरी तरह से गलत है क्योंकि जो लोग भी ऐसा कृत्य कर रहे है, अगर वो मुसलमान है तो अच्छी तरह जानते है कि निर्दोषों की हत्या किसी भी प्रकार जिहाद या इस्लामी नहीं हो सकती। उसके बावजूद अगर वो इस प्रकार का कृत्य कर रहे है तो यह उनका राजनीतिक स्वार्थ या विस्तारवाद तो हो सकता है जिहाद हरगिज़ नहीं।
पाकिस्तान के तथाकथित जिहादी संगठन क्या कर रहे है, इस्लामी दुनिया उसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकती लेकिन आम मुसलमानों को रोष इस बात को लेकर है कि सीमापार के आतंकवाद को लेकर पूरी इस्लामी दुनिया को जिहादी करार देना पश्चिमी मीडिया का कुतर्क है जिसे भारतीय परिवेश में स्वीकार्य बनाने के नकारात्मक परिणाम पैदा हुए हैं। इस पर विराम लगाया जाना अति आवश्यक है। क्योंकि एक पाकिस्तान ही है जिसकी ज़मीन पर पनप रहा आतंकवाद सीमा पार करके भारत में उत्पात मचा रहा है जबकि दूसरे मुस्लिम देशों में जो भी अशान्ति या उथल पुथल है वो उन देशों में अमेरिका की अनावश्यक घुसपैठ का परिणाम है इसलिए अपने आर्थिक संसाधनों पर विदेशी आधिपत्य के खिलाफ संघर्ष करना किसी भी रुप में आतंकवाद की श्रेणी में नहीं आएगा।
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- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
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- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
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- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
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सबसे पहले तो शुक्रिया की आप इतना सोचते है, कौम और कौम के नौजवानों के बारे में..
लेकिन आपके लेख को पढ़कर किसी आम मुसलमान से हमदर्दी या उसके गुस्से का इज़हार कम और आतंकवादियों और दहशतगर्दो के साथ हमदर्दी ज्यादा नजर आती है...सबसे पहला सवाल तो मई ये पोछना चाहूँगा की आपके (आत्मघाती घटनाओं में 436 लोग मारे गए जबकि माओवादी आतंक का शिकार 1524 लोग हुए है ) इस नंबर का जरिया क्या है..जरा हमें भी बताये और आप दहशतगर्दो और माओवादियों को एक तराजू माँ नहीं तौल सकते, माओवादी आम लोगो के लिए लड़ते है, अपने हक के लिए लड़ते है, पुलिस की ज्यादती के खिलाफ लड़ते है..उनके हमले आम निर्दोष , निहत्थो पर नहीं होते जैसे की आपके दहशतगर्दो के होते है..
नक्सलवादी उन्ही मामलात में आम आदमी पर हमला करते है जब उन्हे शक होता है की उनकी मुखबिरी की जा रही है..
नक्सलवादी भीड़ भरे शहरो में , बसों में बोम्ब नह फोड़ते, माओवादी मुंबई की सडको पर ए के ४७ से और ग्रेनेड से हमला नहीं बोलते, आज आम आम आदमी भी नक्सलवादियो से हमदर्दी रखता है क्युकी वही उन्हे पुलिस की ज्यादती से , उनकी लूट से और उनकी बहु बेटियों की सरे आम लुटती इज्ज़तो को बचाते है..
आपके दहशतगर्द कभी ऐसे आवामी कामो में तो लगे नहीं दिखे, आप जैसे लोग ही हमारे मजहब को बदनाम करते है, हिन्दुओं की आँखों पर शक का पर्दा डालते है और नौजवानों को जेहादी बना इ पर मजबूर करते है...कलम मिली है तो उसका इस्तेमाल देश और देश के भले के लिए कीजिये, कौमी एकता बढ़ने के लिए कीजिये , ना की ये साबित करके की "ऐ मुसलमानों, तुम्हारे साथ जुर्म हो रहा है, उठो छेड़ दो जेहाद इन हिन्दुस्तानियों और हिंदुस्तान के खिलाफ" दूसरा ओसामा बनिए और अगर लगता है किसी मुल्क में अच्छे हालात है तो वह चले जाइए
मानूंगा की आपकी कलम में ताकत है , इसलिए कभी नहीं चौंगा की मेरा छोटा है या मेरे मोहल्ले के लोग कभी इस तरह के भड़काऊ चीजे पढ़े वरना एक और दंगा होते देर नहीं लगेगी...
भारतीय नागरिकों, जो कि अपने संसाधनों कि रक्षा के लिए, पुलिसिया अत्याचार के लिए संगर्ष कर रहे हैं वो "आतंकवादी" और बाकी सारे दूसरे देशों के (मासूम) नागरिक जो अमेरिका से लड़ रहे हैं, इसी उद्देश्य को लेकर लड़ रहे हैं तो वो निर्दोष. वाह भाई मान गए.
आप जैसे (तथाकथित) बुद्धिजीवी ही काफी हद तक जिम्मेदार हैं इस देश की इस स्थिति के लिए जो कि हर समस्या को एक ही चश्मे से देखते हैं. आपमें और उनमे (जिन्हें हम सांप्रदायिक कहते हैं) क्या फर्क रह गया भला.
कुल मिलकर एक निराशाजनक लेख.
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