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हुसैन के नाम पर फिर बरपा हंगामा

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मकबूल फिदा हुसैन फिर से चर्चा में हैं। इस बार न तो माधुरी के पीछे पागलपन के कारण चर्चा में हैं और न ही किसी ऐसे चित्र को लेकर जिस पर हिन्दु समाज ने आपत्ति दर्ज करवाई हो. दरअसल अब वे कतर की नागरिकता ग्रहण करने वाले हैं। उनके छोटे बेटे ओवैस का कहना है कि मेरे पिता अपना निर्णय खुद लेते हैं। वे कभी दबाव में नहीं आते हैं।

कतर की नागरिकता लेने की पीछे उनका कोई भी छुपा हुआ एजेंडा नहीं है। वे अंदर और बाहर एक समान हैं। वे अपने इस निर्णय को लेकर थोड़े दुःखी भी हैं। वे कहते हैं कि इंसान देष के बाहर जा सकता है, लेकिन देष इंसान के अंदर से बाहर नहीं जा सकता है। उनका जन्म पवित्र नगर पंढरपुर में हुआ था और उनकी हिस्सेदारी देश की आजादी में भी रही थी। 1930 में उन्होंने अंग्रेजों के विरोध में बहुत सारे पोस्टर बनाकर, उसका प्रचार-प्रसार किया था। ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए यह विचार व्यक्त किया है कि श्री हुसैन को भारत वापस आना चाहिए। यघपि इस मुद्दे पर सरकार आश्चर्यजनक रुप से चुप्पी साधे हुए है, किंतु लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय श्री हुसैन को सुरक्षा मुहैया करवाने के लिए कृतसंकल्पित है। श्री ओवैस पुनः कहते हैं कि उनके चाहने वालों ने उनसे आग्रह किया है कि वे सर्वोच्च न्यायलय का फैसला आने तक कतर की नागरिकता ग्रहण करने की जल्दबाजी नहीं करें। दादीबा पंडोले जिन्होने पहली बार श्री हुसैन की कला को पहचाना था, ने कहा है कि जहाँ श्री हुसैन द्वारा कतर की नागरिकता ग्रहण करना कतर के लिए फायदेमंद होगा, वहीं भारत के लिए बहुत अपूरणीय क्षति।

वढेरा आर्ट गैलरी के निदेशक श्री वढेरा का मानना है कि यह श्री हुसैन के लिए निश्चित रूप से गौरव का विषय है , क्योंकि कतर की नागरिकता किसी को आसानी से नहीं मिलती है, पर भारत को इससे नुकसान ही होना है। अगर हम एम एफ हुसैन के कर्म पक्ष की बात करें तो निःसंदेह वे विश्व के महानतम चित्रकारों में से एक हैं। श्री हुसैन का जन्म 1915 में महाराष्ट्र के पंढरपुर नगर में हुआ था। उनका रुझान बचपन से ही कला की तरफ था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही कैलीग्राफी कला में महारत हासिल कर ली थी। जब वे अपने चाचा के साथ बड़ौदा में रहकर मदरसा में पढ़ रहे थे तो उनका झुकाव साहित्य की तरफ हुआ, खासकरके कविता की तरफ। जोकि आज भी उनके वजूद का एक अहम हिस्सा है।

हालांकि उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुणात्मकता के दृष्टिकोण से उल्लेखनीय नहीं रही थी, किन्तु चित्रकला के प्रति उनकी रुचि बचपन से अतुलनीय थी। उन दिनों साईकिल से वे प्रकृति के खुबसूरत रंगों को अपनी कला के द्वारा सहेजने के लिए दूर-दराज के इलाकों में चले जाया करते थे। अपनी लगन और चित्रकला की दुनिया में कुछ करने की जिजीविषा की वजह से श्री हुसैन 1937 में मुम्बई चले आये । फाकाकशी के वे दिन थे श्री हुसैन के लिए। उनकी आर्थिक स्थिति उन दिनों बहुत ही दयनीय थी। एक छोटे से गंदे कमरे में जोकि वेश्याओं के मुहल्ले का एक हिस्सा था, में रहकर उनका संघर्ष जारी था। अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में वे सिनेमा के पोस्टरों की पेंटिंग किया करते थे। उनकी तरफ कला की दुनिया का ध्यान 1947 में गया जब बम्बई आर्ट सोसायटी द्वारा आयोजित चित्रों की पर्दशनी में उनको अपने चित्रों के लिए पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद तो उनकी सफलता का कारंवा बढ़ता ही चला गया। सन् 1955 पहुँचते-पहुँचते श्री हुसैन का शुमार भारत के नामचीन चित्रकारों में हो गया। सन् 1955 में ही भारत सरकार ने श्री हुसैन को पद्म श्री से सम्मानित किया।

1967 में आयोजित अंर्तराष्ट्रीय फिल्म फेसटिवल में श्री हुसैन को उनके डाक्युमेन्टरी फिल्म के लिए गोल्डन बियर पुरस्कार दिया गया। श्री हुसैन चित्रकारी के अलावा डाक्युमेन्टरी फिल्मों और साहित्य में भी अपना दखल रखते हैं। इसी दखल का नतीजा था गोल्डन बियर पुरस्कार। उन्होंने समानांतर भारतीय कला के साथ-साथ भारत के कई अन्य अनछुए पहलुओं को अपनी कला के माध्यम से पूरी दुनिया के सामने लाने का अद्भुत काम किया है। साओ पालो ने 1971 में श्री हुसैन को महान चित्रकार पाब्लो पिकासो के साथ खास मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया था। सन् 1973 में भारत सरकार ने श्री हुसैन को पुनः पदम भूषण और 1989 में पदम विभूषण देकर गौरवान्तित किया। इतना ही नहीं 1986 में उनको राज्यसभा के लिए भी नामांकित किया गया। सन् 2006 का भारत माता की नग्न चित्र बनाने का मामला हो या फिर हिन्दु देवी दुर्गा और सरस्वती का नग्न चित्र बनाने की बात हो, हर समय वे कुछ ऐसा करते रहे कि विवाद और विरोध उनकी अंकषायिनी बनी रही। उनके द्वारा निर्मित फिल्म मीनाक्षी का भी मुस्लिमों ने 2004 में अकूत विरोध किया था।

इतना तो स्पष्ट है कि श्री हुसैन को भारत में भरपूर प्यार और सम्मान मिला है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि श्री हुसैन को विवाद में मजा आता है। यह उनका सिरफिरापन है या अब यह उनके स्वभाव का एक महत्वपूर्ण भाग बन गया है, इसे समीचीन तरीके से रेखांकित करना सभी के लिए मुष्किल जरुर है। अगर श्री हुसैन कतर की नागरिकता स्वीकार करते हैं तो भारत की कला जगत को अवश्य बहुत बड़ा धक्का लगेगा। फिर भी इस पूरे प्रकरण को ज्यादा तूल देने की जरुरत नहीं है, क्योंकि श्री हुसैन के काम और उनके निर्णय हमेशा हैरान करने वाले होते हैं। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ की मर्यादाओं का पालन करना भी हमारा कर्त्तव्य है। पर शायद श्री हुसैन अपनी कला में इतने खोये रहते हैं कि कर्त्तव्यों से इत्तिफाक नहीं रखते हैं।

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ghakki on 28 February, 2010 01:13;40
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bilkul sahi likha isme ye bhi jod de ki husain pith dikha kar bhag jane waloon me se ak hai jis bharat ne unnhe sarvovh sanman deye usi ko sharm sar kare ke liye katar jaa rahe hain. khatmaloon ke dar se kambal phek nahi deya jaata husain ji
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Jabbar Patel on 01 March, 2010 01:40;03
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क्या हुसैन अब क़तर के शेख की बीवी, बेटी या मान की नंगी तस्वीर बनाने की हिम्मत करेंगे...? किसी भी पेंटर को अपनी पेंटिंग्स महंगे दाम पर बेचने के लिए चर्चा में बने रहना जरूरी है. और हिन्दू देवी-देवताओं और हिन्दू जनमानस के अपमान की कीमत पर हुसैन सदैव चर्चा में रहे. उनके लिए इतना मातम मनाना गैर-जरूरी है.
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chanda roy on 10 March, 2010 16:36;20
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kitne kamal ki baat hai ki apni jindagi ke uttarardg me aa chuke huissen ko abhi bhi jaan ki itni fikra hai ki wo apni matribhoomi chhod kar katar me dubke baithe hai.ek kalakar ke taur par unka samman to jayaj hai par insaan jis desh samaj me rahta hai uske prati bhi ek kartawya hota hai.. jiska nirwahan nishit taur par hussain ne nahi kiya.
jiska phal vo aaj bhugat rahe hai. isme koi hairani ki baat nahi hai.
kala ki abhivyakti ka taal thokne wale hussain kya ye dussahas qatar ki sanskriti ya mohammadsahab ki paintings ke saath kar sakte hai..
yadi haan to Tasleema Nasreen aur Salman Rushdie ki tarah vo bhi nirvasan ke jal se nahi bach sakte.
aise log jo janmasthal ke prati itne samvedan heen ho aur bharat mata ki nangi tasweer banane ka dussahas kare waise logo ki wapsi ki chinta nazayazhi hai.
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image सतीश सिंह लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
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