अफगानिस्तान में तालिबान के सामने नतमस्तक
अगर यह अफवाह नहीं है तो यह बुरी खबर है. पता नहीं अफगानिस्तान भारत संबंधों के विशेषज्ञ और रणनीतिकार इसे कैसे देखेंगे और परिभाषित करेंगे लेकिन भारत सरकार के खुफिया सूत्रों द्वारा खबर मीडिया में लीक की जा रही है कि भारत सरकार अफगानिस्तान में शांतिपूर्ण विकास कार्यों में कमी लायेगा. ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि बीते महीने की 27 तारीख को काबुल दूतावास के पास एक विस्फोट हुआ जिसमें नौ भारतीय मारे गये थे.
खुले तौर पर तो भारत सरकार ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है लेकिन खुफिया सूत्रों के हवाले से जब खबरें लीक की जाती हैं तो उसका अर्थ यही होता है कि सीधे तौर पर सरकार कोई घोषणा करने से बचना चाहती है. तो खुफिया सूत्रों के हवाले से जो खबर आयी है वह यह कि "भारत सरकार संभवत: अफगानिस्तान में चलाये जा रहे शांति और विकास मिशन के कामों को विराम देगी. काबुल, कांधार, हेरात, मजार-ए-शरीफ और जलालाबाद में भारत सरकार द्वारा संचालित किये जा रहे उच्चायोग के तहत भी काम में कमी लायी जा सकती है. 26 फरवरी को काबुल में भारतीय दूतावास पर हमले के बाद भारत सरकार ने सुरक्षा की समीक्षा करने के बाद ऐसे निर्णय का संकेत दिया है. मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक भारत सरकार अफगानिस्तान में काम कर रहे भारतीय नागरिकों को एडवाइजरी भी जारी कर सकती है कि वे चाहें तो भारत वापस लौट सकते हैं."
अफगानिस्ता में तालिबान के खात्मे के बाद भारत सरकार ने वहां नये सिरे से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी. अक्टूबर 2001 में जब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान में पाकिस्तान प्रायोजित तालिबान के खिलाफ सैन्य अभियान आपरेशन इन्ड्यूरिंग फ्रीडम शुरू किया था उस वक्त भले ही भारत उस सैन्य अभियान का हिस्सा न बना हो लेकिन अफगानिस्तान में आजादी की लड़ाई लड़नेवाले नार्दर्न एलायंस की नजर में भारत एक विश्वसनीय सहयोगी देश था. आज यह कहना ठीक नहीं है कि उस वक्त भारत सरकार को खुलकर अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जंग लड़नी चाहिए थी या नहीं लेकिन उस वक्त नवंबर 2001 में मास्को के दौर पर गये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बातचीत करते हुए रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने कहा था कि भारत को 6+2 की तर्ज पर अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए. 6+2 का यह फार्मूला अफगानिस्तान से तालिबान के सफाये के बाद वहां होने वाले निर्माण कार्यों और भविष्य के अफगानिस्तान के साथ रणनीतिक और कूटनीतिक संबंध बनाने को ध्यान में रखकर कहा होगा. क्योंकि जो 6 मित्र राष्ट्र अफगानिस्तान में अभियान चला रहे थे तालिबान के सफाये के बाद केवल उन्हीं की भूमिका न हो बल्कि रूस और भारत भी वहां मौजूद रहें. तालिबान के सफाये के बाद अफगानिस्तान ने भारत के सामने विकास में भागीदारी के लिए निमंत्रण पत्र भी सौंपा और भारत सरकार ने पूरे मन से तो नहीं लेकिन वहां अपनी उपस्थिति दर्ज की.
अफगानिस्तान में मजबूत भारत केवल पाकिस्तान के दृष्टिकोण से ही जरूरी नहीं है बल्कि मध्य एशिया में भारत की मजबूत उपस्थिति के लिए अफगानिस्तान में मौजूदगी बेहतर तरीका है. ऐसा भारत सरकार के रणनीतिकार भी मानते रहे हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि तालिबान के एक हमले ने वहां काम कर रहे भारतीयों ने सरकार पर इतना दबाव बना दिया है कि सरकार अपनी योजनाओं को धीरे करने का मन बना लिया.
भारत मुख्य रूप से वहां सड़क निर्माण, पुलिस और आर्मी ट्रेनिंग, परिवहन, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों में अफगानिस्तान की मदद कर रहा है. लेकिन नवंबर 2008 में मुंबई पर हमले के बाद ऐसा लगता है कि वह तालिबान से लड़ाई में भी रणनीतिक रूप से भागीदार हो रहा है. इसके कोई स्पष्ट निशान तो नहीं दिख रहे हैं लेकिन जिस तरह से तालिबान ने भारत के मिशन को निशाना बनाया उससे साफ है कि वे भारत को सिर्फ विकास कार्यों का भागीदार नहीं मानते. संभवत: तालिबान लड़ाके मानते हैं कि भारतीय उच्चायोग उनके सफाये के लिए भी सक्रिय है. सीधे तौर पर भारत ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करते हुए अमेरिका की नजरे टेढ़ी होती हैं क्योंकि अमेरिका मानता है कि तालिबान से स्वतंत्र रूप से कोई अन्य देश फ्रण्ट नहीं खोल सकता. अब तो अमेरिका भी तालिबान में फूट डालो राज करो की नीति पर काम कर रहा है. ऐसे में वह कदापि नहीं चाहेगा कि भारत पूर्वी सीमा पर अपने हितों की रक्षा के लिए पश्चिमी सीमा पर कोई गतिविधि चलाए जहां तालिबान बसते हैं. अफगानिस्तान के विकास कार्यों में भारत की बढ़ती भागीदारी से भी अमेरिका परेशान है. अमेरिकी प्रशासन एक बार अपनी नाराजगी जता भी चुका है. संभवत: अमेरिका भी नहीं चाहता कि कश्मीर की लड़ाई अफगानिस्तान में लड़ी जाए जो कि भारतीय कूटनीति का हिस्सा हो सकती है.
ताजा निर्णय किसके दबाव में और क्यों लिया गया होगा कहना मुश्किल है. लेकिन भारत सरकार के इस ताजा निर्णय का साफ संकेत यही है कि उसने अफगानिस्तान में तालिबान के सामने हथियार डाल दिये हैं. अफगानिस्तान में तालिबान ने अब तक दो बार भारतीयों को सीधे निशाना बनाया है. एक बार जुलाई 2008 में जब तालिबान के हमले में 60 लोग मारे गये थे जिसमें 4 भारतीय शामिल थे. इसके बाद 27 फरवरी 2010 का हमला जिसमें 9 भारतीय मारे गये. भारतीयों का यह नुकसान क्या अमेरिकी फौजों को होनेवाले नुकसान से अधिक है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर भारत सरकार अफगानिस्तान की विकास योजनाओं से अपना हाथ वापस क्यों खींच रही है? अफगानिस्तान में भारत सरकार की विकास योजनाएं वहां के विकास का अहम हिस्सा हैं. अफगानिस्तान में भारतीय लोगो को स्वाभाविक विश्वास हासिल है और वे अपने यहां विकास में अमेरिका की बजाय भारत को प्राथमिकता देते हैं. भारत के लिए भी अफगानिस्तान न केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बल्कि रणनीतिक रूप से भी अति महत्वपूर्ण देश है. भारत सरकार वहां 1.3 अरब डालर की विभिन्न विकास परियोजनाएं संचालित कर रहा है. क्या भारत की ओर से मिशन पर गये भारतीय लोग इतने कमजोर हैं कि एक दो हमलों से घबराकर वहां से जाने का दबाव बनाने लगें. क्या यही इस देश के नागरिकों का राष्ट्रप्रेम है? अगर भारत सरकार किसी भी दबाव में अफगानिस्तान के विकास कार्यों से अपना हाथ वापस खींचती है तो यह केवल अफगानिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि भारत के भविष्य के लिए भी नुकसानदेह होगा. भारत सरकार का यह निर्णय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के उस निर्णय जैसा ही है जिसमें उन्हें कांधार विमान के अपहरणकर्ताओं के सामने हथियार डालते हुए जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया को छोड़ दिया था. क्या सरकार का यह फैसला तालिबान के सामने समर्पण कर देने जैसा नहीं है?
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क़ाज़ी जी तुम क्यों दुबले ?
शहर का अंदेशा है .
कई बार रणनीति के तहत ही सरकार ऐसी खबरों को लीक करवाती है और कई बार अधिकारियों से संपर्क की बदौलत पत्रकार खबर निकाल लेते हैं. इसे ही कहते हैं सूत्रों के हवाले से. अब यह तय कर पाना मुश्किल होता है कि यह खबर लीक करवायी गयी है या पत्रकार का पराक्रम है.
पार्टियों की खबरें भी ऐसे ही लीक होती हैं और आप पाठकों तक पहुंचती हैं.
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