हुसैन के इस कर्म का मर्म समझो, हिन्दुओ!
भारतीय कलाजगत के एक ढोंगी चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय के बूते स्वयं को स्थापित कर मोटी कमाई की है। लेकिन आखिरकार हिन्दू भावनाओं को आहत करनेवाले चित्र बनाकर हिन्दू जनमानस के साथ खिलवाड़ कर अपने जीवन की सांध्यवेला में कतर जैसे मुस्लिम देश की नागरिकता स्वीकार कर ली. ऐसा करके उसने माँ भारती की पीठ में खंजर भोंकने का काम किया है.
मकबूल फ़िदा हुसैन के स्व-निर्वासन पर कोहराम मचाने वाले वैसे तो हर हिंदूवादी को कानून और संविधान की दुहाई देते रहते हैं.मबूल फ़िदा हुसैन के खिलाफ इस देश की तमाम अदालतों में आपराधिक मामले लंबित हैं.कानून की प्रक्रिया के आईने में मकबूल फ़िदा हुसैन इस देश के भगोड़े हैं. जब इस देश में उनके खिलाफ आपराधिक मामले प्रलंबित हैं,उसी समय एक देश उन्हें अपने देश की नागरिकता दे रहा है तो भारतीय विदेश मंत्रालय उस मामले में ऐसे 'भगोड़े' को उक्त देश द्वारा दी जा रही नागरिकता का विरोध क्यों नहीं करता? हमारे विदेशों में सक्रीय राजनयिक किस क़ानून के तहत उसका पासपोर्ट वापस लेते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुस्लिम माफिया खुद हुसैन के इस प्रयोग का इंतज़ार कर रहे हों? आज हुसैन के मामले पर समझौता हो रहा है,कल दाऊद इब्राहीम या किसी अन्य माफिया के लिए इसी तरह का समझौता होगा.
आप फ़र्ज़ करें की क़तर के किसी चित्रकार ने इस्लाम के किसी पीर-पैगम्बार का अपमान किया होता, उसके खिलाफ क़तर की अदालतों में आपराधिक मामला चल रहा होता तो क्या भारत का सत्ता तंत्र उस कलाकार को हिन्दुस्थान में नागरिकता देने की हिम्मत जुटा सकता था? आप कल्पना कर सकते हैं कि पैगम्बर का कार्टून बनानेवाले दानिश कार्टूनिस्ट पर डेनमार्क में मुकदमा बन जाए तो क्या भारत उसे नागरिकता देने की सोच भी पाल सकता है? क्या हम सलमान रश्दी, तसलीमा नसरीन या तहमीना दुर्रानी को इस देश की नागरिकता दे सकते हैं? हालांकि इन तीनों ने किसी इस्लामी व्यक्तित्व की विकृत तस्वीर बनाने का भी पाप नहीं किया है,फिर क़तर की हरकत पर आपत्ति लेने की बजाय हम प्रायश्चित की मुद्रा में क्यों हैं? भारत में कोई हुसैन को फांसी की सजा तो नहीं सुनायी गयी थी. किसी ऐसे मामले में उन्हें फंसाया भी नहीं गया था जिससे उन्हें अपना बुढापा पार करने में कोई परेशानी होती. हिन्दू संगठन तो सिर्फ इतना ही कह रहे थे कि हुसैन ने जिस कृत्य से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया है उसके लिए माफी मांग लें. एक पंक्ति की माफी से भी हमारा अति उदारवादी हिन्दू हुसैन को माफ़ कर देता.लेकिन हुसैन ने अपने मगज में वर्षों से साद रहे मियांवादी मवाद को दुनिया के सामने सार्वजनिक कर इस देश के मुस्लिम परस्त साम्प्रदायिक मुसलामानों को सन्देश दिया है कि हिन्दुओं के खिलाफ वे बिंदास अपराध करें, उन्हें मुस्लिम देशों से पूरा प्रश्रय प्राप्त रहेगा.अब तक यह काम अकेले पाकिस्तान कर रहा था अब क़तर जैसे देश भी यही काम कर रहे हैं.
हमारा सत्ता तंत्र सेकुलर निर्वीर्यता का शिकार है. हमारी भोंपू मीडिया हमारे लोकतांत्रिक तंत्र को कटघरे में खडा करने का पाप कर रही है और देश के बहुसंख्यक समुदाय को अनर्गल अपराध बोध से ग्रस्त कराने में जुटी हुई है. हमारे देश में मकबूल फिद्दा हुसैन के देश की नागरिकता त्यागने पर हंगामा खडा होता है. उसी कालावधि में हुसैन की तुलना में बड़े कलाकार माने जानेवाले सय्यद हैदर रजा द्वारा ५ दशक बाद भारत आ बसने के इरादे पर कोई खबर नहीं बनाती, कोई बहस नहीं छिड़ती, क्यों? किसी जमाने में सय्यद हैदर रजा और मकबूल फ़िदा हुसैन दोनों प्रोग्रेससिव आर्ट ग्रुप में इकट्ठे सक्रिय हुआ करते थे. दोनों की कर्मभूमि मुंबई थी. हैदर रजा १९५० के दशक में फ़्रांस में बस गए. वे पेरिस यात्रा पर थे. उसी समय उनका जेनी नामक युवती से प्रेम और विवाह हो गया. जेनी अपने माँ की एकमेव कन्या थी,वह माँ को अकेले छोड़ कर भारत में बसने का फैसला नहीं कर पा रही थी, सो रजा ने वहाँ रहना स्वीकार लिया. बावजूद इसके रजा साल-दो साल में भारत आते रहे. उनके चित्रों में भारतीयता झलकती रही. आज भी रजा बिंदु और नाग जैसे विशुद्ध हिन्दू प्रतीकों का अपनी चित्रकला में प्रदर्शन करते हैं. रजा ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि वे साल भर में भारत आकर अपने जीवन का शेष समय यहाँ गुजारना चाहते हैं. वे अपने भावी कार्य के लिए इन दिनों भाग्वाद्गीता का भी अध्ययन कर रहे हैं.
दूसरी ओर अपनी उम्र के ९० साल पूरे कर चुके हुसैन पर इस्लामी मद सवार है। वे ऐसे इस्लामी देश की नागरिकता स्वीकार कर बैठे हैं जिस इस्लाम में चित्र बनाना ही हराम माना जाता है. कल कोई मुल्ला अगर किसी शरई अदालत में चला गया तो हुसैन पर कोड़े खाने की नौबत आ सकती है. क़तर जाकर भी क्या हुसैन इस्लामी इतिहास को अपने चित्र का विषय बना सकते हैं. अब भी हुसैन भारतीय नागरिकता त्यागने के बाद भी भारतीय कला त्यागने की औकात जुटाने की स्थिति में नहीं हैं. आज भी हुसैन जिन ३ विषयों पर चित्र बनाने की तैयारी कर रहे हैं उनमें से एक विषय विशुद्ध भारतीय है. वे मोहें जो दरो से मनमोहन सिंह तक की इस संस्कृति पर चित्र श्रृंखला बनाने की तैयारी में हैं.यदि हुसैन में रंच मात्र भी नैतिकता हो तो उन्हें इस्लामी संस्कृति को दर्शाने व्वाले चित्रों पर क़तर से काम करना चाहिए. वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते,ऐसा करते ही क़तर के हुक्मरान उनको गधे पर बिठाकर कोड़े मारते हुए पूरे क़तर में घुमायेंगे. तब उनकी रक्षा में भारत के सड़े-गले सेकुलरों का स्यापा भी काम नहीं आयेगा. हिन्दू सहिष्णु है, सेकुलरवाद का राग गायों से छेड़ा जा सकता है और उनकी सींगों को आतंकी अस्त्र भी करार दिया जा सकता है. सियारों के सामने ये राग कहाँ चलनेवाला है?
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भारत के सेंकडो हिन्दुओं के मर्म को उन्होंने समझा और शब्दों में व्यक्त किया
हुसैन न केवल हिन्दुओं बल्कि भारत के भी दोषी हैं
लगे रहे भैया, इस मंस्सिकता के खिलाफ जो कोल्कता के मुल्लो के मीनाक्षी फिल्म के खिलाफ स्यापा करने पर तुरंत माफ़ी माग लेती है और दृश्य भी फिल्म से हटा दिया जाता है वही हिन्दुओं की भावनाओं को बार बार जान बुझकर चोट पहुचाई जाती है, ऐसे सेकुलर लोगो की मान बहनों की कोई फोटो बनाये तो तुरंत खड़े हो जायेंगे लेकिन भारत माँ तो इन्हे प्रयोग की वास्तु लगती है, ऐसे लोगो को तो जुटे मार कर खदेड़ देना चाहिए सरहदों के बहार चाहे वो होंदु हो या मुसलमान ...
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