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जेपी के लिए सबकुछ जमींदोज

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गरीबी, बदहाली और अनवरत विस्थापन से जूझ रहे सोनभद्र में, दलित आदिवासी शोषण का नया सत्र शुरू हो गया है। उत्तर प्रदेश में सरकारी मदद से अपना उपनिवेश स्थापित करने की कोशिश में लगे जेपी सीमेंट ने अपने आप को स्थापित करने के लिए केवल आदिवासियों के घर को जमींदोज करने की योजना नहीं बनाई है बल्कि जेपी ने शासन, प्रशासन और मीडिया की हैसियत को भी जमींदोज कर दिया है. कोई माई का लाल नहीं है जो जेपी की मुखालिफत कर सके.

जिला प्रशासन ने लगभग १० हजार की आबादी वाले भलुआ टोला के दलित आदिवासियों को बेहद शर्मनाक तरीके से बिना तिथि के घर खाली करने की नोटिस थमा दी वहीँ जेपी ने भीख मांग कर या छोटा मोटा काम करके गुजरा करने वाले इन निपढ आदिवासियों से घर खाली करने की  सहमति का जबरन अंगूठा लगवा लिया। महत्वपूर्ण है कि भलुआ टोला वो इलाका है जहाँ पर हजारों की संख्या में रिहंद बाँध के विस्थापित आकर बसे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा जबरन आवास खाली न कराये जाने के आदेश के बावजूद प्रशासन और जेपी एसोसिएत  के इस तिकड़म से पूरे इलाके में हाहाकार मच गया है। आदिवासियों ने किसी भी कीमत पर अपनी जमीन न छोड़ने का ऐलान किया है, जानकारी मिली है कि दो चार दिनों में जिला प्रशासन भारी पीएसी और पुलिस बल लगाकर सभी झुगी झोपड़ियों को नेस्तानाबूद कर देगा ,इसके पूर्व डाला में भारी बल का प्रयोग करके जिनमे दो महिलायें घायल भी हुई थी, मलिन बस्ती पर कब्ज़ा ज़माने की कोशिश की गयी थी, हालाँकि उस वक़्त तमाम मानवाधिकार संगठनों के उग्र तेवर की वजह से जेपी को बेदखली की प्रक्रिया रोकनी पड़ी। इस बीच इस जोर जबरदस्ती से पीड़ित परिवारों ने जबरन बेदखल किये जाने की स्थिति में सामूहिक आत्मदाह का ऐलान कर माहौल को और भी गरम कर दिया है।

भलुआ टोला की बैगा आदिवासी  समुही को टोले के अन्य  लोगों की तरह मालूम नहीं था कि जेपी  उनसे उनका सब कुछ छीन लेने का निश्चय कर चुका है ,दूकान दूकान घूमकर गेंहू चावल पछोरने वाली समुही बताती है कि तीन दिन पहले जेपी  के लोग आये जिनके साथ तहसीलदार साहब भी थे इन लोगों ने सारे गाँव वालों को बुलाया फिर बारी बार इसे उस एक कागज़ पर दस्तखत करा लिया जब हमने पूछा कि क्या लिखा है इसमें तो कहा गया कि आप लोगों को पट्टे की जमीन मिलने वाली है। समुही कहती है हमारे साथ धोखा क्यूँ किया? मेरे दो छोटे बच्चे हैं, पति भी नहीं,झोपड़ी  गिरा देंगे तो कहाँ जायेंगे? बस्ती में लगभग २०० की संख्या में रहने वाले बसर आदिवासी जिनका मूल काम बॉस के समान बना कर बेचना रहता है। इस धोखाधड़ी से अवाक हैं ६० साल के  गहमर का कहना था कि हम साहब लोगों के पैरों पर गिर गए मगर उन लोगों ने कुछ भी नहीं सुना, अंगूठा लगवाकर कहा झोपड़ी छोड़ कर कहीं और चले जाओ नहीं तो झोपड़ी के साथ साथ तुम्हे भी दफ़न कर देंगे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में शुमार ओबरा तापीय परियोजना के नीचे बसे इस टोले  में ज्यादातर लोग ६० के दशक के वो विस्थापित हैं जो सिंगरौली के रहने वाले हैं और जिनकी जमीन रिहंद बाँध के डूब क्षेत्र में आ गयी थी। सोनभद्र में काफी हो हल्ला  के बावजूद  वनाधिकार कानून के तहत आदिवासी किसानों को उसकी जमीन पर मालिकाना हक़ देने का काम तो पूरा नहीं किया गया, सरकारी संरक्षण में बेदखली का काम शुरू कर दिया गया|

इस पूरे मामले पर आन्दोलन छेड़ने का ऐलान करते हुए पीयूसीएल के विकास शाक्य कहते हैं उत्तर प्रदेश सरकार जेपी को लाभ पहुँचाने के लिए ये जुल्मो सितम कर रही है, आदिवासियों से झूट बोलकर और उन्हें डरा धमकाकर अंगूठा लिया जाना बेहद संगीन जुर्म है, इसके लिए किसी भी हद तक लड़ाई  लड़ी जाएगी बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के लिक्विडेशन के समय उच्च न्यायालय ने तत्कालीन सीमेंट निगम की जमीन जेपी को जमीन स्थानांतरण का भी आदेश दिया था मगर जेपी ने सरकार में बैठे मंत्रियों, नौकरशाहों और स्थानीय अधिकारियों की मदद से भू अभिलेख रिकार्डों में भारी फेरबदल कराये और दलितों और आदिवासियों की बाप दादा की जमीन पर कब्ज़ा करने का एक सूत्रीय  कार्यक्रम शुरू कर दिया। आदिवासियों को दिए गए आदेश में कहा गया है कि इस सुचना के प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर अपना अविध कब्ज़ा हटाकर उस भूखंड को जेपी को सौंप दे मगर जिला प्रशासन ने चालाकी दिखाते हुए किसी भी नोटिस पर तिथि नहीं डाली जिससे कि किसी भी वक़्त कार्यवाही की जा सके।

इस पूरे मामले पर जब जिलाधिकारी सोनभद्र पंधारी यादव  से बात की गयी तो उन्होंने कहा कि वहां जो भी लोग रह रहे हैं वो अवैध तरीके से रह रहे हैं ये सारी कार्यवाही उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत की जा रही है ,जब उनसे ये  पूछा गया कि आदिवासियों से जबरन अंगूठे क्यूँ लगवायेगे और वो भी उपजिलाधिकारी की उपस्थिति में उन्होंने कहा कि हमें ऐसी किसी जोर जबरदस्ती की कोई जानकारी नहीं है हालांकि नोटिस पर तिथि अंकित न होने की गलती उन्होंने स्वीकार कर ली। जिलाधिकारी का कहना था कि भलुआ टोला में रहने वालों के लिए ये उचित होगा कि जल्द से जल्द बस्ती खाली कर दे। समाचार भेजे जाने तक भलुआ टोला के आदिवासियों की एक संयुक्त बैठक चल रही थी आदिवासी नेता राजाराम का कहना था कि जेपी की जोर जबरदस्ती का हम मुहतोड़ जवाब देंगे।

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सोनू on 15 March, 2010 14:32;53
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"बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के लिक्विडेशन के समय उच्च न्यायालय ने तत्कालीन सीमेंट निगम की जमीन जेपी को जमीन स्थानांतरण का भी आदेश दिया था"

आप तो उप्र का ही लिक्विडेशन(परिसमापन) करा रहे हैं। जो कि शायद दिवालिया होने पर या बंद होने पर परिसंपत्तियों की उगाही होती है।

रिपोर्ट उग्र कर देने वाली है लेकिन कम से कम इस बात का तो ख़याल रखें की जो टाइप कर रहे हैं उसका अर्थ क्या चाह रहे हैं।

ऊपर वाले उद्धरण को सही करके लिखेंगे?
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Jeet Bhargava on 16 March, 2010 02:59;41
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भाई उत्तर प्रदेश हो या महाराष्ट्र..हर जगह यही कहानी है. जनता अपनी अकल ताक में रखकर जिनको चुनते हैं वो उद्योगपतियों को बिक जाते हैं. दोष जनता का है.
उत्तर प्रदेश क्या केंद्र सरकार भी बड़ी कंपनियों के सामने नतमस्तक होकर जनता की जान जोखिम में डालने पे उतारू है..ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ पढ़े..
http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/03/nuclear-liability-bill-atomic-energy.html
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Narender on 18 March, 2010 10:14;17
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JP ki ye kahani nai nahi hai. Bulandshahar me Anoopshahar JP ka tathakathit Janmsthan raha hai. JP kai Saalo se waha sakriya hai. Thode se vikas ke badle JP ne jo loota, use bhi log vikas ka hissa samjhte hai. Babe karname mhjhse janiye.
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image awesh tiwari मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है | विगत २ वर्षों से लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट ' में ब्यूरो प्रमुख। awesh29@gmail.com
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