Home | बियाबान में शोर | परमाणु कीचड़ में सने हाथ

परमाणु कीचड़ में सने हाथ

image

सरकार ने परमाणु हर्जाना विधेयक लोकसभा में पेश नहीं किया, यह अच्छा किया। पेश न करने का कारण यह भी हो सकता है कि 35 कांग्रेस सांसद अनुपस्थित थे और सारे विरोधी दल एकजुट थे। वह पेश होता तो शायद गिर जाता। कारण जो भी हो, इस विधेयक का अटक जाना भारत के हित में है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री अगले माह जब अमेरिका जाएंगे तो यह विधेयक उनके हाथ में नहीं होगा, लेकिन क्या कीचड़ में सने हाथों के साथ जाने से यह कहीं अच्छा नहीं कि वे खाली हाथ ही जाएं?

जाहिर है कि इस विधेयक को कानून बनने में जितनी देर लगेगी, भारत-अमेरिकी परमाणु सहयोग में उतनी ही देर होती चली जाएगी, क्योंकि अमेरिकी सरकार का आग्रह है कि भारत पहले परमाणु दुर्घटना की स्थिति में हर्जाने के सवाल को सुलझाए। अमेरिका किसी भी हालत में कोई भी हर्जाना नहीं भरना चाहता। सच्चई तो यह है कि भारत में इस तरह का कोई कानून पहले से बना हुआ ही नहीं है।

लगभग 50 साल पहले जब परमाणु ऊर्जा संबंधी कानून बना तो उस समय यह कल्पना ही नहीं रही होगी कि कभी भयंकर परमाणु दुर्घटना हो सकती है। इस तरह की दुर्घटनाओं के बारे में दुनिया की नींद तब टूटी, जब 1979 में अमेरिका के थ्रीमाइल आइलैंड में परमाणु रिसाव हो गया और 1986 में रूस के चेर्नोबिल में हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग परमाणु विकिरण के शिकार हुए। अमेरिका को यह डर है कि भारत स्थित उसके परमाणु संयंत्रों में कहीं कोई दुर्घटना हो गई तो सारी बला कहीं उसके सिर न आ जाए। थ्रीमाइल और चेर्नोबिल के संयंत्र तो अमेरिका और रूस के अपने थे। उन्होंने हर्जाने का मामला अपने नागरिकों से जैसे-तैसे निपटा लिया, लेकिन इसी तरह की दुर्घटनाएं यदि परदेस में हो जाएं तो क्या होगा? अनाप-शनाप हर्जाने का भुगतान करते-करते वे दिवालिया भी हो सकते हैं। भारत सरकार ने हर्जाने का जो विधेयक तैयार किया है, उसमें अमेरिका क्या, प्रत्येक परमाणु सप्लायर राष्ट्र या संगठन को इस जिम्मेदारी से लगभग मुक्त कर दिया गया है। इसीलिए विरोधी दल कह रहे हैं कि यह विधेयक राष्ट्रविरोधी है और अमेरिका के इशारे पर उसी के फायदे के लिए बनाया गया है।

इस कथन से सहमत होना कठिन है, क्योंकि लगभग इसी तरह के कानून अन्य 28 देशों में भी लागू हैं। जिन देशों ने हर्जाने के सवाल पर विएना की परमाणु एजेंसी या पेरिस कन्वेंशन के साथ समझौते कर रखे हैं, उन्होंने भी हर्जाने की सारी जिम्मेदारी खुद पर ले रखी है। दुर्घटना की जिम्मेदारी उस राष्ट्र या संस्था की नहीं होगी, जिसने परमाणु संयंत्र यर्ा ईधन या पुर्जे या तकनीक सप्लाय की है। इस दृष्टि से भारतीय परमाणु हर्जाना विधेयक वैसा ही है, जैसे कि दूसरे देशों के हैं, लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि हर्जाने के ऐसे एकतरफा प्रावधान क्यों रखे गए हैं और उन्हें सबने स्वीकार क्यों कर लिया है? उत्तर स्पष्ट है। परमाणु सप्लायर राष्ट्र दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र हैं और परमाणु ऊर्जा पाने वाले राष्ट्र कमजोर और गर्जमंद राष्ट्र हैं। इसीलिए दाता राष्ट्रों ने पाता राष्ट्रों पर अपनी शर्ते थोप दीं। भारत की क्या मजबूरी है कि वह भी इसी भेड़चाल पर चलता चला जाए? भारत की परमाणु खरीदी से पश्चिम के आर्थिक संकट में फंसे राष्ट्रों को अरबों-खरबों की आमदनी होने वाली है। ऐसी स्थिति में भारत नई लकीर क्यों नहीं खींचता? भारत अपनी नई शर्ते क्यों नहीं पेश करता?
भारत यह मांग क्यों नहीं करता कि यदि किसी विदेशी परमाणु संयंत्र में बनावट, संचालन या पुर्जो का दोष पाया गया और उसके कारण कोई दुर्घटना हो गई तो सप्लायर राष्ट्र को सारा हर्जाना देना होगा? वर्तमान विधेयक में हर तरह की दुर्घटना का जिम्मा प्राप्तकर्ता राष्ट्र पर डाला गया है अर्थात कार में कोई भी खराबी हो तो खरीदार जिम्मेदार है। कार बनाने वाली कंपनी का उससे कोई लेना-देना नहीं है। क्या इस तरह की शर्त पर कोई भी कार खरीदेगा? जब सामान्य खरीद-फरोख्त में ऐसी एकतरफा शर्ते नहीं चलतीं तो परमाणु लेन-देन में कैसे चल सकती हैं?

यदि भारत सरकार इस तरह की शर्त स्वीकार करेगी तो इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत के आम आदमी को होगा। जब सारा हर्जाना भारत को ही भुगतना है यानी उन विदेशी परमाणु संयंत्रों को चलाने वाली भारतीय संस्थाओं और भारत सरकार को ही भुगतना है तो हर्जाने की राशि कम, बहुत कम ही होगी। वर्तमान विधेयक के अनुसार वह 500 करोड़ रुपए की होगी। यह हर्जाना वह संस्था भरेगी, जो परमाणु संयंत्र चला रही है। यदि यह कम पड़ा तो भारत सरकार भरपाई करेगी। वह राशि 300 करोड़ एसडीआर यानी लगभग 2300 करोड़ रुपए होगी। यदि भारत एक अंतरराष्ट्रीय समझौता कर ले तो उसे इतनी ही राशि अंतरराष्ट्रीय हर्जाना कोश से भी मिल सकती है। लगभग पांच हजार करोड़ की यह राशि देखने में काफी मोटी मालूम पड़ती है, लेकिन अगर इसे पांच लाख या पचास लाख लोगों में बांट दें तो यह कितनी रह जाएगी?

जब कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो उससे सिर्फ हजार-पांच सौ लोग प्रभावित नहीं होते, हजारों तो मर जाते हैं और लाखों लोग प्रभावित होते हैं तथा वह कुप्रभाव कई पीढ़ियों तक बना रहता है। जिस पैमाने पर भारत सरकार परमाणु ऊर्जा पैदा करना चाहती है, उसके संयंत्र तो विशालकाय होंगे। यदि उनमें दुर्घटना हो गई तो लाखों दुर्घटनाग्रस्त लोगों को कितना मुआवजा मिलेगा? मुश्किल से कुछ हजार रुपए। ये भी कोई हर्जाना है? क्या आदमी की जान की कीमत सिर्फ 10 हजार रुपए है? क्या भोपाल गैस कांड से हम कुछ नहीं सीखेंगे? मरने वालों, जीवन भर विकलांग रहने वालों और उनकी विकलांग संतानों के लिए कुछ हजार तो क्या, कुछ लाख का मुआवजा भी काफी नहीं होगा। भारत में जो कुल हर्जाना है (यानी आधा बिलियन डॉलर) उसके मुकाबले में अमेरिकी हर्जाना (10 बिलियन डॉलर) बीस गुना है।

भारतीय नागरिकों को उचित हर्जाना मिले, इसके लिए यह जरूरी है कि परमाणु सप्लायर की जिम्मेदारी भी तय की जाए। यही नहीं, हर्जाने के दावे की 10 साल की मियाद भी हटाई जाए, क्योंकि परमाणु विकिरण के प्रभाव कई बार दशकों बाद पता चलते हैं, जैसा कि हिरोशिमा और नागासाकी में हुआ है। ठीक है कि दुर्घटनाग्रस्त लोगों को हर्जाने के लिए अदालत की शरण नहीं लेनी पड़ेगी और न ही जांच का इंतजार करना होगा, लेकिन उनको इसका एक नुकसान यह भी है कि वे उचित हर्जाने की मांग किससे करेंगे? क्या यह भारतीय नागरिक के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन नहीं है? इस समय परमाणु विक्रेता राष्ट्रों की गरज इतनी जबर्दस्त है कि भारत चाहे तो वे उसकी सभी वाजिब शर्ते मान सकते हैं। इस मामले में भारत को रूस और फ्रांस का सक्रिय सहयोग भी मिल सकता है। क्या ही अच्छा हो कि हर्जाने का समझौता अमेरिका के साथ करने के पहले भारत, फ्रांस और रूस के साथ कर ले। परमाणु हर्जाने के विधेयक को पास होने में अब जितना समय लगेगा, उसका सदुपयोग भारत इस ढंग से कर सकता है।

Subscribe to comments feed Comments (5 posted):

on 18 March, 2010 00:14;18
avatar
भारत की परमाणु खरीदी से पश्चिम के आर्थिक संकट में फंसे राष्ट्रों को अरबों-खरबों की आमदनी होने वाली है। ऐसी स्थिति में भारत नई लकीर क्यों नहीं खींचता? भारत अपनी नई शर्ते क्यों नहीं पेश करता? भारत सरकार को ही भुगतना है तो हर्जाने की राशि कम, बहुत कम ही होगी। परमाणु सप्लायर की जिम्मेदारी भी तय की जाए। यही नहीं, हर्जाने के दावे की 10 साल की मियाद भी हटाई जाए
Thumbs Up Thumbs Down
2
ghakki on 18 March, 2010 00:15;32
avatar
१)भारत की परमाणु खरीदी से पश्चिम के आर्थिक संकट में फंसे राष्ट्रों को अरबों-खरबों की आमदनी होने वाली है। ऐसी स्थिति में भारत नई लकीर क्यों नहीं खींचता? भारत अपनी नई शर्ते क्यों नहीं पेश करता?

२) भारत सरकार को ही भुगतना है तो हर्जाने की राशि कम, बहुत कम ही होगी।

३) परमाणु सप्लायर की जिम्मेदारी भी तय की जाए। यही नहीं, हर्जाने के दावे की 10 साल की मियाद भी हटाई जाए

ये सभी तर्क अति उत्तम और विचारनीय है


इसमें ये बात (तर्क) और जोड़ना चाहुगा क़ि अगर जिमेदारी नहीं तय क़ि जाएगी तो क्या बहार वाले जिमेदारी से काम करेगे अगर हर्जाने क़ि रकम ज्यादा होगी तो काम भी ढंग से होगा
Thumbs Up Thumbs Down
2
Jeet Bhargava on 18 March, 2010 01:57;42
avatar
Why Manmohan-Sonia-Congress is very much crazzy for this bill??
Thumbs Up Thumbs Down
1
kalpesh on 18 March, 2010 13:20;20
avatar
गुजरात में आए भूकंप पीड़ितों को मुआवजे की रकम तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के दौरे के दो दिन पहले दिन-रात चेक दिए जा रहे थे। (यह स्टोरी मय चित्र इंडिया टुडे मैगजीन में छपी थी) भोपाल गैस त्रासदी और 1984 दंगों के पीड़ितों को मुआवजे की सुनवाई कोर्ट से होने के बाद भी क्या हाल हैं, किसी से छिपे नहीं हैं। इस देश में मुआवजा सही व्यक्ति तक सही समय तक न पहुँचना कोई बड़ी बात नहीं है। इसलिए उस गरीब और संभावित पीड़ित की तो चिंता करने से क्या होगा। इस देश के नेता अपने हिस्से का पैसा जेब में रखकर ही पूरा मामला निपटा देंगे। मुआवजे को लेकर इतनी गंभीरता में तो मजाक ही ज्यादा नजर आ रहा है।
Thumbs Up Thumbs Down
1
aayush on 18 March, 2010 13:24;07
avatar
सही बात है भाई। इस देश में अमीर का बेटा पैदा होता है कुछ करने के लिए, गरीब का बेटा तो होता ही मर जाने के लिए है।
Thumbs Up Thumbs Down
1
total: 5 | displaying: 1 - 5

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image डॉ वैदिक डॉ वेदप्रताप वैदिक भारतीय पत्रकारिता में जीवित किंवदन्ती बन गये हैं. अपना शोध प्रबंध उस वक्त हिन्दी में लिखा जब शोध का अर्थ ही अंग्रेजी होता था. 1971 में जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय मामलों में पीएचडी हासिल करने के बाद पत्रकारिता में आये. नवभारत टाइम्स के संपादक (विचार) फिर समाचार एजंसी भाषा के संपादक रहे. वर्तमान में भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में कार्य और नियमित लेखन. dr.vaidik@gmail.com
Rate this article
5.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
image
सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
image
रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
image
जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
image
बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
image
श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
image
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
image
अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
image
गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
image
बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
image
अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
image
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
image
मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
image
आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
image
सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
image
आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
image
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2