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छद्म लोकतंत्र का सत्ता संघर्ष है नक्सलवाद

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स्वतंत्रता के समय भारत के राजनेताओं के एक गुट ने गांधी की हत्या की तो दूसरे गुट ने गांधी के नीतियों की हत्या की. गांधी की नीतियों की हत्या करनेवालों ने मिलजुलकर समाज पर एक ऐसा संविधान थोप दिया जिसमें लोकतंत्र के नाम पर अनंतकाल तक समाज को गुलाम बनाकर रखने के सभी उपकरण मौजूद थे. वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इसी लोकतंत्र को किसी भी तरह से बचाकर रखना चाहती है जबकि नक्सलवादी इस व्यवस्था को उखाड़कर अपनी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं.

नक्सलवाद की समस्या को मैंने लंबे समय तक संपूर्णता में देखा और समझा है. मेरा मानना है कि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के दलाल इसे किसी भी तरह से कमजोर नहीं होने देना चाहते क्योंकि वे इस व्यवस्था से लाभ उठा रहे हैं. ऐसे अतिवादी दलाल आपको यह कहते हुए मिल जाएंगे कि भारत का संविधान और यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया की सबसे अच्छी व्यवस्था है. संपन्नता, सुविधा और अधिकारों की इस संवैधानिक लूट का स्वामित्व अपने हाथ में लेने का हिंसक प्रयास ही नक्सलवाद है. विभिन्न राजनीतिक दल लोकतांत्र की दुहाई देकर संवैधानिक तरीके से इस लूट के स्वामित्व पर कब्जा बनाये रखना चाहते हैं तो दूसरी ओर अनेक दुस्साहसी इस प्रयास में स्वयं को असमर्थ पाकर लोकतंत्र संविधान आदि का विरोध करके इस स्वामित्व को प्राप्त करना चाहते हैं और अपनी सफलता के लिए हिंसा को ही सबसे अच्छा मार्ग मानते हैं.

आज वर्तमान लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था नागरिकों से टैक्स के रूप में धन वसूलकर उस टैक्स का कुछ भाग सेना, पुलिस पर खर्च करती है और शेष को अपने दलालों पर, अपनी व्यवस्था और कुछ बचा हुआ धन नागरिकों की सुविधा पर खर्च करती है. नक्सलवादी भी ठीक उसी रास्ते पर चलकर टैक्स के रूप में समाज से बेतहाशा धन वसूल करते हैं और उस धन से अपनी सेना तैयार करते हैं, मानवाधिकार और साहित्यकार रूपी दलाल पैदा करते हैं तथा कुछ धन सामाजिक विकास पर भी लगाते हैं. दोनों का उद्येश्य, लक्ष्य और मार्ग एक ही है. दोनों ही समाज को लंबे समय तक गुलाम बनाये रखना चाहते हैं और इसके लिए दोनों ही जनहित का ढोंग रचते हैं. गंभीरतापूर्वक विचार करिए कि नक्सलवादियों का समर्थन करनेवालों का धनखर्च कहां से आता है? और हद तो यह हो गयी है कि अब नक्सलवाद के ऐसे समर्थक गांधी के नाम का भी उपयोग करने लगे हैं. इनका न तो गांधी से कोई संपर्क है और न ही ये असल में मानवाधिकार के रक्षक हैं. ये सिर्फ नक्सलवादी हिंसा को समर्थन देने वाले व्यवसायी हैं जो अब अपनी दुकानदारी चलाने के लिए गांधी और गांधीवाद का भी सहारा लेने लगे हैं.

लेकिन इन दोनों के बीच चल रहे सत्ता संघर्ष में हम शिकार हो रहे हैं. दोनो ही ओर से जो गोला बारूद और बंदूक खरीदी जा रही है उसका धन कहीं न कहीं हमसे वसूल किया जाता है. कहते हैं कि दोनों पक्ष हमारे लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन दोनों ही पक्षों ने कभी हम नागरिकों से सहमति लेने की जहमत नहीं उठाई. दोनों ही पक्ष अपने गुटों की सहमति को नागरिकों की सहमति घोषित कर देते हैं. बीते दिसंबर के दौरान मैंने छत्तीसगढ़ के 113 गांवों की यात्रा की थी. गांवों की यात्रा के दौरान साफ नजर आया कि गांव की जनता पर दोहरी मार है. एक ओर वे पंचायती व्यवस्था के शिकार हो रहे हैं तो दूसरी ओर नक्सलवाद के नाम पर अज्ञात तानाशाही का भय सता रहा है. जनता क्या करे उसे समझ में नहीं आ रहा है. आप गांवों में जाएं तो पायेंगे कि वहां युद्ध की तैयारियां हो रही हैं. कोई इस ओर से लड़ने के लिए तैयार हो रहा है तो कोई उस ओर से. इस विकराल स्थिति में न तो अकेले नक्सलवाद को दोषी ठहराया जा सकता है और न ही इस राजनीतिक व्यवस्था की प्रशंसा की जा सकती है. दोनों ही ओर से कोई भी इस बात का प्रयास नहीं कर रहा है कि समाज को उसके भरोसे छोड़ दिया जाए जैसा कि उसके साथ होना चाहिए. समाज अपनी व्यवस्था खुद बनाए. लेकिन दुर्भाग्य से दोनों ही पक्ष इस बात के लिए तैयार नहीं है.

इतना तो साफ है कि सरकारी नीतियां ही नहीं सरकार की नीयत भी गलत है. विकास की बात तो महज एक ढोंग है. यदि विकास के नाम पर खर्च किये जाने वाले कमीशन को ही बंद कर दिया जाए तो विकास की सारी पोल खुल जाएगी. विकास के नाम पर जो धन खर्च किया जा रहा है उससे दोनों पक्षों के दलाल लाभान्वित हो रहे हैं. इसीलिए ये लोग विकास का रोना रोते हैं. नक्सलवादी विकास की मांग भी करते हैं विकास में बाधा भी पहुंचाते हैं. दूसरी ओर सरकारी लोग हैं जो विकास के नाम पर बंदरबाट में लगे हुए हैं. इसलिए नक्सलवाद की समस्या का समाधान न तो विकास है और न ही बंदूक. नक्सलवाद की समस्या का एक ही समाधान है स्थानीय स्वायत्तता जिसका संशोधित तरीका है ग्रामसभा का सशक्तीकरण. यह सशक्तीकरण न तो कानून से होगा और न ही हिंसा से. यह सशक्तिकरण होगा ग्राम सभा का मनोबल बढ़ाने से. छत्तीसगढ़ के एक गांव रामचन्द्रपुर ने यह प्रयोग किया है और वहां अच्छी खासी सफलता दिख रही है. एक वक्त था जब वहां के लोग भी सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार हो रहे थे लेकिन आज वे ग्राम सभा के सशक्तिकरण के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं. नक्सलवाद के नाम पर हो रहे युद्ध से बचने का यही एकमात्र रास्ता है.

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amarnath on 09 April, 2010 14:38;05
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pahali bar tathakathit naxalvad per sahi visleshan padhane ko mila hai. is naksalvad ki paidais hi shantipurn sangharsho ko dabane ke liye hua. iske kai sabut mil jate hai hai jab sarkaro ke rajnitik vibhag ki or se arthik sahayata bhi inhe milati hai.
kai bar ye mao ki buniyadi manyatao ke bhi ulte karyakalapo me sanlagn dikhate hai. go to the people usi tarah ek buniyadi vasul hai.
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mohan on 09 April, 2010 16:56;29
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Bahut sahi likha hai bajrangji ne.
Gandhi ko zinda rakhne ke liye sahas chahiye.
Samvidhan aisa nahi hota to khandani raaj kaise chalta?
Hinsak Vampanth ki dekhbhaal wo sarkar karti hai jo shantipoorn virodh ko bardasht nahi karti.
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Janardan Pasi on 09 April, 2010 17:10;39
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Excellent:
स्वतंत्रता के समय भारत के राजनेताओं के एक गुट ने गांधी की हत्या की तो दूसरे गुट ने गांधी के नीतियों की हत्या की. गांधी की नीतियों की हत्या करनेवालों ने मिलजुलकर समाज पर एक ऐसा संविधान थोप दिया जिसमें लोकतंत्र के नाम पर अनंतकाल तक समाज को गुलाम बनाकर रखने के सभी उपकरण मौजूद थे.
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सोनू on 09 April, 2010 20:54;31
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"स्थानीय स्वायत्ता": बहुत ज़रूरी और चर्चा करने लायक़ पद और विचार।
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RAJ SINH on 09 April, 2010 21:47;53
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आपको नमन बजरंग मुनि जी,

सच तो यह है की ये दोनों सत्ताएं ,दोनों ही भारत और भारतीय जनता के साथ षड्यंत्र हैं . सांपनाथ और नागनाथ.
अब तो गांधी जैसी ' क्रांति ' से कम कोई इलाज नज़र नहीं आता .
अब तो गुलामी अंग्रेजों के ज़माने से भी ज्यादा पैर पसार चुकी है .

इतने मेहनत से ( जमीन से जुड़ प्रतक्ष्य ) लिखे गए इस आलेख के लिए कितने ही धन्यवाद,साधुवाद कम पड़ेंगे .

आशा है आज के ज्यादातर ' तथाकथित पत्रकार ' अगर इस आलेख से सबक न भी लें कुछ शर्म तो करें .
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swapandarshi on 10 April, 2010 00:20;36
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आपका इस लेख को पढवाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. इस
विषय पर अबतक सबसे इमानदार लेख.
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somendra chaubey on 10 April, 2010 00:36;29
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आपके विचार उत्तम हैं. सामान्य जन तो राजाओं के भ्रष्ट होने के बाद से शोषण का ही शिकार है. किन्तु आपकी बात में एक बात जोड़ना चाहूँगा. लोकतंत्र चाहे कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो, इस भ्रष्टाचार को समाप्त करना फिर भी संभव है. परन्तु लोकतंत्र से इतर भ्रष्ट सत्ता को उखाड़ना बहुत कठिन. बाकि सुधिजन स्वयं समझदार हैं. इतिहास में हर क्रांति के नाम पर चाहे वह किसी भी देश में की गयी हो, यदि उसमें सत्ताधीशों का रक्त बहा है तो उससे कहीं अधिक सामान्यजन का रक्त बहा है. यहाँ कम से कम मतदान का अधिकार तो है. किसी अन्य व्यवस्था का हाल देखना हो तो एक बार अपने पड़ोस म्यामार में झांक कर देख लें.
आपने जो हल सुझाया है वह सर्वश्रेष्ट है. जनता स्वयं अपने कार्य करे. हिंसा कोई मार्ग नहीं है. स्वराज्य का अर्थ ग्राम स्वराज्य ही होना चाहिए. जब ग्राम प्रसन्न और व्याधि मुक्त होंगे तो देश अपने आप प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा.
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on 10 April, 2010 01:07;01
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मैंने आपका आलेख पूरा नहीं पढ़ा क्योंकि
नक्सलवाद एक षड्यंत्र है जिसमे राजनेता भी शामिल हैं
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मनोज कुमार on 10 April, 2010 01:24;51
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बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 10.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
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Rajesh Singh on 10 April, 2010 09:47;59
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कपिलमुनि जी मै आपके विचारों से आंशिक रूप से सहमत हूँ पूरी तरह नहीं,होंगे कुछ लोग मानवाधिकारवादी के नाम पर नक्सलियों के पक्षधर,किन्तु मुझे यह कत्तई नहीं लगता कि कोई भी मानवाधिकारवादी नक्सलियों के इस बर्बर कत्लेआम का समर्थन करेगा दंतेवाड़ा कांड के बाद मानवाधिकारवादियों को कठघरे में खड़ा करना एक फैशन सा हो गया है मानवाधिकार को आप कितना जानते है यह तो मै नहीं जनता किन्तु आप इतना जरूर समझ लीजिये मानवाधिकार दायरा अजन्मे बच्चे के अधिकार से शुरू होकर मृतक के अधिकार तक है मानवाधिकार कभी कत्लेआम का सपोर्ट नहीं करता बल्कि घोर भर्सना करता है चाहे वह माओवादियों द्वारा किया गया हो या स्टेट द्वारा आप ऐसा क्यों नहीं सोचते कि स्टेट द्वारा दंतेवाड़ा के जंगलों से अंजान और बिना किसी ठोस योजना के अर्धसैनिकबलों को जानबूझ कर नक्सलियों के समक्ष चारे के रूप में परोसा गया जिससे नक्सली अर्धसैनिकबलों की हत्या कर सकें और स्टेट के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल पड़े और ग्रीनहंट अभियान के राष्ट्रव्यापी विरोध को शांत किया जा सके और उसी सहानुभूति की लहर पर चल कर स्टेट प्रायोजित कत्लेआम को सही ठहराया जा सके
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image बजरंग मुनि वरिष्ठ गांधीवादी और सर्वोदयी बजरंगलाल अग्रवाल ने जीवन को अपनी ही कसौटियों पर जिस तरह से कसा है वह अनुकरणीय है. गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन्होंने हर अवस्था की मर्यादा का पालन किया और अब बजरंग लाल से बजरंगमुनि हो चुके हैं. समाजशास्त्र पर विस्तृत अध्ययन, शोध और प्रयोग. लोकस्वराज मंच के संस्थापक और ज्ञानतत्व के संपादक.
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